ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भाषा की दुनिया में आदमी
01-Oct-2018 07:20 PM 1220     

दुनिया का अर्थ ही यह है कि वह जब बनी होगी तो उसकी पहली इच्छा बोलने की रही होगी। क्योंकि दुनिया अगर है तो किसी से बोले बतियाये बिना आखिर चलेगी कैसे। जब शुरू-शुरू में आदमी पृथ्वी पर आया होगा, निश्चय ही उसने भोजन की तलाश की होगी, क्योंकि भूख अपने आप लगती है। आँधी, पानी, धूप और तूफानों से बचने के लिये कुछ प्राकृतिक गुफाओं में अपना आश्रय भी खोजा होगा। जिनका इतिहास लिखा गया है। गुफाओं की भित्तियों पर चित्र उकेरे होंगे और हमें आज भी गुहावासी मानव के चित्र उन प्राचीन गुफाओं में देखने को मिलते हैं। वह चित्रों में अपने आपको अभिव्यक्त कर रहा होगा। उसकी यह उत्कंठा देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि आदमी को अपनी भाषा की तलाश रही होगी। उसे अपने चारों तरफ जितने भी रूप दिखते होंगे - पशु, पक्षी, वृक्ष, नदी, पर्वत, सागर उन्हें वह नाम देना चाहता होगा। अभी हमने जिन नामों से उन्हें पुकारा है - वृक्ष, नदी, पर्वत आदि ये नाम उस प्राचीनतम आदमी के ही दिये हुए हैं।
यूं तो दुनिया में बहुत सारी खोजें हुई हैं जैसे गुरुत्वाकर्षण, गति का नियम, सापेक्षता का सिद्धांत, पर यदि गंभीरता से विचार किया जाये तो मनुष्य का वास्तविक आविष्कार भाषा है। उसमें यह खूबी रही है कि वह सृष्टि के नाद को सुन सका और उस नाद को अक्षरों में बदल सका और उन अक्षरों को शब्दों में ढाल सका, क्रियायें गढ़ सका और उन शब्दों से वाक्य बना सका। वाक्य बनाकर बोल सका। शब्दों से छंद बनाकर डोल सका। संगीत की बंदिशें रच सका, दूसरे से कुछ कह सका, दूसरे की कुछ सुन सका और अपनी जीवन अनुभूतियों को संग्रहीत करके काव्य रच सका। शास्त्र का निर्माण कर सका। अपने दुख और सुख की पहचान कर सका।
इतनी बड़ी पृथ्वी पर उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक अलग-अलग जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों में एक ही भाषा तो नहीं बन सकती थी, यही कारण है कि कई-कई बोलियाँ जन्मीं। बोलियों से कई-कई भाषाएं बनीं और कई-कई भाषाओं से अनगिनत अभिव्यक्तियाँ पृथ्वी के जीवन में समा गईं। हम आज भी सुनते हैं कि संसार के प्रत्येक देश में सैकड़ों बोलियाँ सदियों से बोली जाती रही हैं और वे धीरे-धीरे लुप्त भी होती गई हैं क्योंकि उन्हें बोलने वाले लोगों का जीवन सदियों से खतरे में पड़ता आया है। वह चाहे औद्योगिकीकरण के कारण हो या उसके और भी कारण हो सकते हैं।
भाषाशास्त्री हमें मार्गदर्शन करते हैं कि छोटी-छोटी बोलियों से भाषाएं बनती हैं। संसार की सब भाषाएं ऐसे ही बनी होंगी। हमारी हिन्दी को ही लें तो वह ब्रज, अवधी, बुंदेलखण्डी, राजस्थानी, भोजपुरी, मैथिली आदि अनेक बोलियों से बनी हैं और ये सब बोलियाँ इतनी समृद्ध रही हैं कि कुछ भाषाशास्त्री उन्हें एक संपूर्ण भाषा का ही दर्जा देते हैं। हिन्दी खड़ी बोली बनने से पहले इन भाषाओं (बोलियों) में बड़े-बड़े महाकवि - अवधी में तुलसीदास, मैथिली में विद्यापति, ब्रज में सूरदास, राजस्थानी में मीरा जैसे कविगण हिन्दी साहित्य को समृद्ध कर गये हैं। ये उस संत परम्परा के मध्यकालीन कवि रहे हैं जिन्होंने भारत के समूचे जीवन दर्शन को अपनी कविता में इन बोलियों (भाषाओं) में अवतरित किया।
आज हम संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट पढ़कर हतप्रभ हो जाते हैं कि पृथ्वी पर बोलियां सचमुच नष्ट हो रही हैं। अभी कुछ बरस पहले सुना था कि न जाने किसी एक देश में, किसी एक बोली को बोलने वाला एक ही आदमी था, वह भी मर गया। निश्चय ही वह बोली उसके साथ चली गई। हमारे संसार के आकाश में बहुत से पक्षी अब दिखाई नहीं देते जिन्हें खा लिया गया है। जब हम किसी पक्षी को खाते हैं तो उसके शरीर के साथ उसकी बोली भी खा जाते हैं। जब एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को मारने दौड़ता है तो वह सिर्फ उस मनुष्य के शरीर का ही अंत नहीं करता, वह उसके शरीर में रची-बसी भाषा का भी अंत कर देता है। कौन जाने वह मरता हुआ आदमी शब्दों में बसी कुछ ऐसी सच्चाईयाँ जानता हो जो और किसी को अब तक मालूम न हो, क्योंकि हर आदमी अद्वितीय है। भाषा भले ही एक हो लेकिन हर मनुष्य की अभिव्यक्ति अद्वितीय है।
कभी रूस के तानाशाह स्टालिन ने कहा था कि वह रूस के लिये एक "मास्टर लैंग्वेज" का निर्माण करेगा। यानि सारा रूस एक ही भाषा बोलेगा। ये अलग बात है कि अब स्टालिन नहीं हैं। रूस की क्रांति भी दुनिया में विफल हो चुकी है और 20वीं सदी के समाप्त होते-होते रूस के 11 टुकड़े हो चुके हैं। स्टालिन तो नहीं कर पाया, वैसे भी उसका सपना रूस तक सीमित था। पर रूस के विनाश के बाद अमरीका ने यह कर दिखाया। अमरीका ने यह नहीं कहा कि पूरा यूनाईटेड स्टेट एक ही भाषा बोलेगा। उसने सिर्फ यह कर दिया कि पूरी दुनिया उसके द्वारा चलाई गई लिपि में एक ही भाषा लिखेगी। जिसे हम रोमन लिपि के रूप में जानते हैं।
हिन्दी में सॉफ्टवेयर बनते हैं और उत्कृष्ट कोटि के सॉफ्टवेयर बनाये भी गये हैं लेकिन उनकी प्रतिष्ठा तो संसार में तब होगी जब उसे दुनिया की नामी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ पूरी ईमानदारी के साथ स्वीकार करें। पर ऐसा नहीं हो रहा है। भारत के हिन्दी सहित सभी भाषा-भाषी लोगों के सामने यह भ्रम चलाया जा रहा है कि वे हिन्दी लिखें चाहे तमिल, बांग्ला लिखें चाहें असमी, उन्हें रोमन लिपि का ही इस्तेमाल करना होगा। जैसा कि हमने शुरू में कहा कि लिपि ही शब्द बनाती है। शब्दों से वाक्य बनते हैं और हर लिपि का अपना-अपना ध्वनि विज्ञान होता है। अगर हम एक ही रोमन लिपि के अक्षर विन्यास में खो गये यानि कि पूरी दुनिया ही किसी एक लिपि के अक्षरों में डूबती चली गई तो जो संसार के अनेक देशों की विभिन्न लिपियों से गूंजने वाली ध्वनियाँ हैं, जो अरबों मनुष्यों के जीवन को अनेक प्रकार के छन्दों और अर्थों से घेरती हैं उनका क्या होगा और मनुष्य की उन बहुअर्थी और बहुआयामी छबियों को कैसे बचाया जा सकेगा।
हम बाजारवाद के समय में जी रहे हैं जिसका एक ही संकल्प है कि एक-से कपड़े, एक-सा भोजन, एक से घर, एक-से वाहन और एक-सी भाषा, एक-सी लिपि, एक-सी छवि, एक-से कवि, एक से बुद्धिजीवी - सब कुछ एक-सा। दुनिया के तमाम दार्शनिकों ने शताब्दियों में यह पहचाना कि यह दुनिया बहुआयामी बहुविश्वासी और बहुल अर्थछबियों से भरी दुनिया है। अगर यह दुनिया सचमुच ऐसी है, तो फिर यह एक लिपि से कैसे चलेगी। और अगर यह चली तो इस दुनिया का मनुष्य के लिये क्या वह अर्थ रह जायेगा जिसे उसने धरती के विभिन्न भूभागों में अपने बहुविश्वासों में खोजा था।
इस वर्ष दो अक्टूबर से भारत के स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नायक और विश्व मानवता को जीवन जीने की कला सिखाने वाले महामानव महात्मा गांधी की 150वीं जयंती भारत में मनायी जा रही है। आशा है यह दुनिया के दूसरे देशों में भी मनायी जायेगी। जहां तक हमें ज्ञात है कि महात्मा गाँधी ही ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी प्रतिमा दुनिया के ज्यादातर देशों में स्थापित की गई है। वे देश भले ही गांधी को विचार और कर्म के स्तर पर उतना न अपना पाये हों पर वे गांधी जी को आदर देकर यह संदेश दुनिया को देते रहे हैं कि आखिरकार गांधी जी ही हमारे काम आयेंगे। क्योंकि दुनिया जिस चौराहे पर खड़ी है वहां से अब अगर मानव जाति के लिये कोई मार्ग निकल सकता है तो वह एकमात्र गांधी मार्ग ही होगा।
योरुप में जो भी रहा हो भारत में गांधी मार्ग का यही अर्थ निकलता है कि भारत और योरुप दो सभ्यताएँ हैं और उनकी एक-दूसरे से टकराहट है। योरुपियन्स ने लगभग 16वीं सदी में भारत में प्रवेश किया। तब तक उन्हें अच्छे कम्बल बुनना भी नहीं आते थे और भारत संसार का सबसे अच्छा कपड़ा बुनता था। भारत लोहा पिघलाने की कला योरुप से पहले जान चुका था। कहने का मतलब ये कि अगर भारत को योरुप और ब्रिटेन आदि के लोगों ने मिटाया भी है या उसके प्रकाश को सदियों से धूमिल करने की कोशिश की है तब भी भारत जीवित है और इस पृथ्वी पर अपने आपको बचाये रखना चाहता है। शायद उसकी समस्या ये है कि उसे आज भी वेद चाहिये, उपनिषद की गहराई चाहिये, पुराण कथाएँ चाहिये, अपना भूला-बिसरा कर्मकांड चाहिये, उसे कमोबेश संस्कृत भी चाहिये, पर इस बदलती हुई दुनिया में अब उसे कंप्यूटर सॉफ्टवेयर भी चाहिये। उसे और ऐसी बहुत सारी टेक्नोलॉजी चाहिये जो वह नहीं बना सका। पर उसे उसकी जरूरत है यानि भारत अब अपनी विद्याओं और योरुप की विज्ञान और तकनीक के बीच कोई नया सेतु बांधने की अभिलाषा से भरा हुआ है। इस अभिलाषा का अर्थ योरुप के आगे घुटने टेक देना नहीं है, बल्कि एक आपसी आदान-प्रदान से अपनी सभ्यता की रक्षा करना है। वैसे भी भारत दूसरी किन्हीं सभ्यताओं पर कभी आक्रमणशील नहीं रहा, तो वह आज भी क्यों होना चाहेगा। वह तो दुनिया में सिर्फ शील का पक्षधर रहा। लोग भले ही उस पर आक्रमणशील होते रहें। रोमन लिपि अगर भारत पर कोई छलपूर्ण आक्रमण है तो निश्चय ही भारत को विचार करना पड़ेगा कि वह इस छल से कैसे छुटकारा पाये। वह पिछली चार-पांच शताब्दियों में कई प्रकार के छलों से छुटकारा पाता ही आया है। तभी तो वह अस्तित्व में है। यूनान, मिस्र, रोम, सभी मिट गये। अगर उसकी हस्ती अब तक नहीं मिट रही है तो उसमें कोई बात तो होगी।

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