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मुग़ालतों का दौर
01-May-2016 12:00 AM 2405     

जैसे उम्मीद पर दुनिया क़ायम है उसी तरह गलत-फहमियों में क़ायनात टिकी है। आख़िर ¶ाराफ़त भी कोई चीज़ है। अक्सर महफ़िलों में बेसुरे-बेताले मुतरिब (गायक) के लिए भी "बहुत अच्छा', "बहुत बढ़िया' कहना पड़ता है। मु¶ाायरों, कवि-सम्मेलनों में ऐसे-ऐसे ¶ोरों और कविताओं पर दाद देनी पड़ती है जिन्हें सुन कर ख़ुदकु¶ाी करने की तमन्ना होती है। पर क्या करें, ¶ाराफ़त और तहज़ीब भी कोई चीज़ है, आख़िर।
चलें छोड़ें तहज़ीब को। हमें तो वो वक़्त भी याद है (कभी जब हम जवान थे)। उस ज़माने में हम ¶ाायराना अंदाज़ में हूट करने में माहिर थे। एक मु¶ाायरे में किसी ¶ाायर ने ग़ालिब के इस ¶ोर की ज़मीन चुरा ली - "कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक'। हमारा तो ख़ून खौल गया। बस फिर क्या था, हम और हमारे जैसे यार-दोस्तों ने उन ¶ाायर के हर एक "तक' पर बुलन्द आवाज़ में "तक' बोलना और ताली बजाना ¶ाुरू कर दिया। "तक... तक... तक...' ¶ाायर साहब को काफी देर में हमारा तंज़ समझ में आया। ख़ैर, हमारी ¶ारारत और बदतमीज़ी दरकिनार -- ज़रा सोचिये कि आदमी अगर किसी किस्म के मुगालते में ना रहे तो वह अहसास-ए-कमतरी से मर जायेगा बेचारा। हर किसी को अपनी ड्ढढ़दृ-डदृदृद्मद्यत्दढ़ के लिए कुछ गलतफहमियाँ पालना ज़रूरी होता है। लेकिन यह भी मद्दे-नज़र रखना आव¶यक है कि हर चीज़ की एक सीमा होती है। (लछमन रेखा केवल औरतों के लिए नहीं है) ज़रूरी और ग़ैरज़रूरी दोनों ही मसले एक हद तक जायज़ रहते हैं। कभी-कभी खु¶ाफहमियों के तहद हम अपना नुकसान कर बैठते हैं। वो सुना है ना कि दृध्ड्ढद्ध ड़दृदढत्ड्डड्ढदड़ड्ढ में मारे गये। कुछ ऐसा ही हाल हुआ है इस असार संसार के हिन्दू और मुसलमानों का।
हमने माना कि हिंदुस्तान की तहज़ीब हज़ारों साल पुरानी और बहुत अनमोल है। दुनिया में कहीं भी हमारे वेद, पुराण, योग, ज्योतिष विद्या - यहाँ तक कि हमारी भाषा तथा व्याकरण का सानी नहीं है। अरब, अफगान, मिरुा अदि दे¶ाों की तहज़ीब भी किसी से कम नहीं रही। लेकिन हुज़ूरेवाला बाप दादाओं की कमाई हुई दौलत कितने दिन चलती है, अगर उसमें इज़ाफ़ा ना किया जाये? मौजूदा हालात तो मा¶ााल्लाह खैरसल्ला नज़र आते हैं। एक आलिम फ़ाज़िल ¶ाायर के अनुसार -
सभी जाहिल हैं, रब का ¶ाुक्र है यह
बड़ी अच्छी इमामत चल रही है
कहाँ चलता है कोई खोटा सिक्का
बुज़ुर्गों की ¶ाराफ़त चल रही है
बून्द-बून्द करके घट खाली हो जाता है। ऐसा ही कुछ हम लोग भी करते रहे हैं - यानि जमा में से खाते रहे, कमाया कुछ भी नहीं। सच कहा है किसी ने -- "पूत कपूत तो का धन संचय, पूत सपूत तो का धन संचय'। कर्मठ सुपुत्र स्वयं अपना स्थान बन लेते हैं। आलसी कुपुत्र जो भी मिले उसका बंटाधार कर देते हैं। अपने हिन्दू और मुस्लिम नौनिहाल प्रमाणित कपूत हैं। जो कुछ भी इन्हें विरासत में मिला, सब तिया-पांचा कर दिया। गरीबी की सबसे निचली (करीब-करीब) सीढ़ी खड़े हैं; लेकिन भाइयों और बहनों रस्सी जल गई अकड़ नहीं गयी। अभी भी बीते हुये कल की दुहाई देते नहीं थकते।
जब हम अपनी पुरानी संस्कृति/तहज़ीब की तारीफ़ करते हुये प¶िचम को गालियाँ देते हैं तो ऐसा लगता है जैसे कोई बिगड़े नवाबज़ादे उछल-उछल कर डींग हाँक रहे हों - "मेरे दादा ये थे / मेरे पिताश्री वो थे / मेरे अब्बाजान जाने क्या थे'। अरे भैया कन्हैया - होंगे अफ़लातून तुम्हारे पूर्वज - तो बताओ-बताओ कि तुम क्या हो? हीरो या ज़ीरो? मियाँ खामखाँ!
साहित्य की बात करें तो वेद-पुराणों को छोड़ें- कालिदास, बाणभट्ट और वाल्मीकि के बाद कितने धुरंधर पैदा किये हैं भारत ने? दो या चार? मुसलमानों में भी ख़लील जिब्राान, ओमर ख़ैय्याम, अमीर खुसरो और फिरदौसी के अलावा कौन-सा बड़ा नाम सुनाई देता है? ग़ालिब, मीर वगैरह को छोड़ कर? देखो भैया साहित्य में फिर भी दाग़, अकबर, जिगर जैसे ¶ाायर मिल जायेंगे। हिंदी में जय¶ांकर प्रसाद, निराला, मीरा, बांग्ला में रविंद्रनाथ टैगोर, बंकिम, ¶ारतचन्द्र आदि दिग्गज नज़र आ जाते हैं। इसलिए साहित्य तक तो ग़नीमत है। लेकिन भइये दे¶ाों का विकास विज्ञान और तकनीक से होता है। आदमी को पहले रोटी, कपड़ा और मकान की दरकार होती है। नृत्य, गान, साहित्य कला सब भरे पेट के चोंचले हैं। मुग़ल खानदान के अंतिम बाद¶ााह ¶ाायर और कलाकार ज़्यादा थे बाद¶ााह कम, इसीलिए मुग़ल साम्राज्य का अंत कर गये बहादुर¶ााह ज़फ़र। कांग्रेस के ¶ाहज़ादे और उत्तराधिकारी तो कलाकार भी नहीं हैं फिर भी कांग्रेस का अंतिम संस्कार उन्हीं के हाथों होगा - नाम है राहुल ¶ााह डफ़र!
राजीव गांधी दे¶ा को कम से कम कंप्यूटर-कु¶ाल तो बना गये। उनके बाद सब टाँय-टाँय फिस्स्स। विज्ञान के मामले में तो भाई लोगों के पास एक चुल्लू पानी तक नहीं कि उसमें डूब मरा जाये। गाल तो बहुत बजाते हैं कि हमारे पास पुष्पक विमान था, अग्निबाण था। होगा! वर्तमान काल में तो साइकल भी अँगरेज़ बना कर दे गए हैं और हथियारों के लिए हम अमरीका का मुंह देखते हैं। अपने भरोसे रहते तो अभी तक बैल गाड़ी हाँक रहे होते तथा तीर-कमान चला रहे होते। (क्रिकेट की जगह गिल्ली-डंडा खेल रहे होते)।
भला हो तेल का कि गल्फ़ के मुसलमान बड़ी-बड़ी गाड़ियां चलाते हैं। लेकिन भइये ये गाड़ियां भी या तो इंग्लॅण्ड और अमरीका की देन हैं या फिर मेड इन जापान हैं। रेगिस्तान में तो अभी तक ऊँट दौड़ते हैं; ¶ाहर की सड़कों पर भी वही नज़ारा होता यदि तेल का सहारा ना होता। फिर ¶ार्मों-हया छोड़ कर कहते हैं "प¶िचम की सभ्यता खराब है, तहज़ीब ग़लत है'। खाते उनकी हैं बजाते अपनी हैं। अहसानफ़रामो¶ाी का बेमिसाल उदाहरण है साहब। कोई हमें बताएगा कि हिन्दू- मुसलामानों को घमंड किस बात का है? अपने निखट्टू होने का?
सन् 18 सौ के बाद से वि·ा के विकास में केवल ईसाईयों तथा यहूदियों का योगदान रहा है। हिन्दू-मुसलमानों ने कुछ नहीं किया। असलियत तो यह है कि अठारह सौ से उन्नीस सौ चालीस तक हिन्दू-मुसलमान सिर्फ़ बाद¶ााहत-- तख़्त और ताज के लिए लड़ते रहे। सब जानते हैं कि मुग़ल साम्राज्य में या तो बेटा बाप का क़त्ल करके गद्दी पर बैठा है -- या भाई ने भाई का गला काट कर तख़्त हासिल किया। हिन्दुओं में भी जयचंदों की कमी नहीं रही। रही बात दे¶ा के हीरोज़ (नायकों) की तो वे कुछ हद तक आवाम की सेवा करते रहे -- विज्ञान और विकास के लिये उन्होंने भी कुछ नहीं किया।
जहाँ अमरीका में तीन हजार और जापान में नौ हजार वि¶वविद्यालय हैं, वहाँ 61 मुस्लिम दे¶ाों में महज़ 485 और 1.6 अरब हिन्दुओं के लिए 385 वि¶वविद्यालय हैं। डूब मरने की बात है। बौद्धिकता का अभिमान एवं ज़हनियत की दुहाई देने वाली क़ौमों में बुद्धिजीवी सदैव ग़रीब तथा उपेक्षित रहे। रामानुजम जैसे महान गणितज्ञ एक दफ़्तर में लिपिक (बाबू) थे। भला हो अँगरेज़ बॉस का, जिसने हीरे को देखा, उसकी प्रतिभा को पहचाना और दुनिया के सम्मुख प्रस्तुत किया। हमारी हर अच्छी चीज़ पर, चाहें वो योग हो या ¶ााकाहार, प¶िचमी मुल्कों की मुहर ना लगे उसकी, हैसियत "घर की मुर्गी दाल बराबर' ही रहती है; और हर आलतू-फ़ालतू वास्तु गौरव¶ााली नज़र आती है।
इतिहास गवाह है कि हमारा सोमनाथ का मंदिर इसलिए लुटा क्योंकि भक्तगण हाथ पे हाथ रखे बैठे रहे इस इंतज़ार में कि भगवान सोमनाथ खुद आकर अपने मंदिर की रक्षा करेंगे। धार्मिक ब्रिागेड आधुनिक ¶िाक्षा प्रणाली पर ध्यान देने की बजाय "जयकारे' लगाने में अधिक वि·ाास रखती है। नैतिकता के रखवाले अपने गली-मोहल्ले की स्वच्छता और विकास की जगह लड़कियों के कपड़ों की लम्बाई नापने में ज़्यादा रुचि रखते हैं। बंदर-बुद्धि स्वयं को संस्कारी कहते हैं। बार-बार ¶ारीयत की मिसाल देने वाले मुसलमान ना तो दे¶ा के बारे में सोचते हैं, ना ही नयी पीढ़ी की ¶िाक्षा और करियर के बारे में। बस कुरान पढ़ लिया और हो गया काम। फिर जब नौकरी नहीं मिलती तो रोना-पीटना मचाते हैं।
खुद को नैतिक और दयावान समझने वाले पूरब के बा¶िान्दे क्या दान धरम करते हैं। संस्कारहीन (तथाकथित) प¶िचम के बिल गेट्स ने करोड़ों डॉलर्स दान दिये और हमारे रईस, संस्कारी विजय माल्या करोड़ों लेकर चम्पत हो गये (माल लिया और गया)। "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः' वालों के दे¶ा में सबसे ज़्यादा खतरा औरतों की इज़्ज़त को ही है। मुसलमानों ने तो औरतों को सर से पैर तक बुर्क़े में ही ढंक दिया। ये औरतों की हिफाज़त के लिए है या पुरुषों को अपनी आँखों पे भरोसा नहीं है?
वे जो अनपढ़ हैं, अगर हैवान हैं तो ठीक है
पर पढ़े-लिखों को तो इंसान होना चाहिए
यानि इंसान होने के लिए पढ़ना-लिखना आव¶यक है। हमारे पास बहुत कुछ था, लेकिन वो "था', "है' नहीं। हम ज़्यादा देर भूतकाल में नहीं जी सकते। अगर अब भी कुछ ना किया तो बस रोते रहेंगे यह कह कर -
जिनको सूरज मेरी चौखट से मिलता था
अब वो खैरात में देते हैं उजाले मुझको।

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