ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मनोज कुमार श्रीवास्तव
मनोज कुमार श्रीवास्तव

विचारशील लेखक के तौर पर ख्याति। गद्य एवं पद्य पर समान अधिकार। कविता के संसार से अलग, उनका गद्य विचार जगत की गहराईयों में जाता है। अपनी परम्परा से निरंतर संवाद करता इनका लेखन आधुनिकता के प्रचलित मुहावरों से भी बाहर जाता है। प्रकाशित कृतियां : कविता संग्रह - "मेरी डायरी से', "यादों के संदर्भ', "पशुपति', "स्वरांकित' और "कुरान कविताएँ'। "शिक्षा के संदर्भ और मूल्य', "पंचशील वंदेमातरम्', "यथाकाल' और "पहाड़ी कोरबा' पर पुस्तकें प्रकाशित। "सुन्दरकांड' के पुनर्पाठ पर दस खण्ड प्रकाशित। दुर्गा सप्तशती पर "शक्ति प्रसंग' पुस्तक प्रकाशित। सम्प्रति : 1987 संवर्ग के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी।


करि जतन भट कोटिन्ह,बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं। कहुँ महिष मानुष धेनु, खर अज खल निसाचर भच्छही। एहि लागि तुलसीदास, इन्ह की कथा कछु एक है कही। रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि, त्यागि गति पैहहिं सही।

यह एक रक्ष-संस्कृति है। एक दो हजार लोग नहीं, करोड़ों लोग रक्षा के व्यवसाय में लगे हुये हैं। इसका विस्तार भी बहुत रहा होगा। भाषा भूगोल को भी बताती है। मलय भाषा में उन्हें राक्सासा और जापानी में रासेट

कुम्भ कविताएँ

(१)
एक समय था
जब देवताओं की भी मृत्यु होती थी
और असुरों की भी

गुजरते थे वे भी
जन्म और मरण के चक्र से

रहे होंगे औरों के वि·ाासों में
देवता स्वभा

कृत सुन्दरायतना घना। चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना। गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै। बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।

इस बिन्दु पर पहुंचकर कथा की रिद्म बदलती है। यहां तुलसी ने जैसे एक स्टेज की सेटिंग की है। कथा-लय में यह परिवर्तन साभिप्राय है। अब हनुमान जो वनचर थे, सहसा एक नगर बल्कि राजधानी से साक्षात्कृत होते हैं

उमा न कछु कपि के अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई। गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग विसेषी। अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।

तुलसी की आधुनिकता कथा के इन छोटे छोटे ट्रीटमेंट तक में देखी जा सकती है। इसके पहले के अध्याय में हमने इस बात को रेखांकित किया था कि तुलसी के यहां प्रसंग प्रातिनिधिक (Representational) हो जाते हैं। व


तहां जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा। नाना तरू फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए। सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें।

हनुमान प्रकृति के पुत्र हैं। अब वह क्षण आता है जब प्रकृति की सुषमा के एक दूसरे आयाम से साक्षात्कृत होने का मौका उन्हें मिलता है। समुद्र से धरती पर आने का आनंद। बायरन के शब्दों में कहूं कि च्र्ण्ड्ढ

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