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नदी-सी मैं
01-Mar-2016 12:00 AM 1029     


बाँहें फैलाए
स्वागत को आतुर
प्रतिक्षाकुल तुम
समो लेते हो मुझे...

बेकल मैं भी
समरस होने को
पनीली देह लिए
मीलों मील चली... अतृप्त

भेदकर चट्टानें
वज्र देह शिलाएं
यूँ लाँघती बेखौफ
गुजरती बीहड़ों से... तुम्हारी ओर

तपता मरुथल
शुष्क होने का भय
फिर भी बेसुध मैं
कभी मौन कभी चली... हरहराती

तेज हवाएँ
न मोड़ पार्इं रुख़
उफनती कभी मैं
कभी मैं सोता बन बही... तुम तक

सींचती धरा
उगाती हरितवन
तिराती... तिरती
छलकाती अंचल से वात्सल्य... संजीवनी बनी

मधु मादक सी
लुटाती शीतलता
युगों से युगों-युगों
लिए खयाल एक ही मिलोगे तुम... बाँहें फैला

प्रेम में होना
यूँ बहा ले जाता मुझे,
मीलों मील नेह लुटाती
प्रेम, प्रीत गति देता... अनुरागी

ये कोलाहल कैसा!
तुम से अलग कैसे!
तुम से पृथक की चाह क्यों!
प्रेम में होना बना देता तुम्हें भी... विशाल वक्षा

तुम तक न जाना
गति का रुक जाना
तुम्हारा अन्तर तल
जहाँ बसती हूँ मैं
उथला ही रह जाता... किनारों सा,
फिर कैसे थिरते तुम... रहते स्थिर!

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