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स्वभाव, सम्बन्ध, सभ्यता
01-Feb-2018 10:15 AM 2346     

हम एक बोधमय नित्यता में सदा रहते आये हैं। इसका अनुभव हमें अपने स्वभाव के अनुरूप हुआ करता है। हमारा यह स्वभाव हमें मिली जन्मजात प्रकृति के न्याय से स्वतः संचालित है। इसे हठपूर्वक बदला तो नहीं जा सकता पर बोधमय नित्यता के आइने में अपनी ही प्रतिपल मिटती जाती देह को निहारकर उसे अपने जन्म और मृत्यु के बीच की जगह में कमल पत्र पर ठहरी हुई बूँद की तरह कर्म कुशल जरूर बनाया जा सकता है। इस संसार में कोई दूसरा नहीं जो हमारे कर्मों की रचना करता हो। हमारा स्वभाव ही हमारा रचयिता है और हम किसी के नहीं, अपने ही स्वभाव के पक्के समर्थक हैं। हम अगर देख पायें तो पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश जन्म से ही हमारे समर्थन में खड़े हैं और इनके समर्थन के बिना हमारी मृत्यु भी सम्भव नहीं। ये हमें जीवनभर अपने रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द में तो डुबाये ही रखते हैं, हमारी मृत्यु भी इन्हीं में घुल-मिल जाने से होती है। ये हमारी कामनाओं के घर जैसे हैं, जहाँ कामनाओं के पूरे होने में विघ्न आते ही रहते हैं और ये विघ्न कामनाओं के उन दबे-छिपे अंधेरे कोनों की तरह हैं, जहाँ निराशा और खीज के जाले बुने जाते हैं और जिन पर हमारी महत्वाकाँक्षाओं की मकड़ियाँ झूलती रहती हैं। इन जालों के परदे की ओट में वह बोधमय आईना ओझल होने लगता है जो हमें अपनी प्रतिपल मिटती छबि की याद दिलाता रहता है।
हम जो इस दुनिया में न जाने कब से होते आये हैं, अभी हैं और आगे भी होंगे, हमारी पहचान चार तरह से की जाती रही है -- हममें-से ज्यादातर लोग ऐसे होते आये हैं जो किसी-न-किसी तरह अपने संकटों का निवारण करते हुए अपना काम चलाते हैं, नहीं चल पाता तो दूसरों को पुकारते हैं, दया की भीख माँगते हैं। जब कोई दया नहीं करता तो ईश्वर को आवाज लगाने की विफल चेष्टा किया करते हैं, उसे कई नामों से पुकारते हैं और निराशा हाथ लगती है तो काल को, अपने कर्मों को और ईश्वर को अपने दुर्भाग्य के लिए दोषी भी ठहराया करते हैं।
जो दूसरी तरह के लोग देखने में आते हैं वे अपनी शक्ति भौतिक साधनों की खोज और उनके संग्रह में खर्च करके उससे लाभ कमाने की कामना से जीते हैं और अक्सर यह भूल भी जाते हैं कि कहीं उनकी यह प्रबल कामना पृथ्वी के उन साधनों की लूट में तो नहीं बदल रही जिन्हें अपने स्वभाव से ही उपकारी पृथ्वी मनुष्य सहित सम्पूर्ण प्रजा के लिए सहेजती रहती है -- वह ग्रीष्म में झुलसकर वर्षा का आवाहन करती है और अपनी गोद में बीजों के बसेरे की जगह बनाती है जहाँ बीजों के भीतर छिपा बहुरंगी जीवन अपनी पलकें खोलता है। शरद की चाँदनी में झलमलाती धरती सबका घर चलाने की तैयारी में मगन लगती है। हेमन्त ऋतु में अपनी फसलों को पाले की चादर ओढ़ाती फिर शिशिर में उन्हें गुनगुनी धूप दिखाती है और बसन्त का समय पाकर अपने सारे उपहारों को हमें सौंप देती है।
पृथ्वी के इन उपहारों की कद्र करने वाले तीसरी तरह के लोग भी पहचाने जाते हैं जो यज्ञ भावना से जीवनयापन करने में ही अपना और सबका हित देखा करते हैं। वे अपने आपको त्यागकर ही भोगने का अभ्यास किया करते हैं और अपनी जरूरत से ज्यादा पृथ्वी के उपहारों को खर्च किये बिना सबके लिए छोड़ने की शुभकामना से भरे रहते हैं। जीने का ऐसा अभ्यास करने वाले लोग दुनिया में निरन्तर कम होते जा रहे हैं। आज धर्म, रा़जनीति और बाजार के कारनामें देखकर लगता है कि ये तीनों मिलकर इन सुकर्म करने वाले महानुभावों का ही जीना मुश्किल किये दे रहे हैं ।
चौथी तरह के लोग वे हैं जो इतने कम होते हैं कि उन्हें ही अल्पसंख्यक कहा जाना चाहिए। ये ऐसे लोगों में गिने जाते हैं जो संसार को ही व्यर्थ मानकर उसे डिगाने में संकोच करते हैं। वे संसार के प्रति निष्ठुर करुण भाव से भर कर अपने अंगों को कछुए की तरह सिकोड़कर जीते रहते हैं। धुन्ध के बीच से आता-जाता संसार गंगा किनारे कछुए की पीठ को शिला ही समझ लेता है, कभी उस पर बैठकर नहा लेता है, कपड़े धो लेता है, उसी पर खड़े होकर सूर्य को जल चढ़ा देता है। संसार को भ्रमवश रस्सी में साँप, सीप में चाँदी देखने का जन्मजात अभ्यास है तो कछुए की पीठ को वह शिला क्यों न समझे ।
प्रायः यह प्रश्न मन को मथता रहता है कि ज्ञानवान लोग संसार के अलावा ऐसा क्या पहचान लेते हैं कि उन्हें इसी संसार में अपनी पहचान छिपाकर जीना पड़े और संसार ऐसा क्या भूला रहता है कि उसकी पहचान छिपाये नहीं छिपती।
अनुभव में आता है कि हमारे स्वभाव में ही ममता और निर्ममता होती है -- ये दोनों भाव हमारे मानस सरोवर में जीवन नौका को खेने की पतवारों जैसे हैं। अकेली निर्ममता से पार नहीं पाया जा सकता, उसे तो ममता का भी सहारा चाहिए। एक साथ ये दोनों सहारे संसार में ही मिलते हैं और कहीं नहीं। जो लोग सिर्फ अपने को पाकर सदा के लिए संसार को खो देना चाहते हैं उनसे संसार की पटरी नहीं बैठती। देखने में यही आता है कि जो संसार के साथ चलते हैं, वे ही उसे चलाते हैं। संसार किसी के पाने और खोने के विचार से नहीं चलता, वह तो सिर्फ अपने होने से चलता चला आ रहा है ।
सम्बन्ध कोई मायाजाल नहीं हैं जिन्हें हथकड़ी की तरह पहना दिया गया हो। वे होते ही हैं और संसार में आते ही अपने आप जुड़ जाते हैं। संयोग से मिले माता-पिता-बन्धु हर नये जीवन को सहज ही गोद में उठा लेते हैं। जो धरती सहज ही सबको अपनी गोद में लिए हुए है, वह भी इस कामना से भरी दिखाई देती है कि उसकी गोद कभी सूनी न हो। जब कभी वह परद्रोहियों के भार से कराह उठती है तो अपने तारने वालों को भी आवाज देती-सी लगती है। किसी और लोक से नहीं, हमीं में-से कोई उसकी आवाज सुन लेता है -- अपनी ममता और निर्ममता को साधकर पृथ्वी की पीड़ा हरने के उपाय करता है ।
संसार एक बड़ा जीवन उद्योग है जिसे इसी में अंतर्निहित तात्त्विक निर्ममता चला रही है और यह ममत्त्व से मिली सांत्वना से ही पाला-पोसा जाता है। बिरले ज्ञानियों को छोड़कर संसार की दिलचस्पी इस उलझन को सुलझाने में उतनी कभी नहीं रही कि संसार को रचता कौन है और वह कैसे मिटता रहता है। वह तो सदा इस चिन्ता में खोया रहता है कि उसके पालने-पोसने के साधन और उन्हें बचाये रखने की कला कहीं खो न जाये। सदियों से इसी चिन्ता में खोये संसार ने अपनी ममता को प्रकृति की अँगनाई में दूर-दूर तक फैलाया। क्षिति-जल-पावक-गगन-समीर के प्रति वह कृतज्ञ हुआ। संसार ने युगों-युगों तक नदी-सरोवरों, पेड़-पौधों को सहेजा और पशु-पक्षियों की रक्षा की। सूर्य को पिता कहकर पुकारा, पृथ्वी को माता की संज्ञा दी, जल को जीवन का आधार मानकर उसे सदा अंजुरी में भरकर प्रणाम करता रहा, आग पर फूलती रोटी उसे देवताओं के वरदान जैसी लगती रही और संसार जिन गुणों और अवगुणों से सना हुआ है उन्हें भजते हुए उनके प्रति अपनी श्रृद्धा और विश्वास प्रकट करता रहा। प्रकृति ही हमारी पाठशाला बनी, हमने उसके साथ रहकर ही जीना सीखा।
देखते-देखते वह समय न जाने कब पीछे छूट गया जब राज्य के विस्तार की कामना ने शायद ही कभी संसार की चक्की को चलाने वाले वरदानों की उपेक्षा की हो। आज भी हमारी न्याय व्यवस्था देवताओं को नाबालिग मानती है -- सचमुच पूरी प्रकृति नाबालिग बच्चों जैसी है। कलकल बहती नदियाँ, हवाओं में झूमते वृक्ष, रार मचाती हवा, लहरों पर खेलती मछलियाँ, आकाश में झिलमिलाते अरबों तारे न जाने कब से बच्चों जैसे ही तो हैं। इनके साथ संभलते हुए इन्हें संभालना पड़ता है। वह राज्य व्यर्थ हो जाता है जिसमें देवता प्रजा को पालने-पोसने में असमर्थ होने लगे। संसार युगों से जानता आया है कि सूर्य है जीवन का आधार, जल है पालनहार तभी धरती करती है उपकार। राज्य तो प्रतीक मात्र है, देवता क्या जाने किसकी है सरकार --
यह कैसा कामनाओं का विस्तार अपने धर्म से निरपेक्ष हुआ राज्य, राज्य से निरपेक्ष बाजार डूब रहा संसार
कामनाओं की छत के नीचे काँपती लौ के प्रकाश में अपनी छबि बचाते देवता घिरे बैठे हैं, लोभ की दीवारों के बीच
आज हम भारत के लोग दोषारोपण के समय में जी रहे हैं। जिम्मेदारी कोई नहीं ले रहा, सब एक-दूसरे को दोषी मानकर निश्चिन्त दिखाई पड़ते हैं। हमारे राजनीतिक दलों की हालत हम देख ही रहे हैं। क्या हम भारत के और दूर-दुनिया के लोग सरकार इसलिए बदलते हैं कि पिछली सरकार के पापों को नयी सरकार भी ढोती रहे। दरअसल भारत सहित पूरा विश्व सात सामाजिक पापों में लिप्त दिखाई देता है। करीब सौ साल पहले सभ्यता समीक्षा करते हुए महात्मा गांधी ने इन पापों की याद दिलाई थी -
गांधी जी की दृष्टि में तत्वविहीन राजनीति पहला पाप है -- राजनेता यह नहीं समझ पा रहे हैं कि संसार एक बड़ा सार्वजनिक प्रजाक्षेत्र है उसे कुछ निजी हाथों में सौपकर नहीं चलाया जा सकता। विवेकविहीन विलास दूसरा पाप है, जिसे हम पूरी धरती पर फैलायी जा रही बाजारू प्रवृत्तियों में कहीं भी और कभी भी रोज ही देखा करते हैं। श्रमविहीन सम्पत्ति तीसरा पाप है जो हमें जुआ और सट्टा खेलती दुनिया में रोज दिखाई देता है। चौथा पाप है मानवताविहीन विज्ञान, जिसके परिणाम आतंक और युद्धों के रूप में प्रकट हो रहे हैं। नीतिविहीन व्यापार पाँचवाँ पाप है जो हमारे मत से गढ़ी गयी राज्य सत्ताओं की मदद से निजी क्षेत्रों में फल-फूल रहा है। छटवाँ पाप है त्यागविहीन पूजा, जिसके लिए धर्मों में भरपूर जगह मिली हुई है और चारित्र्यविहीन शिक्षण ही वह सातवाँ पाप है जिसे हम दिन-रात भोग लिप्सा में डूबे शिक्षित समाज में तो साफतौर पर देख ही रहे हैं।
हमारे बच्चे इसी पापाचार के बीच पाले-पोसे जा रहे हैं। हमारे जीवन को रूप-रस-गंध-स्पर्श और शब्द का संयम चाहिए। इस संयम के लिए सुन्दर और शान्त पृथ्वी चाहिए। पर इस समय हम अशान्त और कुरूप पृथ्वी के निवासी होते जा रहे हैं। हम कामनाओं की रोज नयी खिड़कियाँ खोलते, लोभ के वन्दनवारों से सजे द्वारों को पार करते न जाने कहाँ जा रहे हैं और इन्हीं दरवाजों से गुजरते हमारे बच्चे भी हमसे इतनी दूर होते जा रहे हैं कि हमारे साथ न रह पाने को अभिशप्त हैं। इतनी लिप्सा कि कुछ दिखाई न दे, इतना शोर कि कुछ सुनाई न दे। इतना स्वार्थ कि दूसरे की चिन्ता न हो, इतना भय कि प्रतिरोध की शक्ति ही चुक जाये। इतनी भाग-दौड़ कि ठिठककर सोचने की फुर्सत न हो ।
जब कोई सभ्यता अपने पाँवों से खींची गयी पगडण्डी को छोड़कर किन्हीं दूसरे रास्तों पर भटकने की तैयारी करने लगती है तो सबसे पहले पोषण की स्थानीयता छूटती है और फिर उसके बीच बनने वाले रिश्ते टूटते चले जाते हैं। जब हम देख रहे हैं कि जल-जंगल-जमीन-जानवर और जन बाजार के हाथों में सौंपे जा रहे हैं तो कोई भी रिश्ता नहीं बचेगा, सब टूटेंगे। चलिए, रसोई घर से शुरू करते हैं जहाँ गृहणियों के हाथों से स्वाद की विविधता छूट रही है। घर से दूर जाते लोगों के पास वे कंधे नहीं बच रहे हैं जिन पर सिर रखकर रोया जा सके। हम उन हाथों से कितनी दूर होते जा रहे हैं जिन्हें पीठ पर फेर देने से दुख हल्का हो जाता है। हम एक ऐसी रेलगाड़ी में बैठ गये हैं जो हमारे गाँव की सूखती जा रही नदी पर बने पुल से गुजर रही है और दूर उजड़ते जाते वन हमें एक गमगीन-सी मुस्कुराहट से भरकर देख रहे हैं। शायद वे इस उम्मीद से भरे हों कि हम उनके पास लौट आयेंगे।
क्या लौटना सम्भव है? जब बाजार घर तक आ गया हो तब क्या बाजार से लौटना सम्भव है? बाजार मंदिरों में प्रवेश कर गया है। वह तीर्थों में डेरा डाल चुका है। नदियों के किनारे आसन मारकर बैठा है, पर्वतों के शिखरों पर चढ़ गया है। अब बाजार ही हमारे भजन, भोजन और वेशभूषा का रचनाकार है। हमारे तीज-त्यौहारों में, सोलह संस्कारों में और दिन-दिन बढ़ते अखवारों में वह प्रवेश कर गया है। बाजार संसद में बैठ गया। कोचिंग क्लास का मास्टर जी बन गया है। अब बाजार ही खबरों का जनक है, ऐसी खबरों का जो हमें अपने आप से बेखबर बनाये रखें ।
वह टेलीविजन पर देवताओं को ब्राण्ड की तरह पेश कर सकता है। सात समन्दर पार से आये इस बाजार ने एक नये मारीच की रचना की है -- विज्ञापन ही हमारे समय का मारीच है जो हमें न जाने कहाँ दौड़ाये लिए जा रहा है। जब हम अपनी प्रकृति से बहुत दूर चले आते हैं तभी तो बहुरूपिये उसे हरने में सफल होते हैं। हमारी भाषा तक हमसे छूट रही है, हम जाने-अनजाने बाजार की भाषा बोलने लगे हैं। हम ईश्वर को कितना भी पुकारें उसके आने में देर लगती है -- धर्म की लाभ-हानि का हिसाब लगाने के लिए युगों तक प्रतीक्षा और धीरज चाहिए। पर जरा बाजार को फोन लगाइये, वह प्रकट होने में जरा भी देर नहीं करता। अब हमारे जन प्रतिनिधियों का चेहरा भी बाजार की फेस बुक पर दिखाई देता है।
क्या लौटना सम्भव है? आखिर कौन-सा रिश्ता है जो टूट नहीं रहा, हाथों से छूट नहीं रहा? हम जिन कॅालोनियों में रहते हैं, पड़ौसी को नहीं जानते। पर दूर दुनिया के कितने सारे दूकानदारों के नाम जानते हैं और उस दूकानदार का नाम नहीं जानते जो अपना चना-मूँगफली लेकर एक छोटा-सा लैम्प जलाये हमारे रास्ते मैं अभी भी खड़ा है। अभी भी उस कुल्फी वाले की आवाज पूरी तरह खो नहीं गयी है जो जेठ की तपती दुपहरी में हमारे दरवाजे पर अब भी सुनाई देती है -- झटपट मल्लाई वाला आग्यो। क्या लौटना सम्भव है? लगता है कि शायद नहीं। पर नाउम्मीदी में भी उम्मीद की जगह तो बनी ही रहती है और इसीलिए अब भी लगता है कि लौटना सम्भव है -- धरती अभी भी फलवती होकर घूम रही है। कुण्डों और सरोवरों में हम आज भी अपना वह प्रतिबिम्ब देख सकते हैं, अपनी वह छबि जो पहली बार जल के आईने में ही तो देखी होगी, शायद कुछ याद आ जाये। हवाएँ हमारे प्राणों के आरोह और अवरोह में बहने के लिए अब भी राजी हैं। आकाश अभी इतना नहीं फट गया है कि उसे रफू न किया जा सके। फिर सूरज तो कभी छुट्टी पर जाता नहीं और सवेरा किसी के रोकने से रुकता नहीं। गहन अंधकार में सितारों ने अभी झिलमिलाना कहाँ छोड़ा है।
क्या लौटना सम्भव है? लगता है कि हाँ, क्योंकि अभी भी स्मृति खो नहीं गयी है -- अब भी किसी खोये हुए स्वाद की याद आ ही जाती। कोई भूला हुआ स्पर्श देह को अभी भी रोमांचित करता है। कोई जानी-पहचानी-सी गंध अब भी साँसों में बसी है। रूह ने अभी रूप का अहसास कहाँ खोया है। अगर कोई सचमुच कहने पे आये तो उसे कहने से कौन रोक सकता है। टूटी हुई - बिखरी हुई दुनिया को अगर कोई फिर रचे तो उसे कौन रोक सकता है। अपने स्वभाव से इस बेमुरव्बत-बेवफा दुनिया में रिश्तों को वैसे भी कोई खास तवज्जो नहीं दी गयी है। इस दुनिया को हमेशा उन रास्तों की तलाश रही जिन पर चलते हुए आप-हम तो क्या खुदा से भी रिश्तेदारी हो जाती है।
और अंत में ई-रिलेशन पर कुछ शब्द -- यंत्रों पर आरूढ़ मनुष्य को यह प्रतीति कभी गहरे विषाद से भरने लगती है कि शायद वह तकनीकी की गिरफ्त में है। जब तकनीकी का विकास नहीं हुआ था तब भी मनुष्य अपने स्वभाव के अनुरूप यही सोचता था कि जैसे वह सांसारिक मायाजाल की ही गिरफ्त में है और इससे उसे मुक्त बने रहने का उपाय खोज लेना चाहिए। तब ही तो उसे अपने उस आत्मभाव की प्रतीति हुई जहाँ अपने स्वभाव और उससे उत्पन्न होने वाले फल को वह तटस्थ भाव से देख सका। आज तकनीकी के साथ भी उसको यही सम्बन्ध बनाना होगा। तकनीक मनुष्य के स्वभाव से उत्पन्न फल है। इस फल में लिप्त होने के कारण ही हमें लेपटॅाप और मोबाइल के स्क्रीन से सिर उठाने की फुर्सत नहीं मिल रही है। अगर हम उसे एक साधन की तरह प्रयोग करके स्विच ऑफ करने का अभ्यास कर लें तो तकनीक में यह गुण कहाँ है कि वह किसी भी उस रिश्ते को प्रभावित कर सके जिसे हम कभी तोड़ना नहीं चाहते और उस रिश्ते को जोड़ सके जिसे हम जोड़ना नहीं चाहते। करीब आने और दूर चले जाने में हमारा अहसास ही सच्चा संदेश वाहक है और जिसे महसूस करने के लिए तकनीक की नहीं रूह की जरूरत है।

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