ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
महिला दिवस और फ्रेंच टोस्ट
01-Mar-2016 12:00 AM 990     

वह महिला दिवस की खुशनुमा सुबह थी। यानी पूरी तरह अपनी, सिर्फ एक महिला की सुबह। इस सुबह में किसी पुरुष का हस्तक्षेप बिलकुल नहीं था। (क्योंकि पुरुष अभी सो रहा था)। मुझे सारा संसार महिलामय दृष्टिगत हो रहा था। करोड़ों साल से उगते आ रहे सूर्य का प्रभामंडल आज मुझे महिलामंडल सा तेजस्वी लग रहा था।
अखबारों में महिलाओं के और दिनों से ज्यादा चित्र थे। महिला दिवस पर होने वाले कार्यक्रमों की विस्तृत सूचनाएं भी। सड़कों, पार्कों, मैदानों में महिला दिवस के महत्व से संबंधित तख्तियां, बैनर और पोस्टर लगे हुए थे। दूरदर्शन पर महिलाओं की खूबसूरती पर बहस छिड़ने वाली थी। वायुमंडल में सर्वत्र महिला व्याप्त थीं। महिलाओं का, महिलाओं के द्वारा, महिलाओं के लिए मनाया जाने वाला एक अनोखा दिवस।
जब रहा न गया तो एक चैतन्य महिला की हैसियत से सोने वालों को जगाते हुये मैंने सहर्ष, सगर्व घोषणा कर दी, "जानते हैं! आज हमारा महिला दिवस है!'
"क्या?' वे चादर फेंककर उठ बैठे- "अरे वाह! बधाई! कांग्रेट्स। अरे निक्की, नयना! उठो, उठो जल्दी। मम्मी को विश करो। हैप्पी विमेंस-डे'। मम्मी खुशहाल हों; महिलाएं खुशहाल हों। हाँ तो बच्चो, चलो, फटाफट सोचा जाए कि कैसे सेलीब्रोट किया जाए मम्मी का महिला दिवस। यानी कुछ अलग ढंग से, समथिंग डिफरेंट...'
महिला दिवस के प्रति उनका यह उत्साह और निष्ठा देखकर मन में नाना प्रकार की प्रतिक्रियाएं रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत करने लगीं। प्रतिक्रिया नंबर एक- "स्त्री जाति के प्रति आपका यह पूज्य भाव देखकर मैं श्रद्धावनत हूँ। काश! आप जैसे कुछ और पुरुष हिंदुस्तान में होते-तो हम महिलाओं को अलग से "महिला दिवस' मनाने की नौबत ही न आती। हम लोग साथ-साथ "व्यक्ति दिवस' या "इनसान दिवस' न मानते। एक पूरे दिन इनसान न बने रहते।
प्रतिक्रिया नंबर दो- "हाय री महिला! तेरी भी क्या तकदीर ठहरी! महिला दिवस कैसे मनाया जाए, यह सोचने का हक तक लपककर एक पुरुष ने हथिया लिया। लोग झूठ थोड़ी कहते हैं कि महिलाएं अभी बहुत पिछड़ी हुई हैं सोचने की दिशा में।' इसके पहले कि मैं सोचना शुरू करूं, उन्होंने सोच लिया और जोर-शोर से घोषणा भी कर दी-
"आइडिया! क्यों न महिला दिवस के उपलक्ष्य में नाश्ते में फ्रेंच टोस्ट खाया जाए! ऐ! कैसा रहेगा? आज का दिन भी आधी छुट्टी का, शनिवार। हम ऐलान करते हैं कि आधी छुट्टी वाली शनिवार की यह सुबह स्त्री जाति की खुशहाली के नाम। मैं आज देर से ऑफिस जाऊँगा- घर में रहकर इस खुशहाली की कामना करूँगा।'
मैं उनकी घोषणा पर दंग रह गई। पैरों के नीचे की जमीन धीरे-धीरे खिसकनी शुरू हो गई। घबराकर कहा, "लेकिन आप देर से ऑफिस क्यों जाएंगे? कोई आपका दिवस थोड़ी है!'
उन्होंने हँसकर कहा, "तुम्हारी खातिर, एक महिला की खातिर। आज मुझे कोई रोक नहीं सकता देर से ऑफिस जाने से। एक पुरुष द्वारा महिला दिवस के उपलक्ष्य में ऑफिस देर से जाना सभ्य समाज में चर्चा और फख्र का विषय होगा। रूढ़िवादी, शोषक और बर्बर मानसिकता के सामने एक मिसाल होगी, एक चुनौती होगी। विमेंस-डे पर एक पति द्वारा पत्नी को दिया गया एक नायाब तोहफा होगा।'
फिर भावुक हो आए- "तुम समझतीं क्यों नहीं! मैं तुम्हें आज के दिन कुछ देना चाहता हूं, लेकिन क्या बचा है मेरे पास? पैसे तुम्हें महीने भर के पहले ही दे चुका, सिर्फ छुट्टियां बची हैं मेरे पास, वही सही तुम्हारे नाम।'
"खैर, कोई बात नहीं, ठीक है।' मैंने कृतज्ञतापूर्वक आभार प्रदर्शन किया।
"तो फिर झटपट फ्रेंच टोस्ट की तैयारी करो। अंडे न हों तो निक्की, नयना से कह दो। तब तक मैं जल्दी से शेव किए लेता हूँ, जिससे तुम्हें इंतजार न करना पड़े। फिर सब साथ-साथ सेलीब्रोट करेंगे द ग्रेट विमेंस-डे।'
लहजे का झोंका कुछ इतना खुशगवार था कि अचानक अंदर टिमटिम जलती "ईगो' की शमा भभककर जल उठी। एकदम हिंदी फिल्मों की खलनायिका की तरह। वही विष बुझी हँसी मेरे नायिकापन की चादर को उधेड़कर रख देती हुई- "भई वाह! क्या अंदाज है एक लेखिका के स्त्री सरोकार की प्रतिबद्धता का! क्या जबरदस्त शुरुआत है महिला दिवस की! पति और बच्चों को सुबह-सुबह ब्रोक फास्ट में दिया जाता फ्रेंच टोस्ट का शानदार स्वादिष्ट तोहफा। मुबारक हो तुम्हारा महिला दिवस!'
मैं रुआँसी पति के पास दौड़ी। बात संभालने की गरज से पस्त आवाज में कहा, "सुनिए, आज फ्रेंच टोस्ट न बनें तो कोई हर्ज?'
"क्यों? अंडे नहीं मिले क्या?'
"नहीं, यों ही, फ्रेंच टोस्ट तो मैं अकसर ही बनाती रहती हूं।'
"तो? तो क्या हुआ? यानी?' उन्होंने मेरे अंदर चल रहे शमावाले प्रसंग को भाँपकर बेरुखी से कहा, "नहीं बनाओगी? चलो भाई बच्चो, चलें अपनी जगह वापस। जो कुछ रोज मिलता था, वह भी आज नाश्ते में मयस्सर नहीं होगा।'
"आप समझे नहीं, बनाऊँगी भला क्यों नहीं! लेकिन मेरे खयाल से फ्रेंच टोस्ट को महिला दिवस वाले घोल में डुबोया जाए तो ही अच्छा (मेरे हक में)।'
"लो भला, तब तो सारा मजा ही किरकिरा हो जायेगा। हम हजार फ्रेंच टोस्ट खाएँ, लेकिन विमेंस-डे के फ्रेंच टोस्ट की बात ही कुछ और होगी। है कि नहीं निक्की, नयना?'
बहुमत को अपने पक्ष में करने की उनकी अनैतिक साजिश लगातार जारी थी। वह तो अच्छा था कि बच्चे अर्थात् बहुमत उम्मीदवार की तरफ से पूरी तरह उदासीन चल रहे थे।
लेकिन मुझे तो गठबंधन सरकार की शर्तें निभानी थीं। लोगों का क्या ठिकाना, कब फिकरा कस दें- घर न हुआ, संसद भवन हो गया। बच्चे प्रसन्न और निÏश्चत थे- उन सांसदों और विधायकों की तरह जिन्हें जो दल चाहे बेचे, जो चाहे खरीदे। सारे दल एक से। कीमत सही मिलनी चाहिए।

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