ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मज़दूर दिवस बनाम प्रवासी मज़दूर
CATEGORY : सिंगापुर की डायरी 01-May-2016 12:00 AM 1161
मज़दूर दिवस बनाम प्रवासी मज़दूर

प्रवासी ¶ाब्द बड़ा मनमोहक है। सुनकर लगता है जैसे एक बड़ा तगमा जुड़ गया हो। सिंगापुर में भी प्रवासियों की कमी नहीं। हर दे¶ा की तरह यहाँ भी कुछ प्रवासी सुनहरे सपने पूरे कर रहे हैं तो कुछ सुनहरे सपनों की पीली रेखा को पकड़ने की को¶िा¶ा में हैं। हमारी एक आदत रही है कि हम ज़्यादातर प्रवासी ¶ाब्द को धनाढ्य वर्ग से ही जोड़ते हैं। पर क्या कभी इस ओर ध्यान दिया है कि जो मज़दूर अपना दे¶ा छोड़कर दूसरे दे¶ा की ओर जीविकोपार्जन के लिए रुख करते हैं, वे भी तो इसी श्रेणी में आते हैं। आज मेरी कलम भी इन्हीं प्रवासियों से रूबरू करवाने की को¶िा¶ा करेगी। सिंगापुर के भारतीय प्रवासियों में एक बड़ा वर्ग मजदूरों का है जो सिंगापुर की बुनियादी संरचना व स्वच्छता जैसे कार्यों में अपना बड़ा योगदान दे रहे हैं। ये मजदूर ज़्यादातर भारत के दक्षिणी प्रांत से हैं पर कई उत्तर भारत के भिन्न क्षेत्रों से भी आए हैं। सिंगापुरी लोग मेहनत-मज़दूरी वाले काम से ज़रा कतराते हैं, क्योंकि यह वि·ा का विकसित दे¶ा है। यहाँ के लोग उन्नत वर्ग में आते हैं जो गारा-माटी, साफ-सफ़ाई का काम नहीं करते, अत: मज़दूरी का काम करने के लिए मज़दूर दूसरे दे¶ाों से बुलाए जाते हैं। यहाँ के मजदूरों में सिर्फ भारतीय ही नहीं वरन चीनी, श्रीलंकाई, मले¶िायाई आदि भी ¶ाामिल हैं। भारतीय मज़दूर सिंगापुर की आज़ादी के बहुत पहले से यहाँ के निर्माण कार्य में लगे हुए हैं। कई अप्रतिम इमारतों का निर्माण भारतीय मज़दूरों की कलाकारी का नमूना है।
जब इनके जीवन पर नज़र जाती है तो समझ आता है कि इन प्रवासियों का जीवन इतना सहज नहीं है क्योंकि इनके लिए जीवन की बुनियादी ज़रूरतों को भी पूरा करना कई बार पहाड़ बन जाता है। इसका मुख्य कारण है, ये लोग भी संभवत: यहाँ बड़े सपनों को संजोए आते हैं और मजदूरों को दिया जाने वाला आय-भत्ता काफी कम है। ये अगर अपनी ज़रूरतों को पूरा करने में लग जाएँ तो परिवार के सपनों को कैसे पूरा करेंगे? बस यही इनके जीवन की धुरी बन जाती है। इनके रहने के स्थान से लेकर समाज का इनके प्रति व्यवहार सब कुछ अधिक सकारात्मक नहीं होता, पर संभवत: लोग भूल जाते हैं कि स्वच्छता की इस भूमि को इन्हीं जैसे लोगों ने बरकरार रखा है। आज गगनचुम्बी इमारतों का ¶ाहर मज़दूरों की मेहनत का भी फल है। हाल ही में हुई घटना को भी भला कैसे भूला जा सकता है कि जब एक भारतीय मज़दूर ने खिड़की से फंसे-लटकते बच्चे की जान बचाई थी।
अब भारतीय नौकरानियाँ भी यहाँ के भारतीय लोगों द्वारा काफी पसंद की जाने लगी हैं। पहले सिर्फ पंजाब या दक्षिण भारत से काम करने के लिए लड़कियाँ व महिलाएँ आती थीं पर समय के बदलाव ने दार्जिलिंग जैसे पहाड़ी क्षेत्रों की लड़कियों को इस श्रेणी में काफी लोकप्रिय बना दिया है। एक तरफ तो भारतीय यहाँ के काफी ऊँचे पदों पर आसीन हैं वहीं दूसरी तरफ मज़दूरों का भी बड़ा वर्ग है। यह भारत की विविधता को पूरी तरह दिखा देता है कि किस प्रकार की आर्थिक असमानता भारत में मौज़ूद है। प्रारंभिक दौर में मज़दूर ही यहाँ अधिक आए थे तो कहीं न कहीं यहाँ के लोग में यह सोच दिखाई देती हैं कि भारतीय मतलब निम्न आय वाला व्यक्ति। समय के साथ काफी कुछ बदल गया है। आज कई भारतीय सिंगापुर के सबसे रईस व्यक्तियों में अपना नाम दर्ज़ करवा चुके हैं पर कुछ लोगों की मानसिकता को तो नहीं बदला जा सकता।
अमीर और गरीब में भेद करना तो सभी समाजों में दिखाई देता है पर कई बार सिंगापुर का समाज जाति आधारित भेदभाव मज़दूरों में करता दिख जाता है। वैसे तो सिंगापुर में भेदभाव को अधिक स्थान नहीं दिया जाता, बल्कि इस तरह की घटनाओं का सिर तुरंत कुचल दिया जाता है पर इन भारतीय मजदूरों को कई बार चीनी मजदूरों की तुलना में हीन भावना का भी सामना करना पड़ता है। कई बार भत्ते आदि में भी यह भेदभाव दिखाई देता है। वैसे इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि मजदूरों के बेहतर रहन-सहन के लिए सिंगापुर की सरकार भरपूर प्रयास करती है। सरकार की इसी को¶िा¶ा के कारण यहाँ प्रवासी मजदूरों की इतनी बड़ी संख्या दिखाई देती है। सिंगापुर की सरकार ने हमे¶ाा ही अपने यहां के मज़दूरों की आव¶यकता और उनकी महत्ता को स्थान दिया है।
नवम्बर 2015 में भारतीय प्रधानमंत्री ने भी अपने प्रवास के दौरान मज़दूरों से मिलकर उनका हौसला बढ़ाया क्योंकि दे¶ा सिर्फ बड़े उद्योगपतियों या नौकर¶ााहों से नहीं चलता, बल्कि हर वर्ग की अपनी स्थिति व महत्ता होती है। मज़दूर समाज की वह कड़ी है जिसकी उपस्थिति मायने रखती है। हमें उनके कार्य और परिस्थितियों को समझने की आव¶यकता है।

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