ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मेघदूत में उज्जयिनी
01-Apr-2016 12:00 AM 4188     

विशाला उज्जयिनी का दूसरा नाम है। यह नगरी सब प्रकार से विशाल है। शोभा, सम्पत्ति और शालीनता यहां विग्रहवती होकर वास करती हैं, इसीलिए मैं इसे "श्रीविशाला विशाला' कहता हूं। मेरा ऐसा विचार है कि स्वर्ग में अपने पुण्यों का फल भोगने वाले कृतीजन पुण्य समाप्त होने के पहले ही स्वर्ग के कान्तिमान खंड को लेकर यहां आ बसे हैं। इसीलिए मैंने तुम्हें पहले ही बतलाया है कि उज्जयिनी भोगक्षेत्र है, काशी की भाँति वह कर्मक्षेत्र नहीं है। दीर्घकाल के पुण्यों का फल भोगने के लिये लोग यहां आ जाते हैं।
एक क्षण के लिये यक्ष का चेहरा खिल उठा। अलका और उज्जयिनी, दोनों में कितना साम्य है। दोनों ही परम पुण्यों के भोग के लिये बनी हैं, फिर भी अलका देव-योनि के लोगों के लिए है और उज्जयिनी मानव-योनी के। अलका भाग्योपार्जित समृदिधि का निवास-स्थान है और उज्जयिनी बाहु-बलार्जित लक्ष्मी की क्रीड़ा-भूमि। देव-योनि की बस्ती अलका पुण्यकर्मा व्यक्तियों की सिद्धि है, तो उज्जयिनी यतमान मनुष्यों की साधना-भूमि है। मेघ यदि उज्जयिनी होते हुए जायेगा, तो अलका का संक्षिप्त रूप देख लेगा, और उन समस्त बिलासों से परिचित हो जायेगा, जो पुण्यपुर के भोक्ताओं को अनायास प्राप्त हो जाते हैं। उज्जयिनी में शिप्रा की लोल तरंगों से सिक्त प्रत्यूषकालीन वायु क्लम विनोदन का सामथ्र्य भर देती है, जिस प्रकार अलका में मन्दाकिनी के निर्झर-सीकरों से शीतल बनी प्राभातिक वायु। एक क्षण के लिये यक्ष के शरीर में पुलक-कम्प का अनुभव हुआ। उसे वे सौभाग्यवती रात्रियां स्मरण हो आयीं, जिनमें प्रियासहचर होकर उसने प्रणय-सुख का अनुभव किया था। उसे याद आया कि सारी रात के जागरखेद को निर्झर-सीकरों से सिक्त प्राभातिक वायु किस प्रकार अपनोदन कर दिया करती थी, और अशिथिल परिरम्भ-क्रिया द्वारा आयोजित संवाहन-सुख को किस प्रकार आनन्दसमुज्जवल बना दिया करती थी। उसने कल्पना की दृष्टि से शिप्रा की तरंगों से घौत मन्द-मन्द-संचारी प्रत्यूवकालिक प्राभातिक वायु में यह क्लान्तिहर भाव देखा। उसने कल्पना की आँखों से देखा कि प्रभातकाल में शिप्रा के तटों पर सारसगण उन्मत्त कूजन से तट-प्रदेश को मुखरित किये हुए हैं और प्राभातिक वायु उनकी इस आनन्द-ध्वनि को उज्जयिनी के सौध-वातायनों के मार्ग से घसीटती हुई नागरजनों के विश्रामकक्ष तक पहुंचा रही है। यक्ष ने उन्मत्त भाव से अनुभव किया कि यह वायु का झोंका, जो सारसों के आनन्दकूजन को वहन करके रसिक दम्पत्तियों के विश्राम-कक्ष तक पहुंचा रहा है, खुशामदी प्रियतम भी तो अर्थहीन बातों से ही प्रिया की अंग-ग्लानि को दूर करना चाहता है। दोनों के अंतर ही क्या है? फिर प्रात:कालीन विकसित कमलों की सुगन्धि से यह वायु उसी प्रकार भिदी होती रहती होगी, जिस प्रकार प्रियतम का शरीर आश्लेषलग्न विभिन्न अंग रागों से गन्धमय हुआ रहता है। क्षण-भर में यक्ष की आँखों के सामने पुरानी अनुभूतियां साकार हो गयीं। वायु तो कोई जीवन्त प्राणी नहीं है। उसमें भिदी हुई सुगन्ध और बंधी हुई आनंद-ध्वनि में प्रियतम की प्रार्थना-चाटुकारिता का आरोप कैसे किया जा सकता है? मनुष्य के अपने ही चित्त में जो राग है, जो उत्कण्ठा है, उसी को वह चराचर में व्याप्त करके देखता है। कहां प्राभातिक वायु और कहां प्रिया का चित्त-विनोदन करने वाला प्रेमी! फिर भी यक्ष ने सारसों की उन्मद ध्वनि को वहन करने वाले और प्रत्यूषकालीन विकसित कमलों की सुगन्धि को ढोने वाले शिप्रा-वात में प्रियतम की ललक का आभास पाया। क्या इससे यह सिद्ध नहीं होता कि बाह्य-जगत को मनुष्य जैसा देखना चाहता है, वह वैसा ही देखता है। हमारे सामने जो-कुछ व्यक्त है, वह हमारी लालसाओं के रंग में रंगा हुआ है।
यक्ष ने कहा, "देखो मित्र! उज्जयिनी की ललनाएँ अपने नितान्त "घन-नीलविकुञ्चिताग्र' घुंघराली लटों में सुगन्धि लाने का प्रयत्न बराबर करती रहती हैं। इस देश में हेमन्त और शिशिर में दीर्घकाल तक सुगंधित धूप से धूपित करके केशों में स्थायी रूप से सुगंधि उत्पन्न करने की जो भोंडी प्रथा चल गयी है, वह उज्जयिनी की सुरुचि-सम्पन्न तरुणियों को मान्य नहीं है। वे हल्की सुगंधि वाले सौगंधिक द्रव्यों से प्रत्येक ऋतु में केश-संस्कार कर लिया करती है। यद्यपि वर्षाकाल में आमोद-मदिर पुष्प-गुच्छ और नयनाभिराम मालती-दाम केशों को सुगंधि देने के लिए पर्याप्त होते हैं, तथापि आषाढ़ के इस प्रथम आविर्भाव-काल में स्वभाव-चतुर सुंदरियां तुम्हारे अनिश्चित आगमन की प्रत्याशा में केश-संस्कार को संशयापन्न नहीं करनी चाहतीं। उज्जयिनी के सौधों में केश-संस्कार के लिये जलाये गये हल्की सुगंधि वाले धूप-धूम की धूम अवश्य मची होगी। शिप्रा के तट-प्रांत को घेरकर जो विशाल भवन खड़े हुए हैं, उनके अवरोधगृह जालीदार पत्थरों के गवाक्षों से सुशोभित हैं। इन्हीं प्रासाद-जालों से "जल-वेणिरम्या' शिप्रा की शोभा नित्य पुर-सुंदरियों की आँखों में अभिलाष-चंचल भाव उत्पन्न करती है। जब तुम शिप्रा के ऊपर से उड़ते हुए पुरी में प्रवेश करोगे, तो सबसे पहले गवाक्ष-जालों से निकलती हुई धूप-धूम की रेखा तुम्हारा स्वागत करेगी। नि:संदेह इससे तुम्हारा शरीर पुष्ट होगा। बड़भागी हो मित्र, जो पुर-सुंदरियों के विश्रब्ध क्षणों में आयोजित धूप-धूम का उद्वृत्त अंश पा सकोगे! उस धूम के साथ न जाने कितनी आकांक्षाएं और कितनी लालसाएँ गवाक्ष-जालों के मार्ग से निकल रही होंगी। उसका स्पर्श पाकर तुममें भी नवीन उल्लास का संचार होगा। फिर तुम्हारे मित्र और प्रेमिक मयूर, जो इन विराट भवनों के क्रीड़ा-पर्वतों पर विचरण कर रहे होंगे और जिनके लिये सुवर्णमयी वास-यष्टि का निर्माण किया गया होगा, तुम्हें देखकर नाच उठेंगे। नगरी में प्रवेश करते समय यही नृत्य तुम्हारे लिए प्रेमोपहार का काम करेगा। उज्जयिनी के प्रासादों में एक भी ऐसा नहीं है, जिसमें भवन-दीर्घिका, वृक्ष-वाटिका और क्रीड़ा-पर्वत न हों और एक भी ऐसी वृक्ष-वाटिका नहीं हैं, जिसमें चम्पक, सिन्धुवार, बकुल, पाटल, पुन्नाग और सहकार के घनच्छाय वृक्ष न हों और जिसके अन्त:पुर से सटी हुई पुष्पवाटिका में मल्लिका, जाती, नव-मालिका, कुरण्टक, कुब्जक और दमनक लताओं की शोभा न दिखायी देती हो। उज्जयिनी के बड़े-बड़े भवन हम्र्य कहलाते हैं। एक जमाना था, जब नगरी के मध्य भाग में बसने वाले रईस छोटे-छोटे बंद कक्ष वाले महलों का निर्माण करते थे। उनका प्रधान उद्देश्य अर्जित सम्पत्ति की सुरक्षा होता था। उनके घरों में सूर्य की किरणों का प्रवेश भी नहीं हो पाता था। इसीलिए वे मकानों को ऊँचा बनाते थे, ताकि ऊँचाई पर बने हुए कक्षों में कुछ धर्म या घाम आ जाये। जो जितना ही धनी होता था, वह उतना ही ऊँचा कक्ष बनवा लेता था। जो कम धनी होता था, उसका मकान सूर्य की किरणों से वंचित ही रह जाता था। यही कारण है कि उन ऊँचे मकानों को "घम्र्य' कहा करते थे, अर्थात् जिनमें सूर्य की रोशनी पहुंच जाया करती थी। जनता में यही घम्र्य शब्द घिसकर "हम्र्य' बन गया। किन्तु उज्जयिनी के नागरिक जनों में बंद कक्ष वाले भवनों का अब विशेष सम्मान नहीं रह गया है। उज्जयिनी के वीरों का बाहु-बल अब निर्विवाद रूप में "गोप्ता' अर्थात् रक्षक के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। महाप्रतापी गुप्त नरपतियों ने जनता के भीतर विश्वास का संचार किया है, इसीलिए शिप्रा को घेरकर दूर-दूर तक विशाल प्रासाद बने हुए हैं, जो केवल सुंदरियों की घुंघराली लटों को सुगंधित करने वाले धूम-धूप से ही नहीं, बल्कि उनके सुकुमार कर-पल्लवों से ललित पुष्प-लताओं से भी सुवासित रहते हैं। मैं इन विशाल हम्र्याे को "कुसुम-सुरभि' कहना अधिक पसंद करूंगा। ऐसी कोई भी ऋतु नहीं है, जिसमें कोई-न-कोई पुष्प इन पुष्पोद्यानों में न खिलते रहते हों। उनकी गंध से ये विशाल भवन निरन्तर सुरभित बने रहते हैं।
लेकिन मार्ग की क्लान्ति दूर करने के बहाने कहीं अटक न जाना। तुम्हें पहले ही बताया है कि उज्जयिनी महाकालदेवता की लालाभूमि है, यह त्रिभुवन-गुरु भगवान चण्डीश्वर महादेव की तपस्या-भूमि है। "चण्डीश्वर' नाम सार्थक है, मित्र! सहज कोपन-स्वभावा देवी महादेव की तपस्या से यहां प्रसन्न हुई थीं। दीर्घकाल तक उनकी बंकिम भृकुटियों में ऋजुता नहीं आयी, कुंचित ललाट-पट पर सहज भाव नहीं आया और उत्क्षिप्त हृदय में अनुकूल भावों का संचार नहीं हुआ। यह जो वक्ररूपा चण्डिका देवी हैं, वे समष्टि में व्याप्त स्पन्दहीन शिव की क्रिया-शक्ति के प्रथम उन्मेष का रूप है। व्यष्टि में भी जब भगवती परावाक् स्पन्दहीन परम शिव की क्रिया के रूप में प्रथम बार स्पन्दित होती हैं, तो "पश्यन्ती' वाणी के रूप में "अंकुशरूपा' होकर व्यक्त होती है। यही पराशक्ति का वक्रा, वामा या चण्डी-रूप है।
उज्जयिनी के हम्र्य-शिखरों पर थोड़ी देर के लिए विश्राम करके तुरन्त महाकालदेवता के दर्शन के लिए चल देना। "पूज्य-पूजा-व्यतिक्रम' यों ही बड़ा दोष है, परन्तु उज्जयिनी में तो वह मूर्खता भी है। जिसने त्रिभुवन-गुरु के चण्डीश्वर-रूप को नहीं समझा, वह पराशक्ति के पिण्ड-रूप में अभिव्यक्त पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी रूप को भी नहीं समझ सकता। फिर मित्र, उस व्यक्ति से तुम क्या आशा रखते हो कि वह हृदय-देश के अतल गाम्भीर्य से निकली हुई प्रेमवाणी को समझ सकेगा? यह जो पिण्ड-रूप में "महाकाल' प्रिय और प्रिया के रूप में द्विधाविभक्त होकर विद्यमान है, उसके उपरले स्तर के आकर्षण की गहराई में कैसे जा सकेगा?
सन्ध्याकालीन आरात्रिक के नगारे की मृदु-मन्द ध्वनि के बाद तुम्हें मंदिर की नर्तकियों के मनोहर नृत्य देखने को मिलेंगे। इन नर्तकियों के ताल-ताल पर किये हुये चरण-निक्षेप से कटि-भाग पर झूली हुई रशना ख्वणित हो उठेगी। लीलापूर्वक बीजित रत्नच्छाया से खचित चामरदण्ड मनोहर भाव से हिल उठेंगे और उनके सुकुमार हाथ इन लीलावधूत रत्नखचित चामरदण्डों के भार से क्लान्त हो उठेंगे। नर्तकियों के इस नृत्य को "दैशिक' नृत्य कहते हैं। इसमें वे हाथ में खड्ग, कन्दुक, वस्त्र, दण्ड, चामर, माला और वीणा धारण करके नृत्य करती हैं। जब तुम विन्ध्याटवी के शबराघ्युषित क्षेत्रों के ऊपर से उड़ोंगे, तो कभी-न-कभी इस उद्दास नृत्य के देखने का अवसर भी पा सकोगे। अब उज्जयिनी की सम्भ्रान्त गणिकाओं ने उस उत्कट नृत्य को तालानुग बनाकर ललित मनोहर रूप में ढाल दिया है। नाम उसका अब भी "दैशिक' ही चल रहा है। उज्जयिनी के प्रतापशाली नरपतियों ने भक्तिपूर्वक महाकाल की सेवा के लिये जो रत्नखचित सौवर्ण चामरदण्ड अर्पित किये हैं, वे आरात्रिक प्रदीपों से उद्भासित होकर अपूर्व शोभा उत्पन्न करते हैं। परन्तु श्रद्धा और भक्ति के आवेश में दिये हुए महार्घ रत्न और सुवर्णदण्ड इतने भारी हो गये हैं कि महाकाल मंदिर की सुकुमार नर्तकियों की सुकुमार कलाइयां देर तक उस भार को सहन नहीं कर पातीं। मित्र, इन श्रान्त-क्लान्त क्रीडा-पुत्तलिकाओं जैसी सुकुमार ललनाओं के क्लान्त मुखमंडल पर स्वेद-बिन्दु झलक आयेंगे, उस समय तुम अपनी झीनी फुहारों से उनकी क्लान्ति दूर कर देना। वे कृतज्ञतापूर्वक अपनी मधुकर श्रेणी-जैसे दीर्घ और चंचल कटाओं से तुम्हारी ओर देखेंगी। मैं यह नहीं कहना चाहता मित्र, कि शिव-भक्ति का फल कामिनियों के नयनाभिराम रूप का दर्शन ही है, और इसीलिए भगवान् चण्डीश्वर के दर्शन का फल तत्काल मिल जायेगा।
मैं जानता हूं मित्र, कि नृत्य-वादित्र से जब वहां का वातावरण भक्ति विद्ध हो जायेगा, उस समय तुम अपने-आपको संभाल नहीं सकोगे। भक्तों की आराधना से प्रसन्न होकर स्वयं महादेव जब ताण्डव करने को उद्यत होंगे, तो तुम्हें भी अपना जीवन चरितार्थ करने का अवसर मिलेगा। उस समय अस्ताचलगामी सूर्य की लाल किरणों से तुम्हारा शरीर नवीन जवा पुष्प के समान लाल हो गया रहेगा। महादेव जब ताण्डव करने को उद्यत होंगे और उनकी भुजाएं विशाल वनस्पतियों के समान आंदोलित हो उठेंगी, तो ऐसा लगेगा जैसे एकाएक भुजा-रूपी वृक्षों का जंगल खड़ा हो गया है। उस समय तुम सावधानी से मण्डलाकार होकर उस भुजारूपी तरुवन पर छा जाना। एक क्षण केलिए भवानी के चित्त में उद्वेग की काली छाया उदित हो जायेगी। गजासुर को युद्ध में मर्दन करके भगवान शंकर ने उस शोणित-बिन्दु-वर्षी खाल को ओढ़कर उन्मत्त ताण्डव किया था। जिस क्षण अनायास आद्र्रगाजजिन के रूप में विराट बाहुवन में लीन हो जाओगे, उस क्षण उनके अधरों पर भी अवश्य लीला विलास की हल्की स्मितरेखा खिल उठेगी। क्षण-मात्र के लिए देवी के चेहरे पर उद्वेग की काली रेखा देखकर वे चटुल परिहास का अनायास लब्ध अवसर पाकर प्रसन्न हो जायेंगे। तुम्हें भवानी और शंकर दोनों को बारी-बारी से प्रसन्न करने का सौभाग्य प्राप्त होगा, और तुम्हारा नयन-सुभग रूप धन्य हो जायेगा।
उज्जयिनी के विशाल हम्र्याें में अनेक मनोहर भवन-वलभियां हैं। रात को कहीं-कहीं छज्जेदार वलभियों में कबूतरों के जोड़े विश्रब्ध भाव से विश्राम करते हैं। जहां भी तुम्हें यह अनुभव होने लगे कि तुम्हारी विद्युत्प्रिया थक गयी है, वहीं कहीं सुंदर भवन-वलभी में चुपचाप कपोत-तम्पत्ति के बगल में जा बैठना और प्रिया को विश्राम देने का प्रयत्न करना। चिर-विलास से खिन्न वधुओं के लिए प्रियतम के अंक में विश्रब्ध भाव से शयन करने के समान अधिक शान्तिदायक दूसरा उपाय नहीं है। मेरा विश्वास है कि प्रत्यूषकाल तक तुम दोनों मार्ग की क्लान्ति दूर करने में समर्थ हो सकोगे। सूर्याेदय होते ही वहां से चल देना। मित्र, मेरा भी तो काम है। तुम्हारें-जैसे बन्धु-जन मेरे-जैसे दु:खित मित्रों की सहायता करने का जब बीड़ा उठाते हैं, तो आलस नहीं करते। तुम भी रात-भर विश्राम करके प्रत्यूषकाल में मेरी प्रिया के पास संदेशा पहुंचाने के कार्य में सुस्ती न करना। जानता हूं कि उज्जयिनी को इतनी जल्दी छोड़ देना सरल नहीं है। परन्तु तुम सुहृदय हो, मेरे हृदय की कथा अपने हृदय में अनुभव कर सकते हो। सूर्य निकलते-निकलते तुम अलका की ओर बढ़ जाना।

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