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मातृभाषा की प्रतिष्ठा से होगा समर्थ समाज
01-Mar-2018 02:01 PM 1856     

भाषा के अभाव में हम कैसे जीवित रहेंगे और वह जीवन कैसा होगा इसकी कल्पना ही संभव नहीं है क्योंकि हमारे जाने-अनजाने उसने हमारी दुनिया ही नहीं बदल डाली है, बल्कि उसके साथ हमारे सम्बंध का अचूक माध्यम भी बन गई है। भाषा एक ही साथ आँख भी है, दृश्य भी और दृष्टि भी। हम उसके साथ इतने अभ्यस्त हो जाते हैं और हमारे यथार्थ के साथ वह इतना घुलमिल जाती है कि इसका पता ही नहीं चलता कि कब भाषा अस्तित्व का पर्याय बन जाती है। पर भाषाओं की विविधता भी कम चौंकाने वाली नहीं है। ध्वनि, अक्षर और वाक्य के स्तर, प्रतीक व्यवस्था मानवीय सृजन का अद्भुत चमत्कार है जो हजारों हज़ार रूप धारण करता है।
हर बच्चा माँ के दूध के साथ ही भाषा भी पाता है। वैसे तो मातृ भाषा का अर्थ शिशु की माता द्वारा प्रयुक्त भाषा है पर उसका एक और अर्थ भी है जिसकी ओर हम कम ही ध्यान देते हैं और वह है कि भाषा हमारी माँ है। जन्म देकर शरीर के साथ मनुष्य की जीवन-यात्रा को सम्भव बनाने वाली माँ असहाय बच्चे को तरह-तरह से सशक्त बनाती है ताकि वह जीवन संग्राम में विजयी हो। ठीक उसी तरह भाषा भी बच्चे को ज्ञान और कौशल के लिए योग्य बनाती है। परंतु सभी भाषाएँ अपने व्यवहार क्षेत्र की दृष्टि से समान नहीं होती हैं।
भाषाओं की शक्ति उनके उपयोग पर टिकी होती है। उनका सम्बंध सामाजिक अस्मिता और राजनैतिक प्रभुत्व से भी जुड़ जाता है। भारत की भाषिक स्थिति विलक्षण है।
देश ने संविधान में विधिपूर्वक हिंदी को राजभाषा के पद पर रखते हुए अंग्रेज़ी को राजरानी बनाए रखा। अंग्रेज़ी के उपयोग के लिए रास्ता खोल दिया गया और भाषा की खिचड़ी पकने लगी। बीरबल की यह खिचड़ी अभी भी पक रही है और गीली लकड़ी का धुआँ ऊपर से उठता रहता है। सबकी जय मनाने की कोशिश जारी है।
अंग्रेज़ी का वर्चस्व क़ायम है। भारतीय भाषाएँ क़ीमत चुका रही हैं। औपनिवेशिक मानसिकता ने अंग्रेज़ी का ऐसा स्थायी भूत मन में बैठा दिया है कि अंग्रेज़ी से ही उन्नति होगी और अंग्रेज़ी में पिछड़ कर हम कहीं के नहीं रहेंगे।
अंग्रेज़ी पर अतिरिक्त बल और आग्रह ने शिक्षा और संस्कृति दोनों को आक्रांत किया है। आज हमारा सांस्कृतिक आस्वाद, सामाजिक स्मृति, सृजनात्मकता और बौद्धिक प्रगति सभी को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। मौलिकता, नवाचार और अकादमी श्रेष्ठता दाँव पर लग रही है। हम विश्वस्तरीय शिक्षा का सपना देख रहे हैं और तथाकथित विश्व स्तरीय संस्थानों के नक़्शे कदम पर कदम रखना चाहते हैं। अमेरिका, चीन, कोरिया, फ़्रान्स, जर्मनी या जापान में शिक्षा की उन्नति का मार्ग उनकी अपनी मातृभाषा से हो कर जाता है। परंतु भारत में अंग्रेज़ी का डर इतना फैलाया गया है कि उसके कवच के बिना सभी असुरक्षित महसूस करते हैं। इसलिए ग़रीब, धनी सभी अपने को अंग्रेज़ी की शरण में देख रहे हैं।
धन, श्रम और समय की हानि और व्यापक सामाजिक प्रगति के अवरोध के बावजूद यह लीला चल रही है। विद्यालयों में छात्रों की शैक्षिक उपलब्धि और प्रगति राष्ट्रीय मुद्दा हो रहा है। हमारे नेता मातृभाषा की वकालत तो करते हैं पर हिंदी भाषा-भाषी प्रदेश भी प्राइमरी शिक्षा तक के लिए भी अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल को श्रेष्ठ मानते हैं। नौकरी के अवसरों में भी अंग्रेज़ी की पक्षधरता उजागर होती है। भाषा को लेकर भेद-भाव संस्थागत रूप लेता गया है। अंग्रेज़ी कीमती और मूल्यवान है यह पग-पग पर ज़ाहिर है। हिंदी के समाचार-पत्र और उसके विकास से जुड़ी संस्थाओं ने भी अपने स्वरूप को आवश्यकतानुरूप संवर्धित नहीं किया। हिन्दी में अभी भी पर्याप्त अपेक्षित सामग्री उपलब्ध नहीं हो सकी है। सरकारी तंत्र का ताम-झाम दिखावे के लिए बहुत कुछ करता है पर ज़मीनी हालात में सकारात्मक बदलाव लाना टेढ़ी खीर ही साबित हो रही है।
भाषागत सामाजिक विषमता के गम्भीर आर्थिक आशय होते हैं और सामाजिक स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है। ऐसी स्थिति में भाषा के प्रश्न की उपेक्षा हितकर नहीं है।
विशेष रूप से भारतीय भाषाओं के गौरव को स्थापित करना चाहिए। भाषाई चेतना के लिए नीतिगत परिवर्तन के साथ भारतीय भाषा-भाषियों को भी सन्नद्ध होना होगा

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