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मुंबई की बरसात
01-Jul-2016 12:00 AM 6113     

इस साल जून के महीने में बरसात का कहीं नामोनिशाां नहीं दिखा। गरमी और पसीने से त्राहिमाम् करते लोगों को देखकर पिछले बरस की बरसात की शाुरूआत का खूबसूरत मंजर अनायास ही आंखों के आगे झूम उठता है। मई का महीना था, बरसात अभी शाुरू नहीं हुई थी। ऐसी ही एक शााम मरीन ड्राइव पर अपने पति के साथ पत्थर पर बैठे हुए हम वहां मौजूद तमाम लोगों के हाव-भाव एवं खुशाी को पढ़ने की कोशिाशा में लगे थे। यदि आप मुंबई वासी हैं तो यहां की बरसात की दगाबाजी से बखूबी वाकिफ होगें। कब, कहां से और कितनी जोर से बरसने लगें, इसका अंदाजा लगाना मुशिकल है।
आसमां साफ था, ताजी हवा का आनंद उठाने सैकड़ों लोग हर रोज की तरह उस रोज भी मरीन ड्राइव पर चलने फिरने एवं रोमांस में मस्त थे। तभी अचानक बरसात शाुरू हो गई। वहां मौजूद  लोगों के चेहरे अचानक खुशाी से खिल उठे। कॉलेज के छात्र जो शाायद किसी पार्टी में जाने की तैयारी के साथ आये थे, बिना उसकी परवाह किये बरसात की बूंदों की लय पर झूमने और भीगने लगे। हमारी बगल में बैठे एक उम्रदराज जोड़ा अनायास ही एक-दूसरे का हाथ पकड़ रोमांटिक हो उठा। सामने से बुर्के में चली आ रही कुछ महिलाएं उमस से निजात दिलानेवाली इस दिलकशा बरसात का लुत्फ़ उठाते हुए चली आ रही थीं। उनकी आंखों में खुशाी और बरसात में भींगने का रोमांच देखते ही बनता था।
बरसात के नाम से पुरवाई के शाीतल और तेज झोंके याद आते हैं। हवा में बढ़ती उमस आषाढ़ के आने की सूचना देती है। शाोर मचाता पवन खिड़कियों और दरवाजों पर दस्तक देने लगता है। नभ के कोने-कोने में कारी कजरारी तीतर पंखी बदरिया उमडने घुमड़ने लगती है, लगता है जीवन रस से भरपूर थिरकती, इतराती, मदमाती यौवन के भार से लदी-फदी, मृदंग की हल्की थाप से लेकर बुलंद गड़गड़ाहट वाले सारे तेवर अपने में समेटे, बरस पड़ने को आतुर मदमस्त घटाएं, कभी अपने कोमल जादुई स्पर्शा से रोम-रोम में प्रणय की मधुर स्मतियों को जगाती तो कभी प्रचंड गर्जना से सब कुछ ध्वस्त कर देने वाली विकराल मूसलाधार बरसात बस अब बरसने ही वाली है! वर्षा के आते ही पर्वत शिाखरों से चंचल झरने फूट पड़ते हैं यह प्रकृति का हरियाली भरा श्रृंगार है जो संगीत की एक अलौकिक लय रचता है। जी हां बरसात अपने इन कई रूपों व रंगों में हर वर्ष नित नये तेवर एवं अंदाज से कभी लुभाती, कभी ललचाती, कभी लहराती तो कभी सब कुछ तहस-नहस कर नये सिरे से जीवन जीने को मजबूर करती है।
कुदरत ने इंसान को सर्दी, गर्मी और बरसात इन तीन मौसमों का उपहार दिया है। भारत पर ई·ार ने खास मेहरबानी की है कि यहां के वासियों को लगभग इन तीनों ही ऋतुओं का स्वाद चखने का अवसर मिलता है, वरना कई देशा ऐसे भी हैं जो कभी धूप, बर्फ तो कभी वर्षा की झलक पाने के लिए तरसते रहते हैं। यूं तो हर मौसम अपने आप में महत्वपूर्ण होता है पर बरसात के मौसम में कुछ तो ऐसी खास बात है कि हर व्यक्ति इसका मई खत्म होते होते बेसब्राी से इंतजार करने लगता है।
यह सच है कि वर्षा ऋतु जीवन दायिनी है। बरसात एक ओर लाती है किसान के लिए लहलहाते फसल की उम्मीद, प्यासे पशाु-पक्षियों के लिए सुकून, चातक की कातर पुकार, पपीहे की दर्द भरी याचना, कोयल की मादक कूक, दादुर की टेर और मयूर की थिरकन, साथ ही बच्चों के लिए खेल और स्कूल से छुट्टी का बहाना और युवाओं के लिए भीगकर प्रेम का इजहार करने का अवसर।
शाायद इन्हीं खूबसूरत कल्पनाओं को कवि कालिदास ने अपनी काव्य कृति मेघदूत में रचकर बरसात को हमेशाा के लिए अमर कर दिया। लेकिन आज जिस आपाधापी और संघर्ष के दौर में हम जी रहे हैं क्या वाकई बरसात का आना उतना ही सुखद है जितना कालिदास की मेधदूत या कवियों की कल्पनाओं में दिखायी देता है।
आज की युवा पीढ़ी न तो कालिदास को जानती है और न ही उस यक्ष को जिसे अपनी यक्षिणी से दूर जाने का श्राप मिला था और उसने मेध को अपना दूत बनाकर संदेशाा भेजा था। आज के युवा के लिए बरसात की ठंडी फुहार का मतलब है कॅफे कॉफी डे या बेरिस्ता में किसी रेस्ट्रां में मंहगी कॉफी की चुसकियां या मरीन ड्राइव पर फर्राटे से गाड़ी चलाने का आनंद। आज के टीनएजेर्स भी वैसे नहीं रहे जो बादलों को देख साथ जीने मरने की कसमें खाया करते थे या फिर भीगने के लिए मचल उठते थे। आज के नौजवान वाट्सअप, ईमेल, एसएमएस के जरिए ही बिना मेघदूत का सहारा लिये ई-संदेशाा भेज देते हैं। आज वैसी विहरणियां भी नहीं रहीं जिनके लिए कालिदास ने बादलों को दूत बनाकर भेजा था। आज की विरहणियां कामकाजी महिलाएं हैं जो बरसात के अनवरत बरसने से परेशाान हैं क्योंकि सड़कें जलमग्न हैं और घर पहुंचना मुशिकल है। और तो और आज के बच्चे भी वैसे नहीं रहे, जो कालिदास के मेघदूत और उसके साथ निकलने वाले इंद्रधनुष को देख किलकारियां मार कर ताल-तलैय्या में अपनी छोटी-सी नाव तैराने के लिए घरों से बाहर निकल पड़ते थे।
अब शाहरों में अनगिनत गगनचुंबी इमारतें बन गयी हैं। बच्चे बीसवीं या पच्चीसवीं मंजिल की बालकनी में खड़े होकर नीचे जमे पानी को हसरत से देखभर पाते हैं। उनकी नाव तैराने की भोली इच्छा होम वर्क पूरा करने या फिर लिफ्ट बंद होने से मन ही मन दबी रह जाती है। यह भी एक सच है कि जब मेघ बरसते थे तो धरती-पुत्र किसान भावविभार हो उठते थे, किंतु आज का किसान तो कर्ज के बोझ से दबा बंजर धरती और सूखे खेतों को पीछे छोड़कर महानगर में टैक्सी या ऑटो चला रहा है और बरसात के कहर में टैफिक जाम से जूझ रहा है। जो थोड़े बहुत किसान गांव में रहे गये हैं उनके लिए भी बरसात का आना उस तरह से पुलकित करने वाला नहीं है।
वह जमाना अलग था जब आषाढ़ की पहली फुहार में मिट्टी की सोंधी महक पाते ही लोग घरों से निकलकर भीगने को आतुर हो उठते थे। अब शाहरों में बढ़ते प्रदूषण ने पहली बरसात को इतना रसायन युक्त और विषैला कर दिया है कि लोग अपनी सेहत के लिए इसे खतरनाक समझकर छाते में दुबकने में ही भलाई समझते हैं।
यूं तो हर शाहर या गांव की बरसात से जुड़ी होती हैं ढेर सारी खुशिायां और ग़म, पर मुंबई महानगर और बरसात का नाता कुछ निराला ही है। बरसात की बात हो और फिल्मों का जिक्र न हो तो बात अधूरी ही रहेगी। फिल्मों में बरसात के खूबसूरत रुमानी अंदाज को हमने "बरसात की एक रात' से लेकर हाल की फिल्म "गुरू' में "बरसो रे मेघा' तक एक सुखद रूप में देखा है। लेकिन रील और रियल लाइफ में बरसात एकदम अलग होती है। फिल्मों में नायक-नायिका को जिस रोमंटिक अंदाज में बरसात का लुत्फ उठाते देखते हैं, वास्तविक जीवन में शाायद वैसा नहीं होता। तो भी बरसात हमारे जीवन में कुछ सुखद या दुखद अनुभव लाती है। चारों तरफ हरियाली, तपिशा का अंत और रिमझिम फुहारों की मस्ती, बादलों के गर्जन से मोर का मुग्ध होकर नाचना, तीज-त्यौहार, झूले और गरमागरम चाय के साथ पकोड़ियों का स्वाद, बरसात से जुड़ी तमाम कसक को कम कर देता है। बरसात पर शाायर बशाीर बद्र ने लिखा -
मौसम भी हसीनों की अदा सीख गये हैं,
बादल हैं छिपाए हुए बरसात की खुशाबू

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