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नई दुनिया का पुराना कवि
01-Aug-2017 11:15 PM 3022     

दो जुलाई 2017 को दिवंगत, 21 फरवरी 1924 को नवलगढ़, राजस्थान में जन्मे और गया बिहार में पले-बढ़े श्री गुलाब खंडेलवाल हिंदी के वरिष्ठतम साहित्यकार थे।
जैसे ही उनके निधन का समाचार मिला तो कई यादें ताज़ा हो गईं। बात जुलाई 2000 की है जब मैं अपने सबसे छोटे बेटे के पास अमरीका के ओहायो राज्य के सोलन कस्बे में था। एक दिन (तारीख़ निश्चित याद नहीं है लेकिन अमरीका के स्वतंत्रता-दिवस 4 जुलाई के आसपास की बात है।) बेटे ने बताया कि पास में ही एक्रन विश्वविद्यालय में भारतीयों का हिंदी का कोई कार्यक्रम है। जाना तो था ही। अपनी भाषा और अपने लोगों के साथ का महत्त्व उनसे दूर होने पर ही पता चलता है।
अमरीका के सभी प्रतिष्ठानों की तरह इस विश्वविद्यालय का परिसर भी बहुत बड़ा है। कार पार्क करके हल्की बूँदा-बाँदी में भीगते हुए निर्धारित स्थान ढूँढ़ रहे थे तो एक बुज़ुर्ग श्वेत महिला ने प्रश्न किया- कवि सम्मेलन? हमारे हाँ करने पर उसने इशारे से बताया- दैट साइड। शायद उसने हमारे कुरते-पायजामे से पहचान लिया था। आज भी सेवकों की यही पोशाक है, फिर चाहे वे हिंदी के सेवक हों या जनता के। हाँ, कीमत में बहुत अंतर होता है। बाद में पता चला कि वह महिला उस समय के अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के नार्थ ईस्ट ओहायो शाखा के अध्यक्ष डॉ. पुरुषोत्तम गुजराती की आयरिश पत्नी थीं। गुजराती जी बनारस के हैं। गुजराती नाम तो उन्होंने इसलिए रखा हुआ था कि उनके पूर्वज गुजरात से जाकर बनारस में बस गए थे।
कार्यक्रम में कई लोगों ने अपनी रचनाएँ सुनाईं। मैंने भी अपनी एक ग़ज़लनुमा रचना सुनाई। ग़ज़लनुमा इसलिए कह रहा हूँ कि मुझे ग़ज़ल का व्याकरण नहीं आता, वैसे ही जैसे स्कूल में पढ़ते हुए दोहे सही ढंग से कह लिया करता था लेकिन उसकी मात्राएँ गिनना नहीं आता था। उस रचना में दो पंक्तियाँ थीं-
जब पानी बिन फसल मर गई
तब आए समझाने मौसम।
जैसे ही मंच से उतरा, सबसे आगे की पंक्ति में बैठे, कढ़ाई वाला सिल्क का कुरता पायजामा और गले में कुरते के ऊपर चमकती सोने की चेन पहने, मँझोले कद के, सामान्य कद-काठी वाले, गौर वर्ण, लगभग 70-75 वर्ष के एक सुदर्शन सज्जन ने अपने पास की सोफेनुमा कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए कहा- यहाँ आ जाइए। मैं उनके पास बैठ गया। मेरी उक्त पंक्तियों दोहराते हुए बोले- बहुत बारीक पिसाई की है। बाद में जब सबसे अंत में उन्होंने काव्य-पाठ किया तो पता चला कि वे महाकवि गुलाब खंडेलवाल थे।
तब तक उनकी कोई 40 काव्य पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। 1941 में छपी उनकी पहली पुस्तक "कविता" की भूमिका निराला जी ने लिखी थी। उस समय उत्तरप्रदेश और बिहार में उनकी कई पुस्तकें पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही थीं लेकिन मैंने उनका नाम नहीं सुना था क्योंकि वे बहुत संकोची और शांत प्रकृति के व्यक्ति थे और नब्बे के दशक में ही अमरीका आकर बस गए थे। उन्हें बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए निराला, महादेवी, पन्त, रामकुमार वर्मा, हरिबंशराय बच्चन, बेढब बनारसी, श्री नारायण चतुर्वेदी आदि साहित्यकारों का सान्निध्य और मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। वहीं से उन्होंने 1943 में बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
मुझे किसी तथाकथित बड़े साहित्यकार का संस्मरण लिखने जैसा साहचर्य प्राप्त नहीं हुआ। वैसे भी बड़े लोग किसी को अपनी टाँग पकड़ने नहीं देते क्योंकि वे खुद किसी बड़े आदमी की टाँग पकड़ने में व्यस्त होते हैं। किसी दिवंगत व्यक्ति के बारे में नकली संस्मरण लिखना बहुत आसान है क्योंकि यदि गलती पकड़ी भी जाए तो संबंधित व्यक्ति कौनसा स्वर्ग से आकर प्रतिवाद करेगा? वैसे संस्मरण के मामले में इस बात का थोड़ा ध्यान रखना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति आपके जन्म से पहले दिवंगत नहीं हो चुका हो। वैसे हमने देखा है कि गत शताब्दी के अंतिम दशक में दिल्ली के एक दुस्साहसी युवा कवि ने वीरेन्द्र मिश्र का गीत पढ़ दिया। ऐतराज करने पर बोला- हो सकता है, उन्होंने मेरा गीत मार लिया हो।
इसके बाद तो जब भी अमरीका जाना हुआ तो गुलाब जी से प्रायः सत्संग होता था। कई बार तो ऐसा होता कि बेटा सवेरे ड्यूटी जाते समय मुझे गुलाब जी के यहाँ छोड़ देता। सारे दिन सत्संग होता। वहीं खाना, दोपहर में थोड़ा विश्राम और फिर अपराह्न में चाय-नाश्ते के बाद शाम को उनका बेटा कमल मुझे घर छोड़ देता। उनके साथ बातों-बातों में ही हिंदी साहित्य का पिछली शताब्दी के उत्तराद्र्ध का इतिहास जीवंत हो उठता। बहुत-सी आजकल दुर्लभ हो चुकी हिंदी पुस्तकें उनके पास देखने-पढ़ने का अवसर मिला। भोजन के मामले में भी वे उतनी ही रुचि लेते थे जितनी अपनी रचनाओं में शब्द-शब्द को सँवारने में। यह बात और है कि वे खुद कम खाते थे लेकिन साथ वाले को अधिक से अधिक खिलाने की कला में प्रवीण थे। वे हर कार्यक्रम में बहुत उत्साह से भाग लेते थे।
उनके और उनके समधियाने के कई परिवार अमरीका में आसपास ही रहते हैं। उन सबके साथ मिलकर गुलाब जी ने अमरीका में ही एक साथ बिहार, उत्तरप्रदेश और राजस्थान बसा रखे थे। बिहार इसलिए कि उनका समधियाना राजस्थान मूल के बिहारी परिवार से है, वे खुद राजस्थान मूल के, राजस्थान में जन्मे हैं और उनकी शिक्षा-दीक्षा बनारस में हुई। उनका इतने बड़े परिवार को भावनात्मक रूप से बाँधे रखना आजकल के ज़माने में आसान नहीं है। यह सब गुलाब जी और उनके समधी, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के श्लाका पुरुष डॉ. महादेव चाँद की व्यावहारिक बुद्धि का कमाल है।
अमरीका में अलीगढ़ विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों की एक संस्था है जो हर वर्ष प्रायः अक्टूबर में मुशायरे का आयोजन करती है। 12 अक्टूबर 2012 को क्लीवलैंड के ईस्ट लेक रेडिसन होटल में मुशायरे का आयोजन था। हिंदी में ग़ज़ल विधा कबीर जितनी पुरानी है लेकिन आधुनिक काल में लोग आपातकाल की परिस्थितियों से चर्चित दुष्यंत कुमार से हिंदी ग़ज़लों का प्रारंभ मानते हैं। वैसे इससे पहले गुलाब जी का हिंदी ग़ज़लों का संकलन आ चुका था। गुलाब जी इसमें आमंत्रित थे। वे मुझे भी अपने साथ ले गए। इस मुशायरे में निदा फ़ाजली भी भाग ले रहे थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता गुलाब जी ने की। मुझे भी अपनी दो-चार रचनाएँ पढ़ने का अवसर मिला। कहते हुए ख़ुशी होती है कि उर्दू कविता के मंच पर अब भी शालीनता बची हुई है। लगता है कि आप किसी साहित्यिक कार्यक्रम में आए हैं। कुल मिलाकर स्थिति हिंदी के मंचों से लाख दर्ज़ा बेहतर है।
शाम को हुए समझौते के अनुसार गुलाब की जो मुझे अपने घर छुड़वाना था। चूँकि रात बहुत हो चुकी थी, सो तय पाया गया कि मैं उन्हीं के यहाँ रैन-बसेरा करूँ। उनके घर के नीचे एक बहुत बड़ा बेसमेंट है जिसमें सभी प्रकार की सुविधाएँ हैं। वहीं एक कमरे में मैं सोया। रात को जब ठण्ड लगी तो मैंने अलमारियों में और इधर-उधर कम्बल-रजाई ढूँढे लेकिन कहीं कुछ नहीं मिला। मुझे यह ध्यान नहीं आया कि कम्बल बेडशीट के नीचे बिछे हुए भी हो सकते हैं। किसी तरह आधी-अधूरी नींद लेकर रात गुजारी। घर में सबसे पहले उठने वालों में मैं था लेकिन किसी को जगाना भी ठीक नहीं लगा। जब सब उठे तो नित्य कर्म से निवृत्त होकर चाय पीने लगे तो गुलाब जी ने पूछा- रात को नींद ठीक से आई।
मैंने उत्तर दिया- हाँ, लेकिन ठण्ड लगती रही।
गलती किसी की नहीं थी। उन्होंने कुछ नहीं कहा लेकिन मुझे लगा कि उन्हें इससे बहुत दुःख पहुँचा है। इसका विश्वास मुझे तब हुआ जब नाश्ते में मुझे बादाम का हलवा मिला। जब मैंने हलवा दुबारा लेने से मना किया तो उनकी पत्नी कृष्णा भाभी जी ने कहा-
खा लो, रात को लगी ठण्ड ठीक हो जाएगी।

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