ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मॉल-संस्कृति को देखने भारत नहीं आऊँगी
01-Feb-2016 12:00 AM 3329     

डॉ योको तावादा जयपुर साहित्य सम्मेलन में भाग  लेने ले लिए भारत आर्इं। वे उस सम्मलेन में भाग लेने वाला पहली जापानी साहित्यकार हैं। आपका जन्म जापान के तोक्यो में हुआ और वे 1982 से जर्मनी में रहती हैं। डॉ. तावादा जापानी और जर्मन दोनों भाषाओं में साहित्य लेखन करने वाली दुर्लभ लेखिका हैं। आपकी उत्कृष्ट रचनाओं को आज वि?ा में प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त है। आपके उपन्यास, कविताएं, निबंध संग्रह आदि जापानी और जर्मन दोनों में पाए जाते हैं। 1987 में आपकी प्रथन रचना "जहां आप है, वहीं हमेशा खाली है' जापानी और जर्मनी में प्रकाशित हुई। 1988 में कहानी संग्रह "जहां से योरोप शुरू होता है' जर्मनी भाषा में प्रकाशित हुआ। उपन्यास "नंगी आँख' जापानी और अंगेरजी में प्रकाशित है। आपकी रचाओं का अनुवाद फ्रांसीसी, चीनी, इटली आदि भाषाओं में भी हुआ है। जापान और जर्मनी में आपको अनेक पुरस्कार मिले हैं, जैसे जर्मन के आदेल्बेर्ट फोन शामिस्सो पुरस्कार, गेटे मेडल पुरस्कार आदि। 1993 में कहानी "कुत्ते का दूल्हा' को जापान के अकुतागावा पुरस्कार मिला, जो जापान में बहुत महत्वपूर्ण पुरस्कार है। तनीसकी पुरस्कार, त्सुबोउचि शोयो पुरस्कार आदि जापान के अनेक मशहूर पुरस्कारों से भी आप पुरस्कृत हैं। उनसे हुई बातचीत के अंश :
डॉ. तोमोको किकुचि : भारत के बारे में आपकी रुचि कैसे पैदा हुई।
डॉ. योको तावादा : मुझे लगता है कि दुनिया के सब लोग भारत आना चाहते हैं। जब जयपुर साहित्य सम्मेलन में भाग लेने की बात मुझे बताई गई तो मैंने तुरंत उसे स्वीकार किया और यहाँ आने का तय किया। साइटसीइंग में अनेक जगहों को देखने का आनंद जरूर मिलता है, पर उसमें सिर्फ एक तरफ की क्रिया होती हैं यानि मेरी ओर से देखने की ही क्रिया है उसमें क्रिया का विनिमय नहीं होता। उसके विपरीत, जैसे इस बार मैं कई आयोजनों में भाग लेने के लिए भारत आई हूँ, इस प्रकार के अवसर पर मेरी यहाँ की साहित्यिक दुनिया से मुलाक़ात हो जाती है और साहित्यिक स्तर पर काफी आदान प्रदान की मौका मिल जाता है। इस संदर्भ में मैं वि?ा के सभी देशों में जाना चाहूँगी। फिर भी भारत मेरे लिए विशेष देश है। क्योंकि मैं जवानी में 1982 में पहली बार भारत आई थी, तब से मेरे लिए भारत बहुत आत्मीय देश है और मुझे भारत बहुत पसंद है। इस बार मैंने जो भारत को देखा और जो 1982 में भारत को देखा, उन दोनों में काफी अंतर है, लेकिन मैं उन दोनों भारत को बहुत पसंद करती हूँ। फिर भी जब मैं यहाँ के मॉल गई तो काफी हैरान हो गई। मुझे लगा कि भारत की छवि बहुत बदल गई है। अगर भविष्य में भारत पर मॉल-संस्कृति का पूरा कब्जा हो जाता तो मैं शायद यहाँ नहीं आऊँगी। फिर भी मुझे लगता है कि भारत के साथ वैसा नहीं हो सकता। क्योंकि यद्यपि भारत पूर्ण रूप से आधुनिक देश बन जाता, तो भी भारत का अपनापन हमेशा जीवित रहेगा। जैसे, तोक्यो का उदाहरण देखें। आज का तोक्यो एकदम आधुनिक शहर है उसमें अब ज़ेन जैसे जापान का पारंपरिक दर्शन या वातावरण नहीं पाया जाता। फिर भी मैंने कई योरोपीय दोस्तों से सुना है कि जब उन्होंने तोक्यो यात्रा की तो किसी तरह वहाँ ज़ेन या जापान की पुरानी संस्कृति को महसूस किया।
भारत और जापानी संस्कृतियों को किस रूप में देखती हैं।
मैंने सुना है कि आज भी भारत के समाज में सामंतवाद का प्रभाव है। यहाँ जाति की प्रथा है और अछूतों का इतिहास है। यूरोप में ऐसा इतिहास नहीं पाया जाता। मैं समझती हूँ कि उसी सामाजिक स्थिति के कारण ही भारत में एकता की स्थापना संभव हुई, परंतु दूसरी ओर मैं सोचती हूँ कि उसी के कारण भारत में लोगों का शोषण भी होता है। मैं हैरान हो जाती हूँ कि ऐसे बड़े देश में लोकतन्त्र की स्थापना कैसे संभव हुई और आगे कैसे संभाला जाएगा। लोग कहते हैं कि जापान और भारत की संस्कृति के बीच अंतर है, फिर भी मुझे लगता है कि काफी समानता भी है। भारत की संस्कृति विविधता को स्वीकार करती है, परंतु जापान की संस्कृति के लिए विविधता को स्वीकारना मुश्किल है और उसमें एकरूपता और मानकीकरण में मूल्य पाया जाता है।
भारत बहुभाषा-भाषी और बोलियों का देश है। जापान की भाषाओं को बारे में बताएँ।
मैं उस बात से हैरान हूँ कि आपका एक देश होते हुए भी देशवासी अनेक भाषाओं को एक साथ सफलतापूर्वक कैसे सँभालते हैं। इस अर्थ में भारत वि?ा में एक मात्र देश है। अमेरिका का समाज अंग्रेज़ी के बिना नहीं चल सकता। रूस ने रूसी भाषा का प्रचार-प्रसार जोरदार तरीके से किया है। चीन में भी कई भाषाएँ पाई जाती हैं पर उन सबमें समान अक्षर का प्रयोग होते हैं। इसलिए लोग बेशक बात नहीं कर सकते फिर भी लिखित रूप में एक-दूसरे को समझ सकते हैं। माना जाता है कि स्विट्जरलैंड बहुभाषा का देश है, परंतु मुझे वह बहुत कृत्रिम लगता है। वहाँ टीवी में अलग-अलग भाषाओं के प्रोग्राम दिखाये जाते हैं। मीडिया आदि के माध्यम से बहुभाषा भाषी संस्कृति को प्रोत्साहित किया जाता है। परंतु उसमें वास्तविकता का अभाव है क्योंकि स्विट्जरलैंड बहुत छोटा देश है और लगभग सबको जर्मन भाषा आती है।
आप जापानी के अलावा जर्मन भाषा में साहित्य सृजन कर रही हैं। दोनों भाषाओं के मुहावरे में क्या फर्क है।
मैं कुछ उदाहरण देती हूँ। जर्मन भाषा का मुहावरा है कि "सुबह जल्दी जागने वाले पक्षी की चोंच के अंदर सोना रहता है।' जापानी भाषा का मुहावरा है कि "जो सुबह जल्दी जागता है उसको तीन पैसा मिलेगा।' इन दोनों का अर्थ है कि सुबह जल्दी उठने से लाभ मिलता है। जर्मन भाषा का मुहावरा है कि खाना खाने के बाद आराम करो या सैर करने निकल जाओ। यानि खाने के बाद तुरंत काम नहीं करना चाहिए। इसके विपरीत, जापानी भाषा का मुहावरा है कि खाना खाने के बाद तुरंत सोने वाला गाय बन जाता है। यानि खाना खाने के बाद तुरंत लेटकर आराम नहीं करना चाहिए। जर्मन भाषा में मुहावरा है कि यात्रा करने से लोगों को ज्ञान मिलता है। जापानी भाषा में भी मुहावरा है कि अगर बच्चा प्यारा है तो यात्रा के लिए बाहर भेजना चाहिए। दोनों का अर्थ है कि ज्ञान या अनुभव के लिए यात्रा का महत्वपूर्ण स्थान है।
जापानी भाषा का मुहावरा है कि जिस बच्चे की देखभाल दादा-दादी (नाना नानी) के द्वारा हुई है उसकी कीमत तीन पैसे कम होती है। इस प्रकार का मुहावरा जर्मन भाषा में भी पाया जाता है जोकि वृद्धों से पाले गए लोगों के व्यक्तित्व में स्वार्थपरता आदि कुछ कमी पाई जाती है।
जैसा भारत में कहते हैं कि लक्ष्मी और सरस्वती साथ नहीं रहती। वैसे ही जापान में कहावत है कि विद्वान गरीब होते हैं, आप क्या कहेंगी।
अगर आप वि?ाविद्यालय में काम करते हैं, तो बेरोजगार से ज्यादा आपके पास पैसा होगा। वि?ाविद्यालय के विद्वान कंपनी के प्रेसिडेंट से गरीब हो सकता है, पर कारखाने के श्रमिक से ज़रूर अमीर होगा। जर्मनी में वि?ाविद्यालय के प्रोफेसर को अमीर माना जाता है। सरकार द्वारा उनका जीवन आरक्षित है। उनकी स्थिति की पहचान विदेश मंत्रालय के अधिकारों से समान है। जर्मनी में साहित्यकारों को भी सरकार से सहारा मिलता है। सरकार ने जिन साहित्यकारों को समाज के लिए महत्वपूर्ण समझा है, उनको सहायता दी जाती है। उसका मानदंड बाज़ार की लोकप्रियता से अलग है।
कभी भारत को केन्द्र में रखकर सृजन करना चाहेंगी।
मेरे मन में कुछ योजना है। उस सृजन में न केवल भारत आता है, बल्कि चीन, जापान, दक्षिण पूर्व एशिया के देशों की भी भूमिका है। एशिया संघ के रूप में उन देशों को एक देश में शामिल किया जाता है और वहाँ कोई युद्ध नहीं होता। इस प्रकार के निकट भविष्य के उपन्यास का सृजन सोच रही हूँ।

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