ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
म्हारा उरलगिया घर आया जी
CATEGORY : चिन्तन 01-Jul-2018 05:21 AM 346
म्हारा उरलगिया घर आया जी

कौन किस गर्भ से जन्म लेगा, नहीं जानता। बस जन्म होता रहता है। जन्म लेते ही सम्बन्ध भी जुड़ जाते हैं। कोई पुत्र हो जाता है, कोई माता और कोई पिता। यह तीनों सम्बन्ध फिर और भी कई सम्बन्धियों से जोड़ देते हैं।
जन्म लेते ही और भी बहुत सारे नाते यूँ ही जुड़ जाते हैं, उन्हें अर्जित नहीं करना पड़ता। पर प्रेमी और पति या प्रिया और पत्नी का सम्बन्ध प्रत्येक जीवन में हर बार अर्जित करना पड़ता है। राधा और कृष्ण हर समय एक-दूसरे के प्रेम को अर्जित करते हैं। जन्म लेते ही वे विह्वल-व्याकुल प्रेमी एक-दूसरे की खोज में निकल पड़ते हैं।
जीते-जी प्रेम सिर्फ़ मिलने का ही अनुभव नहीं है, वह बिछुड़ने का भी अनुभव है। जीवन में ही प्रेम संभव है, जहाँ प्रेम करते हुए बिछुड़ा भी जा सकता है। प्रेम सरोवर में मिलन और विरह का पर्व स्नान हर पल हो रहा है। हृदय के घाट पर मिलन के आनंद में राधा डूब जाती है और कभी विरह की पीड़ा से तड़प उठती है। पर वह दोनों ही दशाओं में प्रेम को ही अर्जित करती है।
राधा के साथ मीराँ को भी याद आती है। संगीतकारों के संगीतकार पंडित मल्लिकार्जुन मन्सूर राग भैरवी में मीराँ का भजन गाते थे --
मत जा, मत जा, मत जा जोगी।
पाँव परूँ मैं तेरे जोगी।
प्रेम-भगति कौ मारग न्यारौ,
हम कूँ गैल बता जा जोगी।
अगर-चंदन की चिता रचाई,
अब तो आग लगा जा जोगी।
जल कर भई भस्म की ढेरी,
अपने अंग लगा जा जोगी।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर,
जोत से जोत मिला जा जोगी।
मीराँ अपने जीवन में पति का सम्बन्ध अर्जित किये बिना जल्दी ही बिछुड़ गयी। सम्बन्धों की सीमा ही ऐसी है कि उसमें दूसरा पति नहीं मिलता। मीराँ क्या करे, बचे हुए अकेले जीवन में इस सम्बन्ध को कैसे अर्जित करे?
तब फिर मीराँ ने साँवरे आकाश को अपने पति के रूप में पुकारा, जिसमें जगतपति पूर्णरूपेण समाये हुए हैं। देह भवन की खिड़की से जरा-सा भी झाँको तो उनकी साँवरी छबि दिख जाती है। मीराँ इसी साँवरेपन से अपने लिए एक साँवरी मूरत गढ़ लेती है और फिर उसी का पन्थ निहारती है। लोग कुछ भी कहें, वह किसी की सीख नहीं मानती-
मेरे नैनन बान परी।
जा दिन नैना श्याम न देखो,
बिसरत नाहिं घरी।
चित बस गई साँवरी सूरत,
उर तें नाहिं टरी।
मीराँ हरि के हाथ बिकानी,
सरबस दै निबरी।
आकाश में सर्वस्व समाया हुआ है। तभी तो उसके जैसा विरागी कोई नहीं हुआ। वह सबकी पुकार सुनता है और अपने दिल में बसा लेता है। सबके शब्द उसी में समाये चले जा रहे हैं। वह शब्दों की स्याही से नीला हो गया है। यह नील गगन ही मीराँ का पति है, जिसमें अपना सर्वस्व न्यौछावर करके वह निवृत्त हो गयी है।
मीराँ अब संसार के वृत्त में नहीं रहती। वह उसके चक्र से बाहर निकलकर सुदर्शन की गति में लीन हो गयी है। वह विघ्नरहित नित्य गगन में जुड़ी संत सभा में विराजी है। वह अपने दोनों हाथ जोड़कर खुद अपने से इतनी एकाकार हो गयी है कि वहाँ कोई दूसरा नहीं। उसने लोक की लाज ही खो दी है। लाज तो वहीं है, जहाँ दो होते हैं।
वह अपने नयनों में बसे जोगी आकाश को सदा के लिए अपने पास रोक लेना चाहती है- मत जा जोगी। मीराँ अपनी देह को तजकर खुद आकाश ही हो जाना चाहती है। ज्यादातर लोग यही मानते हैं कि आकाश बाहर है। वे बाहर के आकाश में अपनी देहें लिए विचरते हैं।
मीराँ इस बोध से भर उठी है कि उसकी आत्मा का नित्य निरन्तर गगन उसी की देह में सिमट गया है। तभी तो वह अगरू-चन्दन की चिता रचाती है, जिससे कि यह देह भवन ढह जाय, जलकर राख हो जाय। वह अपने अन्त:करण में विराजे उसी आत्मयोगी आकाश से प्रार्थना करती है कि हे योगी तेरे श्याम शून्य विस्तार में इस देह के कारण मुझे प्रेम की गैल नहीं मिलती, अब तू ही बता दे। इस देह की सीमा को जलाकर खाक कर दे, जिससे कि यह तेरे ही रंग जैसी हो जाय और तेरे ही सूक्ष्मरूप में घुल जाय। जोत से जोत इस तरह मिले कि बस जोत ही बचे।
वह साँवरे हरि को प्रीत निभाने के लिए अपनी देह के रंग महल में इस तरह बुलाना चाहती है कि श्री हरि उसके कायाहीन उर से लग जायँ। मीराँ लगातार अपनी काया से ही अपनी काया को इस तरह मिटाती है कि काया ही न रह जाय।
विरागी मीराँ अपने सारे भजनों में राग ही रचती है। देह के बाहर के आकाश में विचरते हुए लोगों को वह बौरायी-सी जान पड़ेगी। पर वह तो ऐसी सतत जाग्रत काया है, जो हरि के हर्ष से भर गयी है जैसे घनश्याम की आहट पाकर मयूर मगन होते हैं, ऐसा आनंद उस पर छाया हुआ है। जैसे चंद्रमा को निरखकर कुमुदनी फूलती है, ऐसे हर्ष में वह डूबी है।
अनन्त नील माधव से लिपट जाने को आतुर वह व्याकुल विरहणी गा उठती है -
म्हारा उरलगिया घर आया जी।
तन की ताप मिटी सुख पाया,
हिल मिल मंगल गाया जी।
घन की धुनि सुनि मोर मगन भया,
यूँ मेरे आणंद छाया जी।
मगन भई मिल प्रभु अपणा सू,
भव का दरद मिटाया जी।
चन्द कुँ निरखि कमोदनि फूलै,
हरखि भया मेरी काया जी
रग-रग सीतल भई मेरी सजनी
हरि मेरे महल सिधाया जी।
मीराँ साक्षात् समर्पण है। समर्पण दूसरे को नहीं चाहता। वहाँ सारा आकाश अपना है। वह तो अपने से अपने को पाता है और खुद अपने आप में लीन हो जाता है। मीराँ के पिया का पन्थ उसी के भीतर से गुजरता है।

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