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मैं उस जगह हूँ जहाँ फासला रहे तुमसे
01-Feb-2017 01:02 AM 6356     

जयपुर के लोकायत प्रकाशन पर जिस किताब पर मेरी नज़र पड़ी, वह थी आवाज़ चली आती है। इस नायाब किताब के शायर हैं मरहूम जनाब शाज़ तमकनत साहब। हिंदी पाठकों के लिए शायद ये नाम अंजाना हो लेकिन दकन में इनका नाम बहुत इज्ज़त से लिया जाता है। शाज़ साहब उर्दू के उन चन्द शायरों में शुमार किये जाते हैं जिन्होंने उर्दू साहित्य में नया इज़ाफा किया है। वो जिस कदर अपने समय में एकांत प्रिय रहे और अपनी ज़िन्दगी के उतार चढ़ावों से गुज़रते हुए शायरी को अपना ओढना-बिछौना बनाया, शायद ही कोई और शायर इस बांकपन के साथ नज़र आता है।
क्या खबर थी कि तेरे बाद ये दिन आयेंगे
आप ही रूठेंगे हम आप ही मन जायेंगे
ज़िन्दगी है तो बहरेहाल गुज़र जायेगी
दिल को समझाया था कल आज भी समझायेंगे
सुबह फिर होगी कोई हादिसा याद आएगा
शाम फिर आएगी फिर शाम से घबराएंगें
31 जनवरी 1933 को हैदराबाद में शाज़ तमनकत साहब का जन्म हुआ। उस वक्त उर्दू शायरी का वहां बोलबाला था। शाज़ साहब को अपनी माँ से बेइन्तहा मोहब्बत थी लेकिन बचपन में ही उनका साया अचानक सर से उठने पर वो टूट गए। उसी टूटन ने शाज़ साहब के भीतर उस शायर को पैदा किया जिसने आगे चलकर इंसान की ज़िन्दगी और समाज के दर्द को अपनी शायरी के विशाल दामन में समेटा। कॉलेज की पढ़ाई ख़त्म होते-होते शाज़ साहब की गिनती हैदराबाद के नामवर शायरों में होनी लगी।
कुछ रात ढले होती है आहट दरे दिल पर
कुछ फूल बिखर जाते हैं मालूम नहीं क्यूँ
मत पूछ नकाबों से तू यारी है हमारी
हम चेहरों से डर जाते हैं मालूम नहीं क्यूँ
हर सुबह तुझे जी से भुलाने का है वादा
हर शाम मुकर जाते हैं मालूम नहीं क्यूँ
शाज़ साहब का पहला मजमुआ तराशीदा 1966 में शाया हुआ। उसके बाद 1973 में बयाज़े शाम और 1977 में नीम ख़्वाब। शाज़ साहब ने कम लिखा लेकिन जो लिखा वो उन्हें अमर कर गया। शाज़ साहब ने वारंगल से अध्यापन कार्य शुरू किया और कुछ समय वो पूना भी रहे। पूना में उन्होंने पूना कॉलेज आफ आट्र्स के उर्दू विभाग में प्रोफ़ेसर के पद पर कार्य किया। पूना छोड़ते समय वहां जश्न-ऐ-शाज़ बड़ी धूमधाम से मनाया गया जिसमें सरदार जाफरी, कैफ़ी आज़मी, जाँनिसार अख्तर, मजरूह सुल्तानपुरी और साहिर लुधियानवी जैसे मशहूर शायरों ने शिरकत की। शायर तो शायर इस कार्यक्रम में शिरकत के लिए मुंबई से दिलीप कुमार, वहीदा रहमान और सुनील दत्त साहब भी खिंचे चले आये।
जिस से बेज़ार रहे थे वही दर क्या कुछ है
घर की दूरी ने ये समझाया कि घर क्या कुछ है
रात भर जाग कर काटे तो कोई मेरी तरह
खुद-ब-खुद समझेगा वो पिछला पहर क्या कुछ है
जैसे किस्मत की लकीरों पे हमें चलना है
कौन समझेगा तेरी रहगुज़र क्या कुछ है
शाज़ साहब की शायरी आम आदमी के दिल की आवाज़ है। हिंदी में उनकी रचनाओं का ये पहला संकलन है जिसे शशि नारायण स्वाधीन साहब ने सम्पादित किया है और वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।

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