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मन रे जागत रहिये भाई
01-Jun-2016 12:00 AM 3491     

मै कबीर को पढ़ता नहीं सुनता हूँ। मैंने कबीर को पढ़ कर नहीं जाना, सुन कर जाना है : कुमार गन्धर्व से सुना है, पद्मश्री भारती बन्धु से सुना है, प्रह्लाद सिंह टिपाणिया से सुना है, मधुप मुद्गल से सुना है, आबिदा परवीन से सुना है, ¶ाबनम विरमानी से सुना है, अ·िानी भिड़े दे¶ापांडे से सुना है, -- बचपन में, और बड़े होने पर भी, कबीरपंथी घुमक्कड़ साधुओं से सुना है जो आज विरले ही दीख जाते हैं। सुना था राहुल बाबा भी कभी कबीर मठ में रहा करते थे, कितने प्रभावित हुए कबीर की धुमक्कड़ी और सधुक्कड़ी के रहस्यवाद से, सर्वविदित है। जब मैं छोटा था उस समय की बात है, कभी मेरे बाबा मेरी ईया से बात करते हुए अगर किसी बात को अनाव¶यक विस्तार से वर्णन करने लगते थे तो मेरी ईया ऊब कर कहती थीं- "थोर कहले कबीर दास ढेर कहले कबिरहा!' ¶ाायद यही कारण रहा होगा कि कबीर को या कबीर पर मैं पढ़ता नहीं, कबीर को सुनता हूँ, गुनता हूँ।
बड़े होने पर बाबूजी ने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की कालजयी कृति "कबीर' (1942) मुझे पढ़ने को दी, सन् 76-77 की बात है। जैसा कि आचार्य ने स्वयं उप¶ाीर्षक के रूप में लिखा है कि ये किताब "कबीर के साहित्य और उनके दार्¶ानिक विचारों की आलोचना' है। उन्होंने अपनी किताब में दावा किया है कि "हिंदी साहित्य के हजार वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई लेखक उत्पन्न नहीं हुआ था।' उनके बाद के विद्वान आलोचकों ने उन्हें "क्रान्तिदर्¶ाी', "क्रन्तिकारी' और "रहस्यवादी' माना है, लेकिन उन्हें समाज सुधारक नहीं माना है। तब प्र¶न ये उठता है कि अगर कबीर समाज सुधारक नहीं थे तो उन्होंने एक "सोते हुए समाज' को किस तरह "झकझोरा', किस तरह जगाया, किस रूप में जागृति फैलाई? और अगर आज के सन्दर्भ में बात करें तो समाज के सोनेे के कारण क्या हैं?
समाज क्यों सोया है? क्या समाज को जीवन से वितृष्णा हो गई है? या अतिआसक्ति के चलते किसी तरह का योगदान नहीं करना चाहता है? क्या अतिआधुनिकता और भौतिकवादी सुख ने समाज को मानसिक और अध्यात्मिक रूप से पंगु बना दिया है? क्या हम उस समय की तुलना (जब कबीर ने रचनाएँ की थी) आज के समाज से करेगें? उस समय कबीर को कहने की जरूरत क्यों पड़ी थी? क्या उस समय का समाज पतन के कगार पर खड़ा था? कबीर में हम क्या पाते हैं जो समय को झकझोरता है? और क्यों झकझोरता है? क्या अभी भी आम जन को कबीर याद आते हैं या कबीर केवल अकादमिक बहस का हिस्सा बन कर रह गए हैं? कबीर मठों की क्या स्थिति है? कबीर पंथियों की क्या स्थति है? क्या अभी भी कस्बों-गाँवों में कबीरपंथी भजन गाते मिल जाते हैं? अगर नहीं तो कबीर की क्या प्रासंगिकता है? उत्तर आधुनिकतावाद और भूमंडलीकरण के दौर में कबीर जिन्दा हैं या इतने जर्जर हो गए हैं कि उनकी वाणी का समाज पर कोई असर ही नहीं होता?
मैं उन लोगों के उद्दे¶य पर भी सवाल करता हूँ जो कबीर पर "प्रवचन' देते हैं। क्या आज की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवे¶ा में कबीर को बुद्धिजीवियों ने अप्रासंगिक कर दिया है। क्यों और कैसे? क्या वो उन पांडित्यपूर्ण किताबों और सेमीनार हॉल में ही सिमट कर रह गए हैं? अगर सोते समाज को झकझोरेगें तो इन पांडित्यपूर्ण किताबों के पन्नों के बीच कैद होकर नहीं बल्कि उनसे अलग, उनसे स्वतंत्र होकर, जिस परंपरा के पोषक थे, उस वाचिक परंपरा के चलते ही झकझोर सकते हैं। कबीर झकझोरने बाले कवि हैं, किसी भी काल-खंड में जनमानस को जगानेवाले युग-द्रष्टा हैं। हमें उनके जाति, सम्प्रदाय या धर्म के परिपेक्ष्य में झाँककर उन्हें ब्रााहृण, दलित या बनिया के रूप में स्थापित कर के उनके कृतित्व की मीमांसा करना सर्वथा गलत और अनुचित होगा।
बीसवीं सदी के कवि-आलोचक टी.एस. एलियट ने अपनी कृति "दि वेस्ट लैंड' (1922) में यूरोप के सन्दर्भ में समाज के सोने का कारण, अपनी नई ¶ौली और बिम्बों के माध्यम से, "स्मृति-भय और वासना-दं¶ा' बताये हैं। भूतकाल की स्मृति और वर्तमान को ठीक से न जी पाने की मजबूरी ने प्रथम वि·ायुद्ध के बाद के वर्षों में समाज को कायर बना दिया था। उसी कायरता ने विस्मृति को जन्म दिया था। जाड़े के मौसम में बर्फ के नीचे दबे रहकर सबकुछ भूलकर सोये रहना, जड़ हो जाना -- एक विडम्बना कि वसंत निष्ठुरता और उत्पीड़न का सम्वाहक है और ¶िा¶िार ऊष्मा का! इस तरह की तात्त्विक विसंगतियों को समझाने और उससे उबारने के लिए क्रांतिकारी कवियों को नई भाषा गढ़नी पड़ती है। सोते हुए मध्यकालीन समाज को जगाने के लिए कबीर को अपने सबद, साखियों, दोहों, रमैनियों और उलटबांसियों का सहारा लेना पड़ा। उनकी मुख्य भूमिका सोते हुए समाज के मन और आत्मा को जगाते रहने की है - "मन रे जागत रहिये भाई।'
कबीर कालजयी हैं, वो कभी अप्रासंगिक नहीं होगें। उनकी रचनाएँ हमे¶ाा समाज की विसंगतियों, वर्जनाओं और विडंबनाओं पर साहसपूर्ण प्रहार करती रहेंगी। कुछ विद्वानों ने उन्हें व्यंग्यकार भी कहा है, इससे किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए क्योंकि व्यंग्य तो समाज की विसंगतियों को आईना दिखाकर समझने और समझाने का प्रयास है। लेकिन कबीर के व्यंग्य उपहास नहीं हैं, प्रहसन नही हैं, उनकी रचनाओं में अन्य चीजों के अलावा व्यंग्य भी एक अंग हो सकता है जो सत्य को सुनने के लिए बाध्य करता है, समझाने के लिए बाँधता है। कबीर के व्यंग्य में एक गंभीरता है जो लौकिक को अलौकिक से, सगुन को निरगुन से, द्वैत को अद्वैत से, आडम्बर और पाखंड को सहज जीवन से, क्लिष्ट ज्ञान को सरलता से रेखांकित कर प्रेरित करता है। सुनिए जरा, वो आज समाज में व्याप्त विसंगतियों को कितनी भाषिक दक्षता से उजागर करते हैं, समय-समय पर विस्मृति के गर्भ में छुपे हुए समाज को, बेखौफ, कैसे झकझोरते हैं।
कबीर अपनी साखियों से, दोहों से और रमैनियों से अध्यात्म की सूक्ष्मता बताकर लोगों को जगाने का खतरा मोल लेने से डरते नहीं है और खुला आवाहन करते हैं कि जो घर जारो आपणा चले हमारे साथ। उनका अध्यात्म और निर्गुण ब्राहृ की उपासना सोते हुए को जगानेवाला रहस्यवाद है "निर्गुण नाम जपो रे भैया' का अंतर्मन में समाहित करने का उद्बोधन है। कबीर का स्वर बुद्ध के बाद पैदा होने वाले ऐसे व्यक्ति का स्वर है जो अपने कर्म को करते हुए समाज की प्रमुख धारा को ललकारता है यह कहकर कि "पंडित बाद बदै सो झूठा' और एक नई दृष्टि देता है, एक नई राह बताता है "सतगुरू सबद गहो मेरे हंसा'। कबीर एक निर्भीक, अपने पूरे हो¶ाो हवास में एक जगे हुए इंसान का नाम है जिसकी भक्ति और आस्था अडिग है- "कबीर तू काहे डरे, सर पर सिरजनहार'।
इटली के पादरी मर्कोदोला तोम्बा ने 1758 में कबीर के बारे में लिखा उस समय से आज तक (लिंडा हेस 2015) कबीर पर अनगिनत ग्रन्थ कई भाषाओं में लिखे गए हैं। श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में करीब 500 दोहे सम्मिलित किये गए हैं। कबीर एक बहुआयामी व्यक्तित्व और कृतित्व के मालिक हैं। उनके दोहे और पद हमे¶ाा लोगों की जुबान पर रहते हैं। उनकी सूफियाना छवि लोगों के मन-मानस पर अंकित है। कबीर एक ऐसे मनीषी हैं जो अन्दर से हमें मजबूत करते हैं और बाहर से प्रहार करते हैं "ंआंतर हाथ सहार दे, बाहर बांहें चोट।' वे सोते हुए समाज को तभी जगा सकेंगे जब हम उनको सुनेंगे, समझेंगे, उनके नजदीक जायेंगे और उनकी बहुमूल्य बातों को सच्चे मन से ग्रहण करेंगे।

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