ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मनोहर श्याम जोशी कहानियों के नेपथ्य की कहानियाँ
CATEGORY : डायरी 01-Jul-2018 05:32 AM 100
मनोहर श्याम जोशी कहानियों के नेपथ्य की कहानियाँ

लिखना (लेखन) वह जो सिर्फ पढ़ा न जाए, देखा- सुना भी जाए - वाह, मनोहर श्याम जोशी जी ने कितनी सुन्दर बात कही है। उनके इस विचार की व्याख्या मैंने ऐसे की कि लिखो तो बस जैसे चित्र खींच कर रख दो, जो पढ़ने वाले की आँखों के सामने चलचित्र की भाँति घूम जाए, शब्द ऐसे हों, ज्यों जलतरंग बजे कानों में। खुद जोशी जी के लेखन में यह बात है। उनका गद्य अद्भुत है, एकदम जादुई दुनिया में ले जाने वाला।
आज "कुरू कुरू स्वाहा" उठाया तो उनके गद्य के आकर्षण ने फिर से बाँध लिया, वैसे ही जैसे 1981 में, जब इसे पहली बार पढ़ा था। उपन्यास के प्रथम पृष्ठ पर मेरी लिखी हुई तारीख है, 5.3.81, इससे पता चला कि मैंने इसे तब खरीदा था और ज़ाहिर है, तब ही पढ़ा होगा। उनका हर उपन्यास मैंने पढ़ा है और डूब-डूब कर पढ़ा है। बाद में वे दूरदर्शन धारावाहिक के इतिहास में पहला धारावाहिक "हम लोग" लिख कर घर-घर में छा गए।
उन दिनों वे साप्ताहिक हिन्दुस्तान के संपादक थे। मेरी एक लम्बी कहानी उनके यहाँ स्वीकृत हुई। उन्होंने मुझे अपने कार्यालय में बुलवाया। वे उस नई लेखिका से मिलना चाहते थे (या उसे देखना चाहते थे?)। जिसकी कहानी अत्यंत रोमैंटिक और दर्दभरी थी, यह उन्होंने मुझे मिलने पर बताया, "देखें तो सही, साहित्य में यह कौन-सा नया सितारा उगा है जो बेधड़क बिन्दास प्रेम कहानियाँ लिख रहा है।" कहानी की नायिका को मैंने काली यानि श्यामवर्णा लिखा था। मुझे देखकर बोले, "तुम काली तो नहीं हो।" उनके कैमरामैन ने मेरी बहुत सारी फ़ोटोज़ खींचीं, चाय हुई और यह नई लेखिका इतने बड़े लेखक से सम्मानजनक शब्द लेकर धन्य होकर वापस लौटी।
एक और घटना हुई। घटना नहीं, उसे तो हादसा ही कहिए। कुछ अर्से बाद साप्ताहिक हिन्दुस्तान से एक अन्य लम्बी कहानी का स्वीकृति-पत्र मुझे मिला। पत्र मिलने के दो दिन के भीतर उनके कार्यालय से एक सज्जन मेरे घर आए, बोले, "इधर से गुज़र रहा था, यूँ ही मिलने चला आया।" मैं हैरान। मुझे यूँ ही मिलने चले आने वाले लोग शुरू से नापसंद हैं। बहरहाल, चाय पीते हुए बोले, "आपकी एक लम्बी कहानी फिर स्वीकृत हुई है, आपको पत्र मिला होगा?"
"जी।"
"क्या दिखाएंगी वह पत्र?"
मुझे कुछ समझ नहीं आया और मैंने वह पत्र उनके हाथ में पकड़ा दिया। उन्होंने सरसरी नज़र से उसे देखा और जेब में रख लिया। उठ खड़े हुए और बोले, "कल जोशी जी से मिल लीजिए।"
"यह पत्र तो दीजिए।"
"कल ही ले लीजिए," कह कर वे चले गए।
मुझे एकाएक अहसास हुआ, अरे, ये तो बहाने से कहानी का स्वीकृति पत्र लेने आए थे। खैर। मैं अगले दिन साप्ताहिक हिन्दुस्तान के कार्यालय पहुँची। साप्ताहिक हिन्दुस्तान में वे जोशी जी के अंतिम बुरे दिन चल रहे थे। स्टाफ़ उनके खिलाफ़ हो गया था। उनके स्टाफ़ में कार्यरत शुभा वर्मा ने उन्हें केंद्र में रख कर एक वाकई अश्लील कहानी लिखी थी, जिसका अब मुझे आभास भर है। इससे अधिक जानकारी मुझे नहीं थी। मेरी कहानी की प्रति मुझे लौटाते हुए बोले, "मणिका, तुम्हारी यह कहानी नहीं छप सकती, अश्लील है।"
"लेकिन वह स्वीकृति पत्र?"
"स्टाफ़ में किसी की चाल थी, मुझे फँसाने की। तुम्हारी यह कहानी किसी अव्यवसायिक लघु पत्रिका में छप सकती है, राष्ट्रीय स्तर के हमारे पत्र में नहीं।"
उनका मूड कुछ इतना उखड़ा हुआ था कि मुझे यह पूछना उचित नहीं लगा कि मेरी कहानी कैसे अश्लील है? मैं क्या कहती? अपना-सा मुँह लेकर वापस चली आई। क्या-क्या न सहे हमने सितम साहित्य की खातिर।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 10.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^