ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मूक दीवारें मोह के धागे
CATEGORY : कविता 01-Feb-2017 12:48 AM 911
मूक दीवारें मोह के धागे

मूक दीवारें

जिंदगी की चहक कुछ और ही होती
काश दीवारें सुनने के साथ
कुछ कह भी सकतीं
जमाना जान जाता
भीतर उमड़ते
उस ज्वालामुखी का आक्रोश
कई राज जो संवादित हुए मेरे
और इन दीवारों के बीच
कभी सन्नाटे में बहते आँसुओं
और सिसकियों की गूँज
ढंक लिया जिन्हें चन्द दीवारों ने
मेरे और ज़माने के बीच आकर
जब कभी नितांत निजी क्षणों में
प्यार वात्सल्य बन फूटा
गवाह बनीं यह दीवारें
मेरे अतीत वर्तमान में मूक दर्शक बन
कभी जुड़ना चाहा भी
बाहरी चमकीली कृत्रिम रोशनियों से
अपने भीतर अंधेरों में छिपा दीवारों ने
गुजरने दिया उन तूफानों को
फिर भी न कभी मेरी सखी बन सकी
न संगिनी, न पूरक, न पालक
खामोश ही रहीं हमेशा यह दीवारें
खामोश दीवारों से दिल के घर नहीं बनते
जिंदगी की चहक कुछ और ही होती
काश दीवारों सुनने के साथ
कुछ कह भी सकतीं!

मोह के धागे

हम सभी कठपुतलियाँ
इन मोह के धागों से
एक-दूसरे संग बँधे
जब-जब मोह धागा खींचे
तब-तब कर्म गतिशील होव
गतिशील कर्म झिंझोरे कुछ धागे
जुड़ी कई कठपुतलियाँ खेलें
अपना-अपना खेल
कभी संतुलन कभी गिरते-थमते
कभी नाच-गाना, कभी तर्क-वितर्क
भरपूर मनोरंजक खेल-तमाशा
हर कठपुतली सोचे मैं हूँ अद्वितीय
जब कभी एक धागा टूटता कुछ बिखरता
कुछ आँसू टपकते
कुछ फीकी मुस्कानें बिखरतीं
मालिक कुछ समय लेता जोड़ता नए धागे
अजब-गजब तमाशा मोह का
देता कई नजराने नए खेल के
हम सभी कठपुतलियाँ
मोह के धागों से एक-दूसरे संग बँधे
बागडोर संभाले कोई और बैठा
सोचते कितने अद्वितीय हैं हम!

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