ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मन व्यथित मेरे प्रवासी गीत में जो ढल रहा है
01-Feb-2017 12:40 AM 1706     

मन व्यथित मेरे प्रवासी

आज फिर इस धुन्ध में डूबी हुई स्मॄति के किनारे
किसलिये तू आ गया है? ओढ़ कर बैठा उदासी

स्वप्न की चंचल पतंगों का अभी तक कौन धागा
खींचता है? चीह्न है पाया नहीं हर रात जागा
पुष्प-शर सज्जित धनुष के छोर दोनों रिक्त पाये
बस छलावों में उलझकर रह गया रे तू अभागा

किसलिये तू आस की कर ज्योति प्रज्जवल है प्रतीक्षित
जानता है ले रही है वर्त्तिका भी अब उबासी

बादलों की ओढ़नी को ओढ़कर आती बयारें
द्वार पर आकर कई जो नाम रह रहकर पुकारें
कोशिशें करता, कि उनकी खूँटियों पर टाँग चेहरे
एक मादक स्पर्श के पल से पुन: सुधियां संवारें

किन्तु सीमा चाह की हर बार होकर रह गई है
भोर के बुझते दिये की एक धुँधुआसी शिखा-सी

काल की अविराम गति में चाहता ठहराव क्योंकर
दूर कितना आ चुका है धार में दिन रात बहकर
इस तिलिस्मी पेंच में कुछ देखना पीछे मना है
सिर्फ़ चलना सामने जो पथ, उसी पर पांव धरकर

है असंभव जो उसी की आस में डूबा हुआ है
जानता है, है नहीं संभावना जिसकी जरा-सी

ढूँढ़ता सुबहो बनारस हर उगे दिन की डगर में
सांझ अवधी हो सपन ये देखता है दोपहर में
लपलपाती हर लपट में यज्ञ की स्वाहा तलाशे
और बुनता मंत्र-ध्वनियां शोर की इस रहगुजर में

इन अँधेरी स्याह सुधियों में खुला इक पृष्ठ कल का
दीप्त सहसा कर गया है प्रीत की मधुरिम विभा-सी।
मन व्यथित मेरे प्रवासी।।

गीत में जो ढल रहा है

घिस गई जो पिट गई जो बात वह गाता नहीं हूँ
गा चुके जिसको हजारों लोग, दोहराता नहीं हूँ
भाव हूँ मैं वह अनूठा, शब्द की उंगली पकड़कर
चल दिया जो पंथ में तो लौट कर आता नहीं हूँ
गीत में जो ढल रहा है, मैं स्वयं ही हूँ अनावॄत
कोई कॄत्रिम भाव मैंने आज तक ओढ़ा नहीं है।
 
गीत का सर्जक मुझे तुमने कवि अक्सर कहा है
और कितनी बार सम्बोधन मेरा शायर रहा है
मैं उच्छॄंखल आंधियों की डोर थामे घूमता हूँ
किन्तु मेरा साथ उद्गम से सदा जुड़कर रहा है
मैं विचरता हूँ परे आकाशगंगा के तटों के
पर धरा की डोर को मैंने अभी तोड़ा नहीं है।
 
मैं उफ़नती सागरों की लहर को थामे किनारा
मैं संवरती भोर की आशा लिये अंतिम सितारा
मैं सुलगती नैन की वीरानियों का स्वप्न कोमल
लड़खड़ाते निश्चयों का एक मैं केवल सहारा
मैं वही निर्णय पगों को सौंपता जो गति निरन्तर
और जिसने मुख कभी बाधाओं से मोड़ा नहीं है।
 
जो अँधेरे की गुफ़ा में सूर्य को बोता, वही मैं
वक्ष पर इतिहास के करता निरन्तर जो सही मैं
उग रहा जो काल के अविराम पथ पर पुष्प मैं हूँ
शब्द ने हर बार स्वर बनकर कथा जिसकी कही मैं
मैं सितारा बन निशा के साथ हर पग पर चला हूँ
व्यर्थ का सम्बन्ध कोई आज तक जोड़ा नहीं है।
 
जन्म लेती हैं हजारों क्रान्तियां मेरे सुरों में
मैं लहू बनकर उबलता हूँ युगों के बांकुरों में
मैं बदलता हूँ दिशा के बोध अपनी लेखनी से
मैं अटल हूँ शैल बनकर, हूँ प्रवाहित निर्झरों में
मैं निराशित स्वप्न को हूँ एक वह सन्देश अनुपम
आस की जिसने कलाई को कभी छोड़ा नहीं है।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 15.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^