ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मूक दर्द की चीत्कार का लोककवि छज्जुलाल सिलाणा
CATEGORY : लोक-कवि 01-Mar-2017 08:27 PM 713
मूक दर्द की चीत्कार का लोककवि छज्जुलाल सिलाणा

त्रोता युग म्हं शंबूक संग घणा, मोटा जुल्म कमाया था
रैदास, कबीर, भक्त चेता पै जाति आरोप लगाया था
गुरु वाल्मीक, सबरी भीलणी नैं चमत्कार दिखलाया था
कांशी म्हं कालिया भंगी ने हरिचंद का धर्म बचाया था
हिंदुओं के पोथी-पुस्तक म्हं वे चण्डाल कहाए
घणे पोलसीबाजज।।
लगभग साठ वर्ष पहले लिखी गई यह रागिणी भारत में संस्कृति के नाम पर हुई भारी बेईमानी को सामने लाती है। छज्जूलाल की यह रागिणी समाज की हर विसंगति पर करारा प्रहार करती है। इसका हर एक खंड समाज की दोगली और भेदभाव वाली नीति को दर्शाता है।
छज्जुलाल के काव्य में प्रत्येक वर्ग के पाठकों के लिए सामग्री उपलब्ध है। अपने समकालीन युग के ऐसे चितेरे हरियाणवी लोक कवियों में मिलना अत्यंत विरल हैं। वे निर्भीक, स्पष्टवादी एवं भीम-मिशनरी के रूप में विख्यात थे। उनकी रागणियों में उनके अपने समाज की दुर्दशा के प्रति गहरी टीस मिलती है। उनका सामाजिक उत्तरदायित्व ही उन्हें महती कलाकार बनाता है।
उनका जन्म 14 अप्रैल 1922 को गांव सिलाणा, जिला झज्जर, हरियाणा में एक दलित परिवार में महंत रिछपाल के घर हुआ था। बचपन से ही वे संगीत में रम गये और अल्प आयु में अपनी संगीत-मंडली तैयार कर ली। उस समय समाज दासता में जी रहा था और निकृष्टतम जीवन जीने का आदी हो चुका था। उन्होंने रागणियों का रुख समाज सुधार की ओर मोड़ दिया। डॉ. आंबेडकर की वाणी को उन्होंने लोक रूप देना शुरू कर दिया। डॉ. आंबेडकर ने कहा था- शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो। छज्जूलाल ने लिखा- उसका जन्म सुधरज्या जो नर लिखखपढ़ज्या सै। उन्होंने किसी तथाकथित ब्रह्मज्ञानी पंडित को अपना गुरु नहीं बनाया, अपितु उस समय हरियाणा के सबसे प्रसिद्ध कलाकार म. दयाचंद मायना को अपना गुरु स्वीकारा। और उनसे काव्य की बारीकियां सीखीं। रागणियों में सामाजिक सुधार की जो शुरुआत म. दयाचंद ने की थी, उसी को उनके शिष्य ने पकड़ा। दयाचंद ने "नेताजी सुभाषचंद्र बोस" किस्सा लिखकर देश के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शायी, वहीं म. छज्जूलाल ने "डॉ. बी.आर. आंबेडकर" किस्सा लिखकर दलित समाज में जागृति लाने की अपनी प्रतिबद्धता का परिचय दिया। हरियाणा में डॉ. अंबेडकर पर पहला लोकनाट्य लिखने का श्रेय उन्हीं को जाता है। एक ओर उन्होंने हरियाणवी जनता में खासे लोकप्रिय "ध्रुवभगत", "राजा हरिश्चंद्र" तथा "नौटंकी" जैसे विशुद्ध काल्पनिक और परंपरावादी किस्से लिखे, तो दूसरी ओर "डॉ. आंबेडकर" और "वेदवती-रतन सिंह"  उनके बहुद्देश्यीय किस्से भी हैं। उनके किस्से पर पूरा हरियाणवी लोक साहित्य न्यौछावर किया जा सकता है। उनका साहित्य तत्कालीन हरियाणा के दलितों के नारकीय जीवन और समाज में व्याप्त विसंगतियों के नाम पर हो रहे अत्याचारों का प्रामाणिक दस्तावेज है।
एक मार्मिक वर्णन -
दुनियां जाणै नशा नाश हो कितने घर बर्बाद हुए
भीख मांगते फिरैं गालां म्हं छोड़ गृहस्थी साध हुए
"वेदवती-रतन सिंह" उनका एक बहुउद्देश्यीय और अनुपम गीत है। जिसमें हमारी आज की समस्याओं के समाधान प्रस्तुत किये गये हैं। वेदवती पढ़-लिखकर समझदार हो गयी है। अपने पिता तथा मां को अपने विवाह के लिए चिन्तित देखकर वह उनके सामने ऐसा रिश्ता ढूंढने का अनुरोध करती है जहां दहेज की अपेक्षा उसे मानवीय गरिमा मिले। वह अपनी मां को संबोधित करती है -
कह दिये मां मेरे पिता नैं
जब रिश्ते खातर जावै।
दहेज़ के भूखे मानसा तै
कोन्या मेल मिलावै।
दलितों और ग़रीबों में ज्यादा हाथ ज्यादा रोटी की मानसिकता के चलते एक से अधिक बच्चे पैदा करने रिवाज है। इसे ध्यान में रखते हुए कवि ने अपनी रागनियों में छोटे परिवार को ही महत्ता दी है। उनका मानना था कि पांच-सात या दस-दस बच्चों वाले दम्पत्ति सारी उम्र दुख भोगते हैं -
घणी औलाद बढ़ाणे तै दुख मात-पिता नै होज्या सै
कोए पेट मैं कोए गुडलियां कोए गोदी के म्हां सोज्या सै
पांच सात दस बच्चां आला बीज बिघ्न के बोज्याँ सै।
वे परिश्रमी समाज के प्रतिनिधि कवि हैं। उन्होंने अपने किस्सों तथा फुटकल रागणियों में युवाओं और नई उम्र के बच्चों को परिश्रम और स्वाभिमान का महत्त्व बताया।
कमकस और निकम्मे का कोए
बणै जगत म्हं साथी कोन्या।
बिना कमाये कुटम कबीला
मित्र गोती नाती कोन्यां।
यह लोककवि गरीब विपन्न मजदूर को वाणी देता हुआ हरियाणा के एक विशेष लोक कवि के रूप में उभर कर आता है। कवि जब सेठों की फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों को दिनभर परिश्रम के वावजूद भी भूखे पेट सोता देखता है तो उसका हृदय चीत्कार उठता है। इसके लिए वह अपनी रागनियों में सत्ता और देश के योजनाकारों की मिलीभगत को रेखांकित करता है।
देश का ढांचा जर्जर होग्या,
गरीब तै टूकां नै दर-दर होग्या।
सेठां कै घर होग्या, बन्द धन माल गौरी रै।
उठ तावली सी मजदूरी पै, चाल गौरी रे।
वे समाज में प्रचलित ऊंच-नीच और छुआछूत को समाज का कोढ़ बताते हैं और दलित युवाओं का आह्वान करते हैं कि उन्हें इस जाति आधारित भेदभाव को तहस-नहस करने के लिए एकजुट होकर प्रयत्न करने होंगे। गुलाम भारत में जन्मे इस कवि को यह भी आशा थी कि आज़ाद भारत में ऊंच-नीच तथा अमीर-गरीब की गहरी खाई को समाप्त कर एक दिन समता का पाठ अवश्य ही पढ़ाया जाएगा। डॉ. बी.आर. अंबेडकर सांग की यह रागणी कवि के इस मन्तव्य को स्पष्ट कर देती है -
अभिमान करण आलां के आदर घट कै रहैंगे
धन और धरती भारत कै म्हां बंट कै रहैंगे।
कानूनों के जरिये जुल्म कमाल मिटाया जागा
बैर द्वेष देश से तुरंत मिटाया जागा।
बैर भाव और कटुता का नामोनिशान भी न हो तथा सर्वधर्म समभाव की भावना से सभी देशवासी मिलजुल कर रहे ऐसा ही सन्देश प्रदान करती एक अन्य रागणी -
माणस का माणस बैरी होग्या, ना करते डरते जोर जुर्म
दुख म्हं साझी भाई हो ना खत्म हुई सब मेर मर्हम
आपस के म्हां खींचाताणी दूज भतेरी होगी रै
छल पाप कपट की दुनिया बेईमान लुटेरी होगी रै।
छज्जुलाल ने हरियाणा में फैली धर्मान्धता, अशिक्षा, पंचों के ऊलजलूल फरमान, बेटा और बेटी में फर्क, जात-पात  इत्यादि बुराइयों के खिलाफ अपनी रागनियों के माध्यम से जंग छेड़ी। औरतों को सम्मान देने और उनकी महत्ता बताती उनकी इस रागनी को देखें -
पर तिरिया नै आग समझ ले छूणी ठीक बताई कोन्या
जिसनै छू ली वोहे जळग्या जगहां बचण नै पाई कोन्या
तकी इन्द्र नै परनारी थी, शशी की तै खुद पहरेदारी थी
गौतम नै धोती मारी थी, मिटी चांद की स्याही कोन्या।
हरियाणा के लोकसाहित्य में जहां एक ओर लखमीचंद और मांगेराम की द्विज परंपरा में भाग्य, किस्मत, स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म, वर्ण, जाति, स्त्री-विरोध और सांप्रदायिक कट्टरता है, वहीं दूसरी ओर संघर्ष और कमेरी जातियों के दलित लोककवि हैं, जिन्होंने पाखंड, अवैज्ञानिकता और अंधविश्वासों से खुले रूप में टक्कर ली है। लोकसाहित्य के इस पुरोधा और दलितों-पिछड़े वर्ग की दबी कुचली आवाज़ के इस प्रखर स्वर की रागनियाँ समाज को नई राह दिखाती है -
झूठी बात, गलत नीति उल्टा पैगाम जरा राख्या
सुग्रीव, नील, नल, अंगद का बंदरौं म्हं नाम धरा राख्या
हनुमान यौद्धा का देख ल्यो चित्र तलक तरा राख्या
एक द्रोणाचारी नै एकलव्य का गूंठा कलम करा राख्या
ये लिखे हुए प्रमाण देख छंद छज्जूलाल नै गाए।

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