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मुरलीधर वैष्णव
मुरलीधर वैष्णव
9 फरवरी 1946 को जोधपुर में जन्म। हिंदी और अंग्रेजी साहित्य में स्नातक तथा विधि स्नातक। राजस्थान न्यायिक सेवा में शामिल। जिला एवं सेशन न्यायाधीश पद से सेवानिवृत्त के बाद न्यायाधीश जिला उपभोक्ता मंच से न्यायाधीश के तौर पर जुड़े रहे। कहानी संग्रह "पीड़ा के स्वर", काव्य संग्रह "हैलो बसंत", लघुकथा संग्रह "अक्षय तूणीर" तथा चरित्र विकास की बाल कहानियाँ एवं पर्यावरण चेतना की बाल कथाएँ प्रकाशित। सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार, वीर दुर्गादास राठौड़ साहित्य सम्मान, समित्रानंदन पंत बाल साहित्य सम्मान तथा विशिष्ट साहित्यकार सम्मान से पुरस्कृत। सम्प्रति - राजस्थान न्यायिक अकादमी जोधपुर से अतिथि विधि प्रोफेसर के रूप में जुड़े हैं।

दोहे फागुन के
मुरली तौरी बांस की, फिर भी अति इतरातबांस के जंगल काट दूं तो निपटंू तौसे नाथ होठ भले प्रभु तौरे हो उनमें मेरी मिठासतीन लोक का क्या करूं तुम न मौरे पास कहां देवर की फब्तियां कहां भौजी की गारएसएमएस से मना रहे होली का त
मैं अकेला नहीं
हमारी टोली में तीन-तीन प्रशिक्षणाधीन मजिस्ट्रेटों को जिला मुख्यालय पर जिला न्यायाधीश के पास तीन माह के प्रशिक्षणार्थ भेजा गया था। राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी मरुभाग बीकानेर में मेरा प्रशिक्षणकाल वैसे तो आनन्दपूर्वक ही बीता। लेकिन उन दिनों मई, जून और
मेरी कविता
गाय को गुड़ चिड़िया को दानाभूखे की रोटी है कवितासूरदास की आंख जटायू पांख है कविताकभी खेत की फसलवीरों की नस्ल है कवितापर आज उदास है मेरी कविताबाजार के शोर में दबेसन्नाटे की बातें सुनती
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