ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मैं भी
01-Nov-2018 10:22 AM 126     

ये सिर्फ मानव जाति पर लागू नहीं होता बल्कि संसार की हर वस्तु पर लागू होता है। ज़रा-सी हवायें अगर एक साथ मिलकर चलने लगें तो झंझावात पैदा कर दें। धरती के सीने से विनाशकारी लावा यूँ ही नहीं निकलता। सदियों से जमी आक्रोश की आग जब अपनी तीव्रता तक पहुँच जाती है तो "और नहीं, बस और नहीं" कहकर फूट पड़ती है। माँ सी महान प्रकृति जब अपमानित और प्रताड़ित होती है तो उसका क्रोध सीमा लांघ जाता है और विघटन की स्थिति पैदा हो जाती है।
नारी भी तो प्रकृति का ही एक रूप है। धरती की तरह सहनशील, परवाह करने वाली, पालन-पोषण करने वाली, मृदुल, सयंत, साथ ही शक्ति का स्वरूप, आवश्यकता पड़ने पर काली का रूप भी धारण कर लेती है। शताब्दियों से पुरुषों ने स्त्री का शोषण किया है। कभी अप्सरा का रूप देकर उसे देवताओं की भोग्या बनाया तो कभी पृथ्वी पर देवदासी बना कर पुजारियों तथा पंडितों की भोग्या बनाया। कहीं किसी भी शास्त्र में क्या कोई फरिश्ता, यक्ष अथवा अन्य कोई पुरुष (वेश्या का पुरुष रूप) स्त्रियों के लिये मयस्सर है? जी नहीं। स्त्रियां तो देवी हैं। ये और बात है कि देवताओं को अपनी वासना पूर्ति के लिये स्त्री या अप्सरा चाहिये मगर देवियों को नहीं। देवियों को तो संतुष्टि की ज़रूरत ही नहीं। हाँ आदमियों की संतुष्टि के लिये उन्हें हर वक़्त तैयार रहना चाहिये। बलात्कार औरतों का होता है और मुजरिम भी वही होती हैं - अहिल्या का उदाहरण है न। द्रौपदी पर पांच पति थोप दिये जाते हैं परन्तु कर्ण को मन से भी पसंद करना उसका पाप बन जाता है।
ये भेदभाव और पक्षपात की राजनीति हमेशा से चली आ रही है। यहाँ तक तो गड़बड़ थी ही, लेकिन जब पुरुष कहीं भी - सड़क चलते, ऑफिस में और तो और घर तक में औरतों को छेड़ना, उनके साथ बदसलूकी करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझने लगे तो समझो कि पाप का घड़ा भरने वाला है। हुआ भी यही। अमरीका के एक दिग्गज फिल्म बनाने वाले हार्वे वेनस्टेन ने एक दो नहीं सत्तर औरतों के साथ बद्तमीज़ी की। सभी दुखी और परेशान थीं मगर बोल नहीं पायीं। आखिकार एक महिला ने हिम्मत दिखायी और सबके सामने महाशय हार्वे के दुश्चरित्र का सरेआम खुलासा कर दिया। बाक़ी की मौन धारण करे हुये जो स्त्रियां बैठी थीं, उठ खड़ी हुयीं। हवायें मिलीं और झंझावात बन गयीं। अकेले कैलिफोर्निया में सन् दो हज़ार सत्रह में एक सौ चालीस औरतों ने यौन अतिक्रमण का दावा, एक चिट्ठी लिख कर ठोक दिया। लोग हैरान कि एक स्त्री और फिर अनेक स्त्रियां कैसे यौन संबंधित बात को खुलेआम कह सकती हैं। उनकी यही चुप्पी तो मर्दों का हथियार था। यही बूमरैंग कर गया। हंगामा तो बरपा होना ही था, हुआ। लेकिन साहब कैसे रोकोगे ऐसे तूफ़ान को?
जब सैलाब आता है तो शहर, गाँव, जंगल या बगीचे नहीं देखता। वो सरहदों को नहीं पहचानता। देश-विदेश को नहीं मानता। इसलिये भारत जैसे दोगले देश में भी, जहाँ औरतें इस मौज़ूं पर आवाज़ उठाने की सोच भी नहीं सकतीं, बाक़ायदा जमात में शामिल हो गयीं। और क्यों ना हों? बर्दाश्त की भी हद होती है। शिशुपाल के सौ पापों की गिनती पूरी हो गयी। सुदर्शन चक्र तो उठना ही था। भारत सहित संसार में कोई स्त्री - छोटी बच्ची से लेकर बड़ी उम्र की महिला तक यौन अतिक्रमण से नहीं बची। लोगों ने उन्हें चहरदीवारी में बंद कर दिया (उनकी सुरक्षा के लिये ), परन्तु घर के अंदर की असुरक्षा से नहीं बचा सके। तिस पर सम्मान के नाम पर उनका मुंह बंद कर दिया। यानि शोषण चलता रहा। अब जब अलमारी से गुनाहों के अस्थि पिंजर निकल-निकल के गिर रहे हैं तो पुरुषों में चीख़-पुकार मच रही है। सब इसे साज़िश क़रार दे रहे हैं। ज़ाहिर है वो तो करेंगे ही। कौन-सा चोर चोरी क़ुबूल करता है जब तक रंगे हाथों न पकड़ा जाये। तो सवाल है कि इस क़िस्म की हरकत कोई खुलेआम थोड़े ही करता है, फिर रंगे हाथों पकड़े जाने का क्या मतलब? हाँ कुछ बुज़ुर्गवार ज़रूर बेशर्मी पर उतर आते हैं और सफ़ाई में कहते हैं "ये तो मेरी बेटी के समान है", मेमने की खाल में भेड़िये।
दूसरा तर्क ये दिया जाता है कि अति विशेष व्यक्तियों को निशाना बनाया जा रहा है। क्यों भाई, ये अति विशेष व्यक्ति हमारी वोट के दम पर इस मुक़ाम पर पहुंचे हैं। इनके पद और अधिकार इस बात का प्रमाण क़तई नहीं हैं कि ये बड़े सुचरित्र हैं। बल्कि यही लोग अपनी हैसियत का नाजायज़ फायदा उठाते हैं। क्या राजनेता (ख़ैर वो तो माने हुये कमज़र्फ हैं) और क्या फ़िल्मी महामहिम - कोई दूध का धुला नहीं है। अति विशेष व्यक्तियों में यूँ तो अनेक नाम है किन्तु जिस नाम ने सबसे ज़्यादा हंगामा बरपा किया वह है एमजे अकबर का उनकी पत्रकारिता तथा उनके लेखन के हम भी प्रशंसक थे (हैं)। मगर अच्छा लेखक होना अच्छी लेखनी का प्रमाण पत्र तो हो सकता है, अच्छे चरित्र का नहीं। बुकर्स पारितोषिक के विजेता अरविन्द आडिगा का अंग्रेजी भाषा में लिखा उपन्यास "सफ़ेद चीता" (ज़्ण्त्द्यड्ढ च्र्त्ढ़ड्ढद्ध) जब हमने पढ़ा तो यकायक एक सत्य उजागर हुआ - वो यह कि कई मायनों में पुरुष स्त्रियों से भिन्न होते हैं। यूँ तो सभी जानते हैं की शारीरिक रचना के अनुसार स्त्री-पुरुष एक-दूसरे से अलग हैं, पर अधिकार और कर्तव्यों को लेकर मर्दों ने जो औरतों के साथ अन्याय किया उस सन्दर्भ में अक्सर हम मर्दों की मजबूरियों को भी नज़रअंदाज़ कर देते थे। बिना किसी तर्क अथवा भाषण के लेखक ने ये सिद्ध कर दिया कि पुरुष को अपनी यौन भावना पर विशेष संयम नहीं है। ठीक है, परन्तु सिर्फ इसी कारण उसे बरिबंड हो जाने का अधिकार नहीं मिल जाता। संयम एक अनुसाशन है। "लड़के हैं, गलती हो जाती है" कहकर बलात्कार या दुराचरण को रफ़ा-दफ़ा नहीं किया जा सकता। अकबर साहब पर एक नहीं अनेक स्त्रियों ने इल्ज़ाम लगाये हैं। सभी तो गलत नहीं हो सकतीं। फिल्मों की तो बात ही और है। पुराने ज़माने की बात छोड़ दीजिये, आज के आज़ाद ख्याल परिवार भी अपनी बेटियों को फिल्मों में भेजना पसंद नहीं करते। आज जब नाना पाटेकर, अलोक नाथ, सुभाष घई जैसे नाम लोगो को चौंका रहे हैं, लेकिन क्यों? क्या राज कपूर बड़े आदमी महान निर्देशक नहीं थे? फिर भी उन्होंने नरगिस, वैजन्ती माला, पद्मिनी आदि का शोषण किया। इस शोषण को उन्होंने "कला" यानि आर्ट का नाम दिया। अगर यह कला ही है तो अपनी बेटियों को फिल्मों में जाने से क्यों रोका?
ये जितने भी नाम आज उजागर हुये हैं वो कोई बेवजह नहीं हैं। वजह सिर्फ ये है कि आज महिलाओं को वो मदद मिल रही है जो पहले मयस्सर नहीं थी। माँ-बाप तक सहायता नहीं करते थे। आज माँ-बाप को छोड़िये - संसार की स्त्रियां अपनी देखी और अनदेखी बहनों का साथ दे रही हैं। भला हो सामाजिक संचार माध्यम (द्मदृड़त्ठ्ठथ् थ्र्ड्ढड्डत्ठ्ठ) का जिसने एक (द्मत्द्मद्यड्ढद्धण्दृदृड्ड), एक बहनापे का निर्माण कर दिया। अमरीका में शुरू हुए आंदोलन में अन्य देशों ने भी बढ़कर हिस्सा लिया। ये लड़ाई जितनी उनकी है उतनी ही हमारी है। दुनिया की समस्त औरत ज़ात एक साथ उठ खड़ी हुई है। आखिर हम सभी इस बीमारी से ग्रसित हैं। आज अगर हमने एकजुट हो कर इसका सामना नहीं किया तो यह महामारी हमें एक-एक करके मारती रहेगी जैसे अब तक करती रही है। नहीं और नहीं अब और नहीं - हम भी मुंह में ज़ुबान रखते हैं, इतना ऊँचा न बोलिये साहब। अब धीमी आवाज़ में और तमीज से बोलने की बारी आपकी है।
तीसरा और निहायत लचर तर्क ये है कि ये औरतें पहले क्यों नहीं बोलीं। जनाब, इस विषय पर बोलना क्या आसान था? दूसरों की बात छोड़िये, आपकी अपनी बहन या बेटी होती तो क्या आप बोलने देते? आज भी बलत्कार की शिकार बच्चियों के माँ-बाप चुप बैठ जाते हैं। उनसे पूछो क्यों? जवाब मिल जायगा। ये तो भला हो पश्चिमी महिलाओं का जो भारत की अबला नारी में भी शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाने का साहस आ गया। वरना हमारे महान हिंदुस्तानी जो भयानक रूप से यौन भुखमरी से त्रस्त हैं, इन स्त्रियों को बोलने नहीं देते। माना कि लड़के भी यौन दुर्दशा के शिकार हुये हैं, तो वो भी आवाज़ बुलंद करें।
सच कहें ये जंग विश्वव्यापी बन चुकी है। शताब्दियों से पनपता रोग कभी तो काबू में लाया जाये। हम स्त्रियों को तो इस संग्राम का समर्थन करना ही चाहिये; साथ ही पुरुषों को भी साथ देना चाहिये - सभी आदमी बुरे नहीं होते। अंत में एक बात और - धरती माँ का शोषण भी बंद होना चाहिये। लोगों ने मज़ाक़ में कार्टून निकाले कि साड़ी पहने ज़मीन भी हाथ जोड़ कर "मैं भी" की मुद्रा में खड़ी है। लेकिन ये कोई मज़ाक़ नहीं सच्चाई है। जंगल कटना, नदियों को दूषित करना, पर्वतों में ब्लास्ट करना - सब बंद होना चाहिये। स्त्री हो या प्रकृति - जब तक इनका सम्मान नहीं किया जायेगा, मानव जाति का कोई भविष्य नहीं। अभी तक तो गर्दिशे हालात ये हैं -
सौंप दी थी जिनके हाथों में मशाल
रौशनी उन सरवरों ने लूट ली।

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