ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मुक्ति के पिंजरे
CATEGORY : जन्नत की हकीकत 01-Apr-2017 12:28 AM 258
मुक्ति के पिंजरे

शिक्षा, चिकित्सा और न्याय ये तीन क्षेत्र ऐसे हैं जिनसे और जहाँ से समाज के स्वरूप, निर्माण और विकास की दिशाएँ तय होती हैं। ये किसी के पद, धन, वंश, नस्ल आदि के आधार पर नहीं बल्कि आवश्यकता और पात्रता के अनुसार काम करते हैं। दवा और इलाज़ मर्ज़ और मरीज़ के अनुसार होने चाहिए न कि उसके धन और पद के अनुसार। जो भी फर्क और पक्षपात इन क्षेत्रों से शुरू होते हैं वे गुणित होते-होते समाज के स्वरूप को विकृत और असंतुलित बना देते हैं।
आज जबसे रोज़गार के सभी अवसरों पर संस्थानों का एकाधिकार हो गया है तब से व्यक्ति दो हाथ होते हुए भी याचक हो गया है। अन्यथा जब सभी के पास थोड़ी बहुत ज़मीन हुआ करती थी और मज़दूर अपने श्रम का मालिक हुआ करता था तब मनुष्य के जीवन में सत्ता का बहुत दखल नहीं हुआ करता था, बशर्ते सत्ता स्वयं आतंकवादी न हो। रोज़गार के लिए कोई राजा का दरवाजा नहीं खटखटाता था। लोग अपना जीवन यापन करने के साधन न्यूनाधिक मात्रा में जुटा ही लेते थे। एक-दूसरे के सुख-दुःख बाँटते समय निकल ही जाता था।
सत्ता का काम जीवन में दखल देने की अपेक्षा सभी के जीवन को समान रूप से सुरक्षित और न्यायपूर्ण बनाने का होना चाहिए। इसी के लिए लोकतंत्र की कल्पना की गई और उसमें व्यक्ति की निजता, अस्मिता, सम्मान और स्वतंत्रता की, दूसरों के जीवन में दखल न देने से पहले की सीमा तक, रक्षा का लक्ष्य होना चाहिए। उसे बहुमत के नाम पर एक पार्टी और समूह के हित और दुराग्रहों का वाहक नहीं बल्कि "सर्व हिताय" होना चाहिए।
बड़े-बड़े देशों के मनीषियों ने इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए अपने संविधानों का निर्माण किया है जैसे कि किसी भी दर्शन के प्रतिपादकों, किसी पंथ के आदि पुरुषों ने जो कहा, विधान किया वह बहुत न्यायपूर्ण था लेकिन जब वे विचार संस्थाबद्ध होकर शक्ति के केंद्र बन गए तो उन पर अनुदार, स्वार्थी और तुच्छ लोगों का कब्ज़ा होता गया और फिर वे मनुष्य की स्वतंत्रता, सम्मान, समता और न्याय के मार्ग प्रशस्त करने वाले होने की बजाय उसमें बाधक होते चले गए। हर श्रेष्ठता की परिणति निकृष्टता में होती गई। यदि समय-समय पर उसका निष्पक्ष मूल्यांकन, परिमार्जन और परिष्कार नहीं हो तो पतन अस्वाभाविक नहीं है।
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि प्रत्येक विचार, दर्शन और तंत्र में मनुष्य और समाज के जीवन के इन तीन आधारभूत घटकों की न्यायिकता और पवित्रता अत्यावश्यक है। यदि आज के जीवन में देखें तो इन तीनों तत्त्वों के समन्वित लक्ष्यों की रक्षा, व्यवस्था और निष्पक्षता का सम्मिलित समन्वयन मीडिया को होना चाहिए। यही आज का शास्त्र और सत्य-न्याय का सर्वोच्च स्तम्भ होना चाहिए जो निष्पक्ष रूप से न्याय, सच और विवेक का पक्ष ले। इसीलिए इसे "वाच डॉग" कहा गया है। इसे अपने "वाच" विशेषण के अनुसार सतर्क रहने वाला और हर चोर पर चुपके से झपट पड़ने वाला होना चाहिए । न कि "कुत्ता"  नाम के अनुसार पुलिस के कुत्ते की तरह मंत्री को सलामी देने वाला या रोटी का टुकड़ा डालने वाले के सामने दुम हिलाने वाला और उसके इशारों पर किसी भी भले आदमी पर झपट पड़ने वाला नहीं होना चाहिए।
आज मीडिया की परीक्षा इसी आधार पर की जानी चाहिए। लेकिन जिस तरह से स्वतंत्रता और लोकतंत्र के नाम पर शिक्षा, चिकित्सा और न्याय में सर्वत्र जो भ्रष्टाचार, बेईमानी, मिलावट और भेदभाव दिखाई दे रहा और वही मीडिया में भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है। जिस प्रकार इन तीनों क्षेत्रों में धन और सत्ता के साथ दुरभिसंधि के तहत आपराधिक लोग घुस आए हैं और इन्हें गंदे से गंदे धंधे से भी गर्हित बना दिया है वे ही लोग अपने धन, बल और कूटनीति के बल पर मीडिया में भी घुसे हुए हैं और सत्ता के साथ मिलकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। वे आज कहीं भी पवित्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय नहीं रह गए हैं। उनके लिए स्कूल, बूचडखाने और चकले में कोई फर्क नहीं है। जिसमें भी दो पैसे मिलें वही करणीय है। धंधे वाले के लिए सब कुछ धंधा है। जिस प्रकार सत्तालोलुप नेता या तो पार्टी बनाता है या सत्ता पाने के लिए पार्टी बदलता है, उसकी किसी सिद्धांत और विचार में कोई निष्ठा नहीं होती उसी तरह मीडिया में भी वे ही लोग हैं जिनका उद्देश्य कोई विचार और महान लक्ष्य नहीं बल्कि मात्र धन और सत्ता होते है। जो संत बने फिरते हैं वे सेवा और सादगी की बजाय सत्ताधारियों की निकटता तलाशते हैं, उनके लिए वोट जुगाड़ते हैं, विलासिता का जीवन जीते हैं और थोड़ा सा चर्चित होते ही या तो च्यवनप्राश, रुद्राक्ष और वशीकरण यंत्र बेचने लगते हैं या फिर यौनापराधों में धरे जाते हैं।
हालाँकि अमरीकी संविधान के निर्माताओं ने मानव की स्वतंत्रता के महत्त्व को समझा था और माना था कि स्वतंत्रता के कारण मनुष्य विकसित होगा और अपने बहुत से कमीनेपनों से मुक्त हो जाएगा। इसी विचार के तहत महान नेता और विचारक अब्राहम लिंकन ने गुलाम प्रथा के कलंक से अमरीका को मुक्त करने के लिए और काले लोगों को मानव का दर्ज़ा दिलवाने के लिए गृहयुद्ध तक को स्वीकार कर लिया। यह बात और है कि 1965 तक में मार्टिन लूथर किंग जूनियर को मानवाधिकारों के लिए मिलेनियम मार्च करना पड़ा। आज भी अमरीका में नस्ल भेदी हिंसा की घटनाएँ हो रही हैं।
मीडिया का कर्तव्य है कि वह किसी भी भेदपूर्ण और मानवीय गरिमा के खिलाफ प्रवृत्ति और कृत्य को समझे, समझाए, उसके उल्लंघन का परिमार्जन होने तक पीछा करे, न कि अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए किसी घटना की सनसनी का शोषण मात्र करे और फिर अलाभकारी न रहने पर उसे छोड़ दे। Ïक्लटन के अवैध यौन संबंधों को जिस तरह और जितना स्थान वहाँ के मीडिया और पिं्रट में विशेषकर टाइम मैगजीन ने दिया उसका वहाँ के पाठकों तक ने विरोध किया।
अमरीका में आज भी बहुत से ऐसे काम होते हैं जो उचित नहीं हैं, जिन पर जन मानस को जाग्रत और शिक्षित करना मीडिया का दायित्त्व है लेकिन वह उसे नहीं निभाता है। भारत के मीडिया की तरह ही अमेरिका का मीडिया भी अपने आर्थिक और राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए लोकहित को दरकिनार कर देता है लेकिन थोड़ी नफासत से, यहाँ की तरह बेशर्मी से नहीं।
अमेरिका के अखबारों, रेडियो और टेलीविजन में राष्ट्रीयता और वैश्विकता नहीं होती। भारत में वहाँ की छोटी-छोटी बातों को अनावश्यक कवरेज दिया जाता है जबकि वे तीसरी दुनिया की धार्मिक कट्टरता, पिछड़ापन, अंधविश्वास आदि को ही प्रकाशन और प्रसारण के योग्य समझते हैं जिससे एक साथ ही दो काम हो जाते हैं- अपनी श्रेष्ठता की स्थापना और दूसरे की कमतरी। वहाँ का मीडिया अपनी जनता को कूपमंडूक बनाकर रखता है। वही काम आजकल हमारा मीडिया करने लगा है। किसी नेता के जनहित या अहित के कामों की चर्चा की बजाय उसके पहनावे और दाढ़ी में पाठकों को उलझाने से क्या फायदा या किसी फिल्म की सोद्देश्यता, अभिनय और तकनीक की चर्चा की बजाय इस पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित करना कि आजकल किस अभिनेत्री का किसके साथ चक्कर चल रहा है, क्या दर्शाता है?
सभी देशों के मीडिया विज्ञापन के बल पर चलते हैं इसलिए उन्हें विज्ञापनों के लिए यदि किसी जनहित के विचार और पक्ष को छोड़ना पड़े या उसके प्रति अपनी प्रतिबद्धता से हाथ खींचना पड़े तो वह सकुचाएगा नहीं जैसे यदि सिगरेट या शराब का धंधा करने वाला वित्त मंत्री बन जाए तो वह कभी ऐसी नीतियाँ नहीं बनाएगा जिससे उसके धंधे पर दुष्प्रभाव पड़े। निजी स्कूलों, कॉलेजों में भ्रष्टाचार और अनुचित कमाई क्यों चल रही है? क्योंकि इसमें सत्ताधारियों का अपना सीधा हित है या फिर कमीशन। अमरीका में विभिन्न धंधों की लॉबियाँ हैं और उनके अपने हित हैं जिन्हें साधने के लिए मीडिया को काम करना है क्योंकि घूमफिर कर धंधे वालों के आपसी हितों का मामला है। अन्यथा इतनी हिंसा के बावजूद बंदूकों पर नियंत्रण की बात सिरे क्यों नहीं चढ़ रही है? ट्रंप ने तो उस विधेयक पर भी हस्ताक्षर कर दिए हैं  जिसमें मानसिक रोग से पीड़ित रह चुके लोगों को भी बंदूक के लाइसेंस उदारतापूर्वक दिए जा सकते हैं।
छठे दशक के प्रारंभ में टाइम्स ऑफ़ इण्डिया के मालिक रामकृष्ण डालमिया को भारत इंश्योरेंस मामले में जेल की सजा हुई जिसका समाचार उनके अखबार में बाज़ार भावों वाले पेज में चार लाइनों में दिए जाने योग्य माना गया जबकि अन्य अखबारों में प्रथम पृष्ठ में बड़े अक्षरों में दिए जाने योग्य। सहाराश्री का समाचार राष्ट्रीय सहारा में किसी और तरह से छपेगा और किसी अन्य अखबार में अलग तरह से। सरकारी रेडियो और टेलीविजन में सत्ताधारी और विरोधी दल के कवरेज में अंतर तो होगा ही। वहाँ निष्पक्षता और तथ्यात्मकता भूल जाइए।
अमरीका में होम स्कूलिंग की अवधारणा भी है। कुछ समान विचारों वाले लोग मिलकर अपने बच्चों के शिक्षण की व्यवस्था कर सकते हैं। प्रेक्टिकल, खेलकूद, परीक्षा आदि की व्यवस्था चार्जेज देकर हो सकती है। धार्मिक स्थानों में भी अपने  विशेष विचारों और प्रतिबद्धता को ध्यान में रखकर शिक्षण व्यवस्था हो सकती है। हमारे यहाँ भी अलग-अलग धर्मों और विचारों के स्कूल हैं जिनमें निश्चित ही बहुत तार्किक और तात्त्विक शिक्षा नहीं दी जाती है। वह निश्चित ही सापेक्ष होती है और तार्किक और तात्त्विक मूल्यों पर खरी नहीं उतरती है लेकिन स्वतंत्रता के नाम पर वह बहुत से देशों, स्थानों, समाजों में प्रचलित है। ऐसी शिक्षा भी बड़े और उदार मानवीय मूल्यों की स्थापना में बाधा है। क्या लोकतंत्र में आस्था रखने वाली सरकारों और मीडिया को इसके विरोध में और सर्वकालिक, सार्वभौमिक और सार्वजनीन शिक्षा और मूल्यों के लिए नहीं खड़े होना चाहिए?
लेकिन मीडिया हमें अमरीकी फिल्म "टÜ मैन्स शो" के नायक की तरह सत्ता, बाज़ार और धंधे की इस दुनिया में एक पिंजरे से आज़ाद कराने के आभास में किसी बड़े पिंजरे में तो नहीं फँसा रहा है? यह तथ्य सदैव हमारे विचार, चिंतन और मंथन का विषय होना चाहिए। अन्यथा मात्र सूचनाएँ और वे भी अपने अनुसार पकाकर और सजाकर परोसी गई सूचनाएँ कोई भला नहीं कर सकतीं बल्कि पाठक के सहज विवेक को और कुंठित करती हैं।
हाँ, अमरीका में एक रेडियो स्टेशन है नॅशनल पब्लिक रेडियो जो किसी सरकारी अनुदान या व्यापारिक घराने की ओर से नहीं, बल्कि प्रबुद्ध लोगों द्वारा जनता के चंदे से, जनता के हित में चलाया जाता है और जनता की उसमें पूरी भागीदारी रहती है और निश्चित रूप से उसके द्वारा जन हित के मुद्दे ही नहीं उठाए जाते बल्कि श्रोताओं को वैचारिक रूप से जागृत और शिक्षित करने का काम भी किया जाता है। पर क्या हम अपने यहाँ किसी ऐसे मीडिया की कल्पना कर सकते हैं? ऐसे समय में अखबार, टी.वी.,पत्रिकाएँ जाने-अनजाने अंधविश्वास और अज्ञान फ़ैलाने में लगे हुए हैं और कुछ कूढ़मगज नेता और राजनीतिक दल भी।
अभी-अभी एक विमानन कंपनी के कर्मचारियों के साथ शिवसेना के महाराष्ट्रीय सांसद की उद्दंड, आतंकवादी हरकत को देशभर का मीडिया एक घोर अलोकतांत्रिक कृत्य मानकर क्या इस मामले को उसके तार्किक और न्यायसंगत समाधान तक उठाए रखेगा और निर्भय-निष्पक्ष होकर पीड़ित के पक्ष में खड़ा रहेगा? यदि नहीं तो मीडिया भी अन्य अनुत्पादक, फालतू और संदेहास्पद धंधों से अधिक कुछ नहीं है।

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