ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मासानाम् मार्ग-शीर्षः अहम्
01-Dec-2018 06:53 PM 691     

हेमन्त ऋतु का आगमन हो चुका। हेमन्त का नामकरण हिम (ड़दृथ्ड्ड) से हुआ है। हिम शब्द की व्युत्पत्ति है - हन्, मारना और मक् प्रत्यय; यहाँ हन् की जगह "हि" ले लेता है। भारत में मध्य नवम्बर से मध्य जनवरी तक हेमन्त का समय है। यह भीषण जाड़े की ऋतु है। इस कारण हेमन्त सचमुच मारक ऋतु है। लोक कहावत है कि यह ऋतु बच्चों को छेड़ती नहीं है और बूढ़ों को छोड़ती नहीं है। हेमन्त ऋतु के अन्तर्गत दो महीने आते हैं - मार्गशीर्ष और पौष। मार्गशीर्ष का सम्बन्ध मृगशिरस् नक्षत्र से है। इस महीने की पूर्णिमा के समय चाँद इसी नक्षत्र की सीध में रहता है। मृगशिरस् अथवा मृगशिरा का सामान्य अर्थ "बारहसिंहे का सिर" है, इस कारण यह बारह महीने के वर्ष की शुरुआत समझा जाता रहा है। "मृग" का दूसरा अर्थ है - राह ढूँढना, पीछा करना, शिकार करना इत्यादि और इसी से "मार्ग" शब्द बना है। इसलिए मार्गशीर्ष ऋतुचक्र का शीर्षस्थ महीना है। ग्रीक माइथोलॉजी में वर्णित ओरियन, द हंटर और मृगशिरा के तारे एक ही हैं। प्रायः मार्गशीर्ष में ही सूर्य का सायन दक्षिण अयनांत हो जाता है। मार्गशीर्ष का दूसरा नाम अग्रहायण है। हिन्दी में अग्रहायण का अपभ्रंश अगहन हो जाता है। अग्रहायण का अर्थ है - हायण अर्थात् वर्ष की शुरुआत। सम्भवतः इन्हीं वजहों से वैदिक युग में मार्गशीर्ष यानि अग्रहायण से ही वर्ष की शुरुआत माना जाता था। प्रायः मार्गशीर्ष महीने में ही पौष (धनु) संक्रांति के साथ ही सूर्य का मूल (दृद्धत्ढ़त्द) नक्षत्र में प्रवेश होने की वजह से भी इस महीने को पहला माना जा सकता है। भारत के प्राचीन अंग प्रदेश में इन दिनों खलिहानों में नवान्न का त्यौहार मनाया जाता है। वैसे बारह महीने के चक्र में कहाँ आरम्भ और कहाँ अंत होगा, यह कहना असम्भव है। श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय में श्रीकृष्ण अपना ऐश्वर्य बताते हुए इसी कारण कहते हैं, "मासानाम् मार्गशीर्षः अहम्..." अर्थात् मैं महीनों में मार्गशीर्ष या अग्रहायण हूँ। इसका तात्पर्य यह हुआ कि समयचक्र अथवा काल का प्रभाव भी अनादि-अनन्त परमात्मा से ही हुआ है। वही काल के मूल हैं और काल से परे भी।
सनातन् धर्म के तीन मूलाधार हैं - उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और श्रीमद्भगवद्गीता; जिन्हें प्रस्थानत्रयी (मूल स्थान) कहा गया। ब्रह्मसूत्र का आरम्भ मंगल वाक्य "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा।" अर्थात् ब्रह्म यानि परमात्मा की जिज्ञासा से होती है, जिसका उत्तर अगले सूत्र में दिया जाता है, "जन्माद्यस्य यतः।" अर्थात् जन्म आदि (जन्म, पालन-पोषण और मृत्यु अथवा सृष्टि, स्थिति और लय) का जो मूल कारण है, वही ब्रह्म यानि परमात्मा है। बृह् का अर्थ है - बढ़ना। इसलिए ब्रह्म का अर्थ हुआ -बड़ा। ब्रह्म शब्द से एक ऐसे तत्त्व का कथन अभीष्ट है, जो सबसे बड़ा, सर्वव्यापी और सबसे शक्तिमान है - "आकाशस्तलिङ्गात्।" (ब्रह्मसूत्र 1.1.22) अर्थात् आकाश ही ब्रह्म बोधक है। इससे किसी तरह भी कुछ भी बड़ा नहीं है। सारी सृष्टि इसके भीतर है और सारी सृष्टि में यह समाया हुआ है। इससे बाहर कुछ भी नहीं है। अलंकृत भाषा में कहते हैं कि परब्रह्म परमात्मा एक ऐसा "वृत्त" यानि आवरण है, जिसका "केन्द्र" समस्त चराचर जगत में है, किन्तु जिसकी परिधि यानि सीमा कहीं नहीं है। यह शुद्ध चेतना (सत् चित्) है और आनन्द इसका स्वभाव है। चेतन अर्थात् ज्ञानमय होने के कारण इसे इच्छा होती है और इच्छा क्रिया बनकर विश्व के रूप में प्रकट होती है।
इस तरह सनातन् धर्म में भी एक ही ईश्वर की अवधारणा है - एकमेवद्वितीयं अथवा एकम् सद् विप्रा: बहुधा वदन्ति; जिसे परब्रह्म परमात्मा, प्रजापति, आत्मभू, परमेष्ठी, परमशिव इत्यादि विशेषणों से जाना जाता है। उपनिषदों में प्रतिपादित एकेश्वरवाद होने के बावजूद सनातन् धर्म में परमात्मा के क्रियात्मक रूप को देवता (दिव, चमकना) कहा गया है, देवता देव और देवी दोनों का वाचक है। अतएव काली देवता, सरस्वती देवता या लक्ष्मी देवता कहना सही है। सगुण ब्रह्म की उपासना में हम ब्रह्म के तीन क्रियात्मक स्वरूपों - ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर के मूत्र्त या प्रतीक रूप को स्वीकार करते हैं- "त्रिकोणे सर्वा: देवताः ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।" (तंत्रालोक); परन्तु यह निर्गुण निराकार ब्रह्म की तीन क्रियाओं - सृष्टि, स्थिति और लय को मूत्र्त रूप देना या बोधगम्य बनाना मात्र है। वस्तुतः इनमें कोई भेद नहीं है। तत्त्वतः सभी प्रधान देवताओं के निर्माण में ब्रह्म, वाक्, माया, दिक, काल, त्रिगुण और धर्म के सिद्धान्तों का प्रधानतया प्रयोग प्रयोजन के आधार पर होता है। इतना ही नहीं ब्रह्मा से ही सरस्वती का, विष्णु से ही श्री का और महाकाल महेश्वर से ही महाकाली का विस्तार माना जाता है। भारतीय दर्शनों में परमात्मा को पुरुष (पुरि शेते, जो ब्रह्मांड में सोता है; लैटिन में द्रद्वद्धद्वद्म अर्थात् विशुद्ध) भी कहा गया। पुरुष तत्त्व यानि विशुद्ध तत्त्व अपनी ही प्रकृति (प्र, आदि और कृति) से मिलकर अपने आनंद के लिए संसार को जन्म देते हैं। पुरुष और प्रकृति दोनों ही नित्य है, किन्तु पुरुष अक्षर नित्य है, जबकि प्रकृति क्षर नित्य।
प्रसंगवश, केरल स्थित सबरीमलय पर स्थित अय्यप्पा मंदिर का ध्यान हो आता है। आजकल यह स्थान चर्चा में है। अय्यप्पा मत के माननेवालों की आस्था है कि इस मंदिर में रजस्वला वय की स्त्रियाँ प्रवेश नहीं करें। इसका कारण यह बताया जाता है कि अय्यप्पा स्वामी ब्रह्मचारी हैं और वे स्त्री स्पर्श से दूर रहते हैं। स्त्री-स्वातंत्र्य से जुड़ी महिलाएँ इसे भेदभाव परक मानती हैं और उन्होंने, सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा उनके पक्ष में निर्णय सुनाए जाने के बाद, मन्दिर में प्रवेश करने की ज़िद ठान ली है। इस तरह की घटना पहले भी होती रही है। यह विवाद अय्यप्पा के लौकिक स्वरूप को ग्रहण करने से उपजा है। शब्द व्युत्पत्ति के अनुसार "अय्यप्पा" का अर्थ है - अय्यन अप्पन अर्थात् आदरणीय पिता। कुछ लोग अय्यप्पा को अयनारों का देवता मानते हैं। इन्हें हरिहरपुत्र भी कहा गया। सिद्धान्ततः हरि और हर में कोई भेद नहीं है। सुभाषितकार ने सच कहा है, "उभयोः प्रकृतिस्त्वेका प्रत्ययभेदाद्विभिन्नवद्भाति। कलयति कश्चिन्मूढो हरिहर भेदम् विना शास्त्रम्।।" (दोनों - हरि और हर - की प्रकृति अर्थात् मूलभावना और मूल धातु "हृ" - हर लेना, एक ही है। प्रत्यय भेद से अर्थात् देखने के भेद से या "इ" और "अ" के प्रयोग से - दोनों दो जैसे मालूम होते हैं। जो मूढ़ दर्शन और व्याकरण शास्त्रों को नहीं जानते हैं, वे हरि और हर को दो मानते हैं।) अध्यात्म रामायण में "रामो ज्ञानमयः शिवः" कहा गया है। इस तरह अय्यपा पालक विष्णु और संहारक शिव के स्वरूप का समन्वय विग्रह (जिस रूप में ग्रहण किया जाता है) कहे जा सकते हैं। कुमार स्वरूप में इनका विग्रह त्रिगुणात्मिका प्रकृति से परे विशुद्ध परमात्मा का है, जो अक्षर नित्य पूर्ण ब्रह्म स्वरूप हैं। इन्हें ब्रह्मचारी कहने का यही तात्पर्य है। रामायण में हनुमान को भी इसी विशुद्ध रुद्रावतार ब्रह्मचारी के रूप में ग्रहण किया गया। अय्यप्पा की उपासना का सही अर्थ है कि उपासक उनका स्पर्श सत्, रज और तम गुणों से निर्मित त्रिगुणात्मक बाह्य जगत को त्यागकर विशुद्ध रूप में करें। परमपिता अय्यप्पा गुणातीत और अक्षर ब्रह्म स्वरूप हैं, अतएव इन्हें क्षर प्रकृति के कारण होने वाले जन्म-मरण के चक्र से दूर विशुद्ध रूप में ध्यान करें। यह धर्म-अध्यात्म से उपजे ज्ञान की बात है, किन्तु सगुण ब्रह्म के उपासक परमात्मा को अपने स्वरूप से एकाकार कर लेते हैं, अतएव उनकी भक्ति में भावना प्रबल हो जाती है।
तात्त्विक तौर पर देवताओं के विग्रहों का बोध उनके आयुधों से भी होता है। देवताओं के आयुध और वाहन उनके प्रतीक रूप होते हैं और हिन्दू इन प्रतीको की ही पूजा करते हैं। ब्रह्मा के हाथों में स्थित कमण्डलु (क- ब्रह्मा या जल, मण्ड - मंडित करना या सार, ल - लानेवाला या देनेवाला और डु प्रत्यय) सम्पूर्ण ब्रहाण्ड का प्रतीक है। विष्णु (विश, व्याप्त होना और नु प्रत्यय) जगत में व्याप्त देवता हैं। उनका शंख (शं शमने अलोचने च् - शमन करना, प्रकाशित करना और ख - आकाश), चक्र (चक्रमणे), गदा (गद - वाक्य कहना, संभाषण करना) और पद्म (पद - आगे बढ़ना) क्रमशः नादब्रह्म, संसारचक्र, गद्यात्मक वाक् जगत और काव्य सौन्दर्य के प्रतीक है। इस तरह विष्णु विश्वाधार ज्ञान के प्रतीक हैं। इसी तरह शिव का त्रिशूल संसार के तीनों शूलों - आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक दुःखों के शमन से जुड़ा है। शिव इन्हीं दुःखों से मुक्ति दिलानेवाले कहे गए हैं। शिव का डमरू उनके लास्य और तांडव नृत्यों को बताते हैं, अर्थात् शिव (शी शयने और वन प्रत्यय) से ही उल्लासमय जगत का अभिर्भाव होता है और शिव में ही सारी शब्द सृष्टि लय हो जाती है। उन्हीं की डमरू से ही व्याकरण का माहेश्वर सूत्र जन्म लेता है। कहा जा सकता है कि अय्यप्पा के आयुध धनुष और तीर जीवन की मर्यादाओं के प्रतीक हैं। उनका धनुष-बाण काम देवता या क्यूपिड के आयुध के विपरीत पिनाकपाणि शिव का धनुष पिनाक (पा, रक्षा करना और आक प्रत्यय तथा आ का इ और नुम् योग) है। ध्यातव्य है कि मय्र्यादापुरुषोत्तम राम भी मय्र्यादा की रक्षा के लिए ही धनुष-बाण उठाते हैं। हमसबों से भी यह अपेक्षा की जाती है कि हम लोकजीवन में मर्यादित रहें और सबकी भावनाओं को आदर दें।

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