ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
नव वर्ष का अभिनन्दन
01-Jan-2016 12:00 AM 2584     

न्यता है कि रोमन देवता जेनस के दो चेहरे हैं। एक से वह आगे और दूसरे से पीछे देखता है। साल के पहले महीने का नाम जनवरी इसी रोमन देवता के सम्मान में रखा गया। एक से वह बीते हुए वर्ष को देखता है और दूसरे से अगले वर्ष को। बीते साल की संवेदना, स्मृति और सिलसिले के वाहक होने के साथ आगे के पथ की सम्भावनाओं के अन्वेषण की प्रस्तुति का प्रतीक। गर्भनाल पत्रिका ने गत दिसम्बर को अपने पथ की यात्रा के दसवें वर्ष में प्रवेश किया। जनवरी, 2016 आगे की राह की सम्भावनाओं को उद्घाटित करने का आह्वान करता है। विगत नौ सालों की बात इस एक जुमले में समेटी जा सकती है, लोग आते गए, कारवाँ बनता गया। नए साल का अभिनन्दन करते हुए हमें इसकी सम्भावनाओं के संकेत मिल रहे हैं कि आगे का काल--खण्ड राह सर्वथा नई प्रजाति की चुनौतियाँ प्रस्तुत करेगा। हमारे जैविक अस्तित्व को और सांस्कृतिक विरासतों के लिए खतरे की घंटी की आवाज सुनाई पड़ रही है। पेरिस में सद्य आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में विकसित, एवम् विकासशील देशों के शीर्ष नेताओं का अपने-अपने निहित स्वार्थ के परे सोचने को बाध्य होना इसी का नतीजा है। अपने देश भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रदूषण के सवाल को प्रमुखता से रेखांकित किया गया है और द्रुत उपचारात्मक उपायों का सुझाव दिया है। जीवमंडल की गतिविधि से पर्यावरण में सन्तुलन कायम रहता है। पर्यवरणविद् बताते हैं कि जीवमंडल की हर प्रजाति पर्यावरणीय सन्तुलन बनाए रखने में सकारात्मक योगदान करती है। मनुष्य एकमात्र ऐसी प्रजाति है जिसकी अनुपस्थिति से पर्यावरणीय सन्तुलन में कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता और जो अपने विवेकहीन आचरण से जीवमंडल का और अन्ततः पृथ्वी का विनाश कर सकता है। नए साल के लिए हम कामना करते हैं कि हमारा पर्यावरणीय विवेक विकसित हो। आज इसको रेखांकित करने की जरूरत है। पहले हमारे गुरुजन हमें मनुष्य बनने के आशीष देते थे। मनुष्य वह होता है जो अपनी आवश्यकता पर अपनों की आवश्यकता को प्राथमिकता दे। इसीलिए वह जीवमंडल में विशिष्ट होता है। लेकिन आज अपने स्नेहाधिकारियों के लिए प्रतियोगिता में सफलता और येन केन प्रकारण उन्नति कर पाने की ही हमारी शुभकामनाएँ और सहभागिता रहती है। अपनी अकल्पनीय उपलब्धियों की बदौलत आज मनुष्य अपने और अपने पर्यावरण को प्रभावित करने की मारात्मक क्षमता से लैस हो गया है। इसलिए उसे पर्यावरणीय विवेक की अनिवार्य आवश्यकता है। वह अपने द्वारा अर्जित वरदान को भस्मासुर की तरह अपने विनाश का साधन बना सकता है। इसकी सम्भावना इसलिए भी लगती है कि आज हमारी प्राथमिकता में प्रतियोगिता और सफलता का स्थान है। जबकि समाज, संस्कृति और सभ्यता के सुस्वास्थ्य के लिए मूल्यबोध की अनिवार्य आवश्यकता होती है। जिसके लिए हमारे मन में सम्मान नहीं है। सात समुद्र, तेरह नदी पार... हिन्दी समाज में एक मुहावरा है। वि?ा के विभिन्न महादेशों में पसरे हिन्दी समाज का हम नए वर्ष के अवसर पर अभिनन्दन करते है। गर्भनाल पत्रिका उनके संघर्ष, अनुभवों, उपलब्धियों, और सहकारिता को शेयर करने का मंच है। हमारे सहकर्मी प्रोफेसर वर्मा से गप्पशप्प हो रही थी। उन्होंने कहा, मैं कभी-कभी अपने आपको संयुक्त परिवार की बहू जैसा महसूस करता हूँ। ससुराल में मायके की निन्दा अच्छी नहीं लगती और मायके में ससुराल की। लेकिन इससे बचा भी नहीं जा सकता। हम बिहार के सीवान के एक कॉलेज में काम करते थे और वे यू.पी. के इलाहाबाद से आए थे। यहाँ लोग जब उत्तर प्रदेश के लोगों की खामियों का कीर्तन करते, तो उन्हें लगता कि परोक्ष रूप से उनको सुनाया जा रहा है और इलाहाबाद में उन्हें बिहार का विद्रूप करने वाले जुमले सुनाए जाते। सामान्यतः प्रवासियों को ऐसी अस्वस्ति हुआ करती है। दोहरी नागरिकता नहीं रहते हुए भी दोहरी निष्ठा तो रहती ही है। प्रवासियों की पहली पीढ़ी की तुलना में परवर्ती पीढ़ियों का अपने गर्भनाल से मोह कम होता जाता है, वे अनुकूलन की प्रक्रिया के एक भिन्न दौर में होते हैं। जीव-जगत, खासकर मनुष्य प्रजाति, के लिए देशान्तर-वास अथवा आप्रवास एक निरन्तर प्रवाहमान प्रक्रिया रही है। इस प्रक्रिया के नतीजे में ही अफ्रीका महादेश की सीमा में विकसित मनुष्य आज धरती पर के हर सुगम एवम् दुर्गम इलाके में आबाद है। इस प्रक्रिया के जरिए मनुष्य अपने पैत्रागतिकी सम्पद के साथ-साथ अपने सांस्कृतिक उत्तराधिकार को भी नए-नए परिवेश में अनुकूलित करता रहा है। इस अनुकूलन की प्रक्रिया से नई पहचान और नई संस्कृतियों का उदय होता रहता है। अनुकूलन की प्रक्रिया सहज नहीं होती। उनके अपने संघर्ष होते हैं, अपनी यन्त्रणाएँ होती हैं और अपनी उपलब्धियाँ होती हैं। पहचान के संकट और प्रश्न से गुजरना होता है उन्हें। आप्रवासियों की पहली और परवर्ती पीढ़ियों की कहानियाँ भिन्न हुआ करती हैं। अट्ठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में आप्रवासियों के लिए क्रूसिब्ल या मेÏल्टग पॉट (पिघलता कड़ाह) की उपमा के द्वारा विभिन्न राष्ट्रीयताओं, विभिन्न नस्लों और संस्कृतियों के आपस में घुल-मिल जाने की प्रक्रिया का वर्णन किया जाता था। आप्रवास और नई आबादी के बसने की आदर्श प्रक्रिया की उपमा के रूप में इसका उपयोग किया जाता था जिसके जरिए अलग-अलग जातीयताओं, संस्कृतियों और नस्लों के लोग आपस में घुल-मिलकर एक सच्चरित्र समाज बनकर उभड़ते हैं। बीसवीं और इक्कीसवीं सदियों में प्रौद्योगिकी के अभावनीय प्रगति एवम् सहज उपलब्धता ने आदमी के लिए देशान्तरवास काफी सुगम और सहज कर दिया है। इसके नतीजे में अब सम्भव है कि आप्रवासी अपने मूल स्थान से निरन्तर सम्पर्क बनाए रख सकें। फलस्वरूप वे अपने मूल स्थान से पूरी तरह विच्छिन्न नहीं होते और मेजबान राष्ट्र में पूरी तरह परिपाचित नहीं हो पाते। इसलिए "मेÏल्टग पॉट' की उपमा उपयुक्त नहीं रह जाती। इस तरह के समाज की उपमा के लिए "सलाद-बाउल' का प्रारूप उपयुक्त समझा जाता है। इस प्रारूप के अनुसार आप्रवासियों के लिए अपनी संस्कृति और परम्पराओं का पूरी तरह त्याग करना जरूरी नहीं होता। इसकी युक्ति का आधार है कि देशान्तरवासी अपने आपको प्रथमतः नए राष्ट्र का और बाद में अपने मूल राष्ट्र का नागरिक मानें। इससे वे अपनी सारी सांस्कृतिक परम्परा और रीति-रिवाज को बरकरार रखते हुए संकट के समय अपने मेजबान राष्ट्र के हित को सर्वोपरि मानते हैं। अगर ऐसा हो सके तो आप्रवासियों को उनके नए राष्ट्र की अग्रगति, एकता और वृद्धि में कोई रुकावट का कारण नहीं कहा जा सकेगा। साथ ही साथ बहु-संस्कृतिवादियों को भी बहुत हद तक सन्तुष्टि मिल सकेगी। सलाद-बाउल प्रारूप में देश की विभिन्न संस्कृतियाँ सलाद के घटकों की तरह पास-पास में रहते हुए अपनी खासियतें बरकरार रखती हैं। अब यह प्रारूप राजनीतिक रूप से अधिक सही एवम् सम्माननीय माना जाता है, क्योंकि यह हर विशिष्ट संस्कृति को अभिव्यक्ति देता है। इस विचारधारा के हिमायतियों का दावा है कि परिपाचनवाद आप्रवासियों को उनकी संस्कृति से विच्छिन्न कर देता है, जबकि यह समझौतावादी विचारधारा उनके और उनकी बाद की पीढ़ियों के लिए अपने मेजबान राष्ट्र के प्रति निष्ठा को सर्वोपरि रखते हुए अपने वतन की संस्कृति के साथ जुड़े रहने की राह हमवार कर देती है। चलते चलते : मेरे एक बांग्ला भाषी सह्मदय मित्र श्री पवित्र कुमार दत्ता जबलपुर निवासी हैं। वे रसायन शास्त्र के प्राध्यापक रहे हैं। उनके पुत्र ने तमिल भाषी सहपाठिनी से विवाह किया। दत्ता साहब ने नए सदस्य को परिवार के साथ समन्वयित करने के लिए पुत्रवधु को बांग्ला पढ़ने, लिखने और बोलने में सक्षम करने का निर्णय लिया। उन्होंने च्र्ड्ढठ्ठड़ण् न्र्दृद्वद्धद्मड्ढथ्ढ एड्ढदढ़ठ्ठथ्त् नाम से 85 पन्नों की एक पुस्तक लिखी। इसमें अंगरेजी तथा हिन्दी के जरिए बांग्ला की वर्णमाला, प्रारम्भिक व्याकरण, वाक्य गठन तथा उच्चारण सहज उदाहरणों के माध्यम से वर्णित है। उसका नतीजा है कि उनकी पुत्रवधु सहज रूप से बांग्ला बोलती तथा पढ़ती हैं और पति के विस्तृत परिवार में सहज रूप से सम्मिलित रह पाती हैं। उनके प्रोजेक्ट की शानदार सफलता से उत्साहित होकर मित्रों ने इस पुस्तक की पाण्डुलिपि को प्रकाशित करने का सुझाव दिया है ताकि प्रवासी बांग्ला भाषियों के लिए उपयोगी हो।

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