ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
नया काव्य-मुख
01-Dec-2017 01:23 PM 1982     

सागर विश्व विद्यालय की देहरी छूते हुए अशोक वाजपेयी के कविता संग्रह "शहर अब भी सम्भावना है" से सामना हुआ और उसे पढ़ते हुए लगा कि मैं भी फूल खिला सकता हूँ। मेरी किशोरवय में एक ऐसा कवि सामने आया जिसने असंख्य छायाभासों, काँपते-सिहरते लयों के सुनसानों, झिलमिल उत्सुक उजालों के बहावों, खुलती आभाओं और उषाओं के गर्भ से जैसे फिर एक बार आवाज दी हो। अपने मन में पूरी धरती लिए वसन्त की कामना करते अशोक वाजपेयी अपनी कविता की सीढ़ियों के पास खिलती वसन्त-सुमन की कोई रक्ताभ धुन सुनने को कवि निराला की तरह आकुल लगते हैं -
मैं ही अपना स्वप्न मृदुल कर
फेरूँगा निद्रित कलियों पर
जगा एक प्रत्यूष मनोहर।
पुष्प-पुष्प से तन्द्रालस लालसा खींच लूँगा मैं,
अपने नव-जीवन का अमृत सहर्ष सींच दूँगा मैं,
व्दार दिखा दूँगा फिर उनको
हैं मेरे वे जहाँ अनन्त --
अभी न होगा मेरा अन्त।
अशोक वाजपेयी किसी हरित-पुष्पित कविता कानन से आवाज देते लगते हैं और उनकी कविता मुझे अपनी हरी अँगुलियों से अपने पास बुलाती है। उनकी यह कविता मेरी शिराओं में हरे रक्त की तरह बहने लगती है। कवि की आँखों में फिसलती हरी परछाईंयाँ मेरी आँखों में फिसलती हैं, कवि के कन्धों पर ठहरा हरा आकाश अपने कन्धों पर निर्भार महसूस करता हूँ और मेरे होंठ भी कवि की तरह एक हरे गान में काँपने लगते हैं। वसन्त में डूबी हुई हरी पत्तियों की दीप्त रचना मुझे अपनी ओर खींचती चली आती है और मैं महसूस करता हूँ - दो हथेलियों के बीच एक सूर्यकुसुम, दो चेहरों के बीच एक सूर्यनदी और दो देहों के बीच एक सूर्यआकाश। मेरे तन की धरती और मन के आकाश में अशोक वाजपेयी की कविता ऐसी छायी कि अब तक बरसती है। वह मुझे मेरे दुर्दिन की कम सुदिन की कविता ज्यादा लगती है, वह दुख का उतना नहीं जितना सुख का गौरव बढ़ाने वाली कविता है, जैसे कि कवि-स्मरण में नागफनी -
तेरे स्मरण का असीम सुख मुझे
कि काँटा भी फूल आया मेरे बागीचे।
कभी मैंने नरेश मेहता की कविता में गायत्री फूल को एक बार फिर खिलते हुए अनुभव किया फिर एक फूल से दुखे हुए पिता के कविमन में डूबने की चेष्टा की। श्रीकान्त वर्मा की कविता के आँगन में दुखी-सी खड़ी गुलचाँदनी से सामना हुआ और रघुवीर सहाय तो यहाँ तक कह गये कि फूलों में वो बात नहीं है जो फूलों में होती है और धूमिल की कविता में सौन्दर्य में जब स्वाद का मेल नहीं मिलता तो महुए के फूल पर कुत्ते मूतते हैं। पर अशोक वाजपेयी की कविता का शरीर सौन्दर्य के स्वाद में ही गुँथा हुआ मिलता है जहाँ कवि अपनी काव्य वासना से उसे और उत्सुक और सुन्दर कर लेने में तल्लीन है जहाँ -- अँधेरी उत्सुक देहें उज्जवल गुम्फन में कुसुमित होती हैं और तृप्ति में स्थिर होता जाता है सौन्दर्य। उनकी कविता में कई-कई बार एक वसन्त दिन आता है -
आज का दिन पूरा का पूरा एक वसन्त है
और तुम एक वृक्ष हो
अपनी हर उग सकने वाली पत्ती के
और अपने हर खिल सकने वाले फूल के साथ
और सिर्फ इतनी झुकी हुई
कि मैं तुम्हें उठँग कर छू ले सकता हूँ ।
अशोक वाजपेयी पर कविता कुसुमित देह की तरह झुकती है। वे कविता रचते हैं तो लगता है मानो उसे अपने नर्म हाथों से छू रहे हैं। कभी तो कवियों ने महसूस किया कि अपार काव्य संसार को पार करने के लिए उनके पास तिनकों से बनी छोटी-सी नाव है। कभी उन्हें लगा कि पूर्वज कवियों ने जो काव्य-सेतु बाँध दिए हैं वे उन पर चलकर कविता की नदी को पार कर सकते हैं। कभी उनने काव्य-फल को पाने के लिए लम्बे हाथों की कामना की। ऐसी ही किसी काव्य-स्मृति में डूबे विनयी कवि अशोक वाजपेयी अपने समय में हरियाली देखकर अपने लिए फूलों की नाव और राग-स्पर्श के लिए छोटे हाथों की कामना करते हैं --
ये बड़े हाथ छोटे हों
मेरी कड़ी गदेलियाँ नरम बनें
यह हरा-हरा-सा जल
थोड़ा-सा पी लूँ मैं
अपनी फूलों - बनी नाव,
फिर सोचूँ,
अगर बहा दूँ,
कब तक, कितनी दूरी तक तैरेगी
हरे-हरे-से जल में।
ये बड़े हाथ छोटे हों --
मेरी कड़ी गदेलियाँ नरम बनें।
कवियों ने देह को भवसागर पार करने की नौका माना है तो निश्चय ही कविता उसकी पतवार होगी। जब कोई झंझावात इस नौका को डुलाता है तो कविता की पतवारें ही उसे सँभालती हैं। अशोक वाजपेयी की कविता मेरे किशोर अनुभव में पतवार की तरह मुझे मिली, उनकी कविता में फैली उस आभा की तरह जो -- अस्पष्ट नेत्रों की शान्ति में, उँगलियों के तप्त छोरों पर, जीवित शब्दों से दीप्त अधरों पर झलकती है...
सागर शहर से चार-पाँच किलोमीटर दूर भैंसा गाँव में हमारी छोटी-सी खेती-बाड़ी थी और इसी गाँव में कवि आग्नेय की जमीन भी थी। साठ के दशक के अंतिम वर्षों में अशोक वाजपेयी हमारे गाँव आते थे। याद आता है कि कभी वहाँ उनके साथ आयी उनकी प्रिया को भी दूर से देखा था। शायद हमारे गाँव में उनके छिपने की जगह थी। आठवें दशक की शुरूआत में अशोक वाजपेयी से पहली बार मिला जब वे मध्यप्रदेश कलापरिषद् के सचिव बनाये गये और सागर आये। उन्हीं दिनों मदन सोनी देवरी से सागर आकर रहने लगे। कवि-कथाकार रमेशदत्त दुबे, गोविन्द व्दिवेदी, नवीन सागर, ब्रजेश कठिल, अनिल वाजपेयी, ऋषभ समैया और मुकेश वर्मा को मिलाकर एक अच्छी खासी मित्रमण्डली थी। इनमें ज्यादातर कवि थे। अशोक वाजपेयी के साथ कवि आग्नेय भी आये। उनके आगमन पर ऋषभ समैया के घर एक कवि गोष्ठी हुई। कविताएँ सुनकर अशोक जी मदन सोनी के बारे में एक भविष्यवाणी भी कर गये कि यह पोएट ग्रो करेगा। जो आज तक सही साबित न हो सकी और मदन सोनी को आलोचक होकर ही काम चलाना पड़ रहा है ।
कलापरिषद् से साहित्य और कलाओं की आलोचना पत्रिका "पूर्वग्रह" का प्रकाशन अशोक वाजपेयी के सम्पादन में प्रारम्भ हो चुका था और अपनी शुरुआत से ही इस पत्रिका ने अनेक साहित्य-कला विवादों और सम्वादों को जन्म दिया। उन दिनों नया प्रतीक, आलोचना, कल्पना और माध्यम जैसी साहित्यिक पत्रिकाएँ भी निकल रही थीं। साहित्य की दुनिया में धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान और सारिका जैसी पत्रिकाएँ भी अपना सिक्का जमाए थीं। पूर्वग्रह ने साहित्य और कलाओं के वैचारिक पक्ष को एक बड़ी चुनौती के रूप में लिया और वह उनके अन्तर्निभर पड़ौस में व्यापक सम्वाद का मंच बनती चली गयी, फिर हिन्दी में उसका मुकाबला कोई और पत्रिका न कर सकी। हम नये कवि उसे बड़े मनोयोग से पढ़ रहे थे।
उन दिनों अशोक वाजपेयी ने त्रस्त होकर यह कहा कि -- हिन्दी का संसार आलोचक का संसार नहीं रहा, वह टिप्पणीकार और विचार नियामकों की एकरस उबाऊ दुनिया बनकर रह गया है। ...अब बहस वफादारी, विचारधारा और हमारी-उनकी सूचियों को लेकर हो रही है, साहित्य उसके केन्द्र में नहीं है। विरोधी दृष्टियों में सम्वाद नहीं हो रहा है, जो सहमत और प्रायः एकमत हैं वही एक-दूसरे से बतिया रहे हैं। ...कीर्तियाँ पुस्तकों से नहीं, गोष्ठी या परिसम्वादों में दिए गये वक्तव्य या खण्डन-मण्डन से बन रही हैं। ...जो हमसे असहमत हैं उसे साहित्य के देश में रहने का अधिकार ही नहीं, यह धारणा बलवती हो रही है, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। अशोक वाजपेयी ने यह भी रेखांकित किया कि हमारी बुध्दि साहित्य से, अक्सर उसकी लड़ाईयों से इस कदर आक्रान्त रही है कि उसने दूसरी कलाओं को गम्भीरता से लेने और उनके सच को समझने-बूझने की जरूरत ही महसूस नहीं की है। उन दिनों दो शिविरों में बाँट-से दिए गये साहित्य के बीच "पूर्वग्रह" पत्रिका सक्रिय रूप से खुलकर प्रकाश में आयी और विपरीतों के सामंजस्य की भूमि भी बनी ।
मदन ने अपने आलोचक जीवन की शुरुआत निर्मल वर्मा के "एक चिथड़ा सुख" उपन्यास की समीक्षा से की। जो "पूर्वग्रह" में छपी और छपने से पहले इस समीक्षा का पाठ मैंने अपने घर पर रखा जिसे सुनने वे लेखक भी आये जो निर्मल वर्मा को दक्षिणपंथी और रूपवादी कहते थे। समीक्षा सुनते ही उनने हमें भी इसी कुतर्क से घेर लिया। शुरुआत में ही हम उनको ताड़ गये और उनकी सोहबत से बच गये। हमारे रच-बच जाने में "पूर्वग्रह" पत्रिका की भी बड़ी भूमिका है।

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