ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मिलकर काम करने का मिशन इंडियन पीपल्स फोरम यूएई के अध्यक्ष भूपेन्द्र कुमार से समीक्षा तैलंग की बातचीत
01-Jul-2018 05:35 AM 499     

पेशे से इंजीनियर भूपेन्द्र कुमार पिछले छः वर्षों से संयुक्त अरब अमीरात के दुबई शहर में कार्यरत हैं। वर्तमान में यूएई में सामाजिक सामुदायिक संगठन (इंडियन पीपल्स फोरम) के अध्यक्ष और राष्ट्रीय संयोजक हैं। गुरुकुल पद्धति को बढ़ावा देने के लिए अपने गृह नगर हनुमानगढ़, राजस्थान में हिन्दी, संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं पर शोध के लिए शोध संस्थान "ब्रह्मवर्त भाषा शोध समिति" की स्थापना कर 2021 तक शुरू करने का लक्ष्य रखते हैं। राजस्थान बिजनेस एंड प्रोफेशनल ग्रुप के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। जीपीसी, आईओडी-इंडिया और आईपीएमए के भारतीय चैप्टर जैसे पेशेवर संगठनों के आजीवन सदस्य हैं। साथ ही व्यवसायी संगठन सद् उद्यम (दुबई) के सदस्य हैं।
हिन्दी माध्यम से स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद आपने कुरुक्षेत्र से इंजीनियरिंग की उपाधि प्राप्त की। बाद में अमरीका और ब्रिटेन से उच्च शिक्षा प्राप्त की। हिन्दी के लिये इनके मन में ऐसा जज्बा है कि इनकी संस्था (इंडियन पीपल्स फोरम) ने डेढ़ सौ स्वयंसेवकों की सहायता से पिछले दो वर्षों से यूएई के 78 स्कूलों से लगभग 13 सौ से अधिक विद्यार्थियों के लिए हिन्दी की विभिन्न प्रतियोगिताओं का सफलतापूर्वक आयोजन किया है। विदेशी धरती पर हमारे देश के लिए यह गौरव का विषय है। विगत दिनों भूपेन्द्र कुमार से यूएई में रहने वाले भारतवंशियों के संदर्भ में अनेक पहलुओं पर लंबी बातचीत हुई। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश :
समीक्षा तैलंग : आप जिस व्यवसाय में हैं वहाँ सामाजिक कार्यों के लिए समय निकालना बेहद मुश्किल होता है। आप कैसे करते हैं यह सब?
भूपेंद्र कुमार : मैं बहुत से देशों में काम करने के बाद यहाँ आया हूँ। मेरे अंदर समाज और अपने देश के लिए कुछ करने का जज्बा इतना प्रबल है कि वो स्वतः ही मुझे यहाँ तक ले आया है। आज की इस दुनिया में हर कोई व्यस्त है, ऐसे में अपनी प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ को बेलेन्स करना बहुत मुश्किल हो गया है। मैं भी अपने घर परिवार को कम ही समय दे पाता हूँ। उनकी भी शिकायत होती है। पर शिकायत के साथ पूरा सहयोग भी मिलता है। कुछ करने का जुनून ही मुझसे ये सब कुछ करा लेता है।
यूएई में रहने वाले भारतीयों की दशा और उनकी आर्थिक स्थिति के बारे में कुछ बताइये? यहाँ पर उत्तर और दक्षिण भारत से कितने भारतीय हैं?
पूरे अरब जगत में लगभग नब्बे लाख भारतीय हैं। जिसमें से यूएई में सबसे ज्यादा लगभग चौंतीस लाख हैं। वहीं सऊदी अरब में इसकी संख्या लगभग तेइस लाख है। बारह लाख के लगभग ओमान और कुवैत में हैं। बाकी के बचे हुये अन्य अरब देशों में हैं। यह आंकड़ा उच्च श्रेणी कार्यकर्ता, मजदूर वर्ग और गृहिणियों को मिलाकर ही है।
कुछ वर्ष पहले तक दक्षिण भारत से लगभग अस्सी प्रतिशत भारतीय थे। जिसमें से तीस प्रतिशत केरल, बीस प्रतिशत तमिलनाडु और पंद्रह प्रतिशत आंध्रा-तेलंगाना से आए थे। लेकिन पिछले 15-20 सालों में बहुत बदलाव आया है। उत्तर भारत और उत्तर-पूर्व (नॉर्थ-ईस्ट) भारत से काफी तादाद में लोग यहाँ आए हैं। जिससे दक्षिण भारतीय घटकर साठ प्रतिशत हुये हैं।
वैसे देखा जाए तो यहाँ खराब आर्थिक स्थिति नहीं होती। क्योंकि मजदूर वर्ग भी सम्मानित वेतन पाता है। फिर भी पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार की तरफ से किए जा रहे प्रयत्नों और कड़े नियमों के चलते जो ट्रेवल एजेंट, कंस्ट्रक्शन लेबर भारत से मिडिल ईस्ट देशों को भेजते हैं उन पर कानूनी शिकंजा कसा है। साथ ही लोकल लेबर लॉ पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव के कारण मजदूर वर्ग के नियम सशक्त हुए हैं। जिससे उनके साथ अच्छा बर्ताव रखा जा रहा है।
यहाँ मझोले और बड़े भारतीय बिजनेसमैन कितने होंगे और अरब जगत से उनके कैसे संबंध हैं?
यूएई पूरे मिडिल ईस्ट में इंडियन बिजनेस का हब है। विश्व के अन्य देशों से यदि तुलना की जाए तो यहाँ सबसे ज्यादा इंडियन एंटरप्रिन्योर्स (भारतीय व्यवसायी) हैं। अन्य देशों में लोग नौकरी के मकसद से जाते हैं पर व्यवसाय की दृष्टि से कम ही जाते हैं। वहाँ यदि वे (भारतीय) व्यवसाय करते भी हैं तो वे केवल छोटे और मध्यम स्तर पर ही होते हैं। लेकिन यहाँ ऐसा नहीं है। केवल जीसीसी देशों में ही देखा जाए तो करीब सौ से ज्यादा भारतीय करोड़पति बिज़नेसमैन हैं। जिसमें से सबसे ज्यादा यूएई में हैं। यदि तुलना की जाए तो अन्य देशों को भारतीय बहुत पीछे छोड़ देते हैं। जहां तक अरब जगत से सम्बन्धों का सवाल है, भारतीय कम्युनिटी यहाँ के अर्थ जगत का मुख्य पहिया है। जबकि यूरोपियन और अमेरिकन बिजनेस कहीं पीछे छूट जाते हैं। भारत से यहाँ लगातार उच्च स्तरीय प्रतिनिधि यात्राओं के होते रहने से, साथ ही वर्तमान प्रधानमंत्री के आने से लोकल अधिकारी, भारतीय कम्युनिटी को ज्यादा तवज्जो देने लगे हैं। यहाँ 90 प्रतिशत कर्मचारी भारतीय हैं। जिसकी वजह से यहाँ की सरकार को सबसे ज्यादा राजस्व भारतीयों से ही मिलता है। वर्तमान भारत सरकार का एनआरआई के प्रति फोकस होने के कारण यहाँ के भारतीय बिजनेसमैन तेजी से भारत में इनवेस्टमेंट कर रहे हैं। जीसीसी सरकारें भी इस ओर विचार कर भारत में इन्वेस्ट करने को तैयार हैं। जो कि भारत-जीसीसी सम्बन्धों को मजबूत बनाता है। यही वजह है की भारतीय बिजनेसमैन को यहाँ की लोकल गवर्नमेंट से काफी शोहरत मिल रही है।
ब्लू कॉलर और व्हाईट कॉलर कामगारों की आम समस्याएँ क्या होती हैं? उन्हें किन-किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है?
दोनों की ही अपनी-अपनी समस्याएँ हैं। जैसे कि लेबर, जो कि मजदूरी करने आते हैं, उन लोगों को सामान्यतया उनकी कंपनी द्वारा रहने की व्यवस्था दी जाती है। लेकिन यहीं पर उनका शोषण होता है। एक ही कमरे में लगभग दस से बारह लोगों को रहने के लिए मजबूर किया जाता है। उनके खाने की गुणवत्ता बेहद निम्न स्तर की होती है। बीमारी के समय उन्हें उचित इलाज नहीं मिलता। अतिरिक्त काम करने के बाद भी आराम करने की उचित सुविधाएं नहीं दी जातीं। जब वे छुट्टी पर जाते हैं उस समय उनका वेतन सही समय पर नहीं दिया जाता। और इतना ही नहीं, कभी-कभी कुछ मालिक चुपके से अपनी कंपनी बंद करके भाग जाते हैं। बाद में पता चलता है कि कई महीनों से उन कर्मचारियों को तनख्वाह ही नहीं मिली। इधर कंपनी के बंद होते ही स्थानीय नगर पालिका बिजली-पानी का कनेक्शन काट देती है। और इस तरह वो मजदूर भगवान भरोसे आ जाता है।
व्हाईट कॉलर वालों की समस्याएँ इनसे थोड़ी सी अलग होती हैं। कंपनी रोजगार देते समय कुछ और वादा करती है। और बाद में अलग शर्तों पर काम करवाया जाता है। फिर क्षमता से अधिक काम करवाना। उनकी परफ़ोर्मेंस पर सवाल उठा-उठाकर सेलरी में से कटौती करना। कई बार मालिक अपने कर्मचारियों से कंपनी की चेकबुक पर हस्ताक्षर करने को बाध्य करते हैं। और फिर स्वयं घपला कर सारा दोष अपने कर्मचारियों पर मढ़ देते हैं। ऐसे मामलों में निर्दोषों को सजा भी भुगतनी पड़ती है। इसके अलावा भी कई प्रकार का शारीरिक और मानसिक शोषण किया जाता है।
क्या भाषा की वजह से भी परेशानियाँ आती हैं?
भारत और खाड़ी देशों के संबंध बहुत पुराने हैं। एक समय था जब भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी भारतीय रुपया ही यहाँ की आधिकारिक मुद्रा थी। सत्तर के दशक में भारत सरकार द्वारा विमुद्रीकरण करने के कारण यहाँ की सरकारों और व्यावसायियों को खासा नुकसान उठाना पड़ा था। उसके बाद ही यहाँ की स्थानीय मुद्रा जारी की गई। भारत से घनिष्ठ सम्बन्धों के कारण यहाँ हिन्दी बेहद प्रचलन में है। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि दक्षिण भारत से आने वालों के साथ-साथ फिलीपींस और अफगानिस्तान जैसे देशों से आने वाले लोग भी हिंदी भाषा को समझते और बोलते हैं। इसके अलावा यहाँ मलयालम काफी प्रचलन में है। हमारे बहुत सारे स्वयंसेवक केरल से हैं। अधिकांश स्थानीय नागरिक और सरकारी कर्मचारी अँग्रेजी बोलने में सक्षम हैं। यही कारण है की भाषा को लेकर कभी कोई खास दिक्कत नहीं आती।
इंडियन पीपल्स फोरम के काम करने का तरीका क्या है? किस तरह से आप लोगों से जुड़ते हैं और उनकी समस्याओं का समाधान करते हैं?
इसके लिए हम लोग कोई मार्केटिंग नहीं करते हैं। एक-दूसरे के सहयोग से ही हमारी संस्था आगे बढ़ रही है। किसी ने हमारे बारे में सुना हो, किसी और को कोई मदद की आवश्यकता हो तो वो हमारे पास उन्हें भेजते हैं। उनकी समस्याएँ हम लोग सुनते हैं और उसी के मुताबिक आगे का कदम उठाने की सलाह देते हैं। हमारे पास सब तरह की समस्याओं के लिए अलग-अलग विशेषज्ञ हैं। जिसमें मुख्य रूप से कानून और मजदूरों से जुड़े मामलों के लिए विशिष्ट सलहकार होते हैं। कभी-कभी कुछ मामले कोर्ट से जुड़े होते हैं। उस स्थिति में हम उन्हें वकील करने की सलाह देते हैं। गंभीर मामलों में हम, उनसे जुड़े केस को भारतीय दूतावास और वाणिज्य दूतावास के संज्ञान में लाते हैं। जिससे उन्हें भारत सरकार से उचित सलाह और मदद मिल सके। हम जितने ज्यादा लोगों की मदद करते हैं उतने ही ज्यादा लोग हमें और हमारी संस्था को पहचानते हैं। जिससे वे और किसी जरूरतमंद को हमारे बारे में बताते हैं। हमारी संस्था और उसके स्वयंसेवी सभी अमीरतों में होने से वहाँ के लोगों से जुड़े रहते हैं।
आपको अपने फोरम के लिए चैरिटी करनी पड़ती है या फिर भारतीय दूतावास से मदद मिलती है? आर्थिक रूप से आपकी संस्था कैसे काम कर पाती है? इस तरह की और कितनी संस्थाएं होंगी जो भारतीयों के लिए काम कर रही है?
जी नहीं, हमारी स्वयंसेवी संस्था है। हमारे सभी कार्यकर्ता अवैतनिक हैं। जरूरत पड़ने पर हम सब मिलकर फंड इकट्ठा करते हैं। जरूरतमदों को आर्थिक रूप से सहायता तो नहीं कर पाते पर हाँ भारतीय राजदूतावास आबूधाबी और भारतीय वाणिज्य दूतावास दुबई को सिफ़ारिश करते हैं। साथ ही आईसीडब्लूएफ (इंडियन कम्युनिटी वेल्फेयर फंड) की सहायता से जरूरतमन्द लोगों के सामान्य खर्चे और हवाई टिकट का इंतजाम करते हैं। यही जरूरतमन्द, काम होने पर हमें दुआएं देते हैं, बस हमारा मेहनतना वसूल हो जाता है। यहाँ और भी संस्थाएं और स्थानीय संगठन हैं जो तकलीफ में लोगों की मदद करते हैं। हमारी संस्था इंडियन पीपल्स फोरम यूएई के सभी अमीरातों में काम करती है। भारतीयों को जब भी किसी भी तरह की परेशानी होती है, हम उन्हें सुलझाने का प्रयास करते हैं। उसी तरह "समन्वय" नामक संस्था सऊदी अरब में और इसी तरह की और भी संस्थाएं अन्य खाड़ी देशों में काम कर रही हैं।
आपको इस संस्था की जरूरत क्यों महसूस हुई?
कुछ समय पूर्व तक भारत की सरकारों ने खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों को दोयम दर्जे का मानकर उपेक्षित कर रखा था। ऐसे में कुछ लोगों ने मानवीयता के आधार पर अपने प्रदेश के लोगों की सहायता करना शुरू किया। जिसमें प्राथमिक रूप से अधिकांशतः केरल के मुस्लिम और ईसाई होते थे। धीरे-धीरे अन्य प्रदेशों के लोगों ने भी इसका अच्छी परम्परा का अनुसरण करना शुरू किया। लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर ऐसी कोई संस्था काम नहीं कर रही थी। ऐसे में मेरे जैसे अन्य लोगों ने मिलकर इस स्थिति पर विचार किया। इसके बाद भारतीय वाणिज्य दूतावास से सहयोग लेकर लोगों के लिए काम करना शुरू किया। सौभाग्य से भारत की वर्तमान सरकार ने प्रवासी भारतीयों पर ध्यान देना शुरू किया। उन्होंने कई सारी नई योजनाएँ दीं। जरूरतमंदों की सहायता करने के साथ-साथ हम उन्हें इन योजनाओं की जानकारी देकर उन्हें लाभान्वित करवाते हैं।
इसके अलावा यहीं पर जन्मे, पले-बढ़े बच्चे जो अपनी मातृभूमि के मूल्यों और अपनी संस्कृति से दूर जा रहे थे, उन्हें भारत के इतिहास और संस्कृति से परिचित करवाने का भी हमारा प्रयास होता है। भारतीय नववर्ष पर हम "भारत उत्सव" आयोजित कर यहाँ रहने वाले भारतवंशियों को एक मंच पर लाने का प्रयास करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के साथ ही हिन्दी उत्सव के माध्यम से विदेश में रहने वाले बच्चों का हिन्दी भाषा के प्रति प्रेम बढ़ाने के लिए कई प्रतियोगिताएं व हिन्दी में ही अन्य कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।

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