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महेश अनघ की कहानियां कौतूहल काव्य रस और सामाजिक न्याय की त्रिवेणी
01-Sep-2016 12:00 AM 5288     

समकालीन हिन्दी की कृतियों में "जोग लिखी" और "शेषकुशल" नवगीतकार और कथाकार महेश अनघ के ये    दो कहानी संग्रह, इस कारण से उल्लेखनीय कहे जा सकते हैं क्योंकि इनमें कौतूहल काव्य रस और सामाजिक न्याय की अनूठी त्रिवेणी प्रवहमान है। कहानी में कौतूहल अर्थात आगे क्या? की जिज्ञासा यों तो कहानी का एक आवश्यक तत्व ही माना जाता रहा है पर बाद की कहानियों में इसका स्थान यथार्थ परक चित्रण, मनोवैज्ञानिक अथवा सामाजिक परिवेश के चित्रांकन ने ले लिया और कौतूहल को किस्सागोई से जोड़कर इस तत्व को निकल बाहर करने की चेष्ठा की गई है। वस्तुतः कौतूहल को कहानी से अलग नहीं कर सकते। कथासरित्सागर की कहानियां हों या कुछ आधुनिक कथाकारों की किस्सागोई, इन सभी में जिज्ञासा का तत्व अंतर्धारा की तरह विद्यमान दिखाई देता है, इसके बिना तो कहानी एक रिपोर्ताज जैसी फोटोग्राफकि आर्ट जैसी बन जाती है
दूसरा तत्व जो महेश अनघ की कहानियों में है वह है काव्यत्मकता। कहानी में कविता जैसी तरलता और सम्मोहन सृजित करते चलना यह भी उनकी निजी विशेषता है। इसके पीछे बड़ा कारण यह है कि महेश अनघ एक सफल और स्थापित नवगीतकार भी हैं इसलिए उनका कविमन सहज ही ऐसे विशेषण विपर्यय खोज लेता है जो कहानी में संवाद और चित्रांकन के बीच ऐसी काव्यात्मक तरलता सृजित करते हैं जैसे कि एक सफल कवि कविता में शब्द और अर्थ के बीच के अनकहे को पाठक के हृदय में अचानक उठी तरंग की तरह स्पंदित कर देता है। एक अन्य कारण उनका संस्कृत साहित्य के प्रतिभावान विद्यार्थी होना भी है। आधुनिक कविता और कहानी जैसी कठोर कहीं-कहीं वीभत्स शब्दावली के प्रयोग से आक्रोश को व्यक्त करने का चलन सा हो गया है वहीं संस्कृत साहित्य में परुषता के स्थान पर स्निग्धता का प्राबल्य है एवं समाज में शुभत्व को ही देखने दिखाने का चलन रहा। आम आदमी के दुःख संत्रास द्वंद्व को संस्कृत में कम ही चित्रित किया गया।
महेश अनघ की कहानियों में जिस तीसरे तत्व की बात मैं कह रहा हूँ- वह है सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता। यद्यपि इस पहलू पर चर्चा कम ही हुई है उनकी किस्सागोई की विशेषता और कविता जैसे अंतप्र्रवाह की चर्चा के बीच यह छूट गई लगती है। सामाजिक प्रतिबद्धता और सामाजिक न्याय को दरअसल जिस तरह एक आन्दोलन के रूप में कहानी कविता नाट्य आदि विधाओं में में थीम बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है वैसा महेश अनघ की कहानियों में पृथक बैनर के बतौर कुछ नहीं हैं, फिर उनकी कहानी में सामजिक न्याय के प्रति छटपटाहट और वर्ग संघर्ष की परुषता या कठोरता भी कविता की छाया से होकर निकलने के कारण अलग ही रूप में व्यक्त हुई है। उच्च वर्ग का नजरिया भी कहीं-कहीं उदार हुआ है यह भी उन्होंने दिखाया है। "शेष कुशल" कहानी में अनघ कौतूहल तत्व का उपयोग कौशल से करते हैं। संग्रह की कहानी "नारियल" में कथावाचक आनंद मोहन वैश्यम्पायन गोत्र के ब्राह्मण, नियम से सत्यनारायण कथा बांचने जाते हैं, भग्गा कुर्मी के यहाँ। भग्गा सुनाता है कि पंडिज्जी आपके पिता जी बड़े डाक्टर हो कर इस गाँव में आए तो बहुत बे मन से डाक्टरी करते। रत्ना की मरणासन्न औरत को देखकर बाहर निकलते समय बैल ने उन्हें सींग मार दिया तो रतना ने उन्हें खटिया पर लेटा कर अस्पताल पहुंचा दिया और डागघर साब के चरणों में गुडी मुडी दो रुपये का नोट बतौर फीस रख दिए। इस घटना से आपके पिताजी ने रत्ना काछी को कलेजे से लगा लिया और गाँव की कीच-माटी और डाकघर साब दूध पाने से एक बरन हो गए। पंडित आनंद मोहन घर वापस आते हैं तो पत्नी उनके थैले में मात्र एक नारियल देख कर कहती है -  सो, दिस इस योर टोटल इनकम ऑफटुडे। पंडित आनंद मोहन ने शांत भाव से कहा- एस, थिस नारियल इज लव आफ गॉड। एंड ओनली दिस इस इनकमिंग आल अथर आर आउट गोइंग। कथा के चढ़ावे के पैसे मैंने भग्गा कुर्मी को दे दिए हैं, नमक मिर्च खरीदने के लिए।
प्रेमचंद की कहानी में, जिस पर सत्यजित राय ने सद्गति फिल्म बनाई, चतुर्थ वर्ण का व्यक्ति जब पंडित जी के पास अपनी बेटी के विवाह का मुहूर्त शोधन करवाने जाता है तो पंडित जी कहते हैं की जब तक वह पत्रा देखते हैं तब तक आँगन में पड़ी लकड़ी के छोटे छोटे टुकड़े कर दे। बेचारा धूप में सुबह से दोपहर तक लकड़ी फाड़ते-फाड़ते पसीना पसीना हो जाता है पर पंडित जी का दिल नहीं पसीजता। बस उन्हें इतना ही लगता है कि कहीं यह ऐसे में मर गया तो घर से बाहर फेकने में इसे छूना पड़ेगा। प्रेमचंद चूंकि संस्कृत साहित्य की पृष्ठभूमि से नहीं आए थे वे तो सीधे उर्दू में लिखते थे, वंचितों की दयनीय स्थिति व शोषण को सीधे-सीधे देखते आए थे इसलिए उनके साहित्य में ऐसे पात्र का अभाव ही है जो अपनी ऊंची जाति के किए गए विगत शोषण को देख कर स्वयं रूपांतरित तो हुए ही समाज को रूपांतरित करने की चेष्ठा में लगे हों। वस्तुतः यही मनोवृत्ति समाज के वर्ग वर्ण भेद और सामाजिक अन्याय को समता और प्रेम की ओर अग्रसर कर सकती है, वर्गसंघर्ष से तो अंतहीन समस्याएँ ही उभरती जाती हैं यही वास्तविक रूपंतार्ण या कायाकल्प है जिसे थ्र्ड्ढद्यठ्ठथ्र्दृद्धद्रण्दृद्मत्द्म कहते हैं पर यह सब अपने-अपने दृष्टि-बोध की बात है।
विगत दिनों समाचार था कि एक दलित को अपने परिजन का अंतिम संस्कार करने के लिए दबंगों के कारण गाँव में खाली जमीन नहीं मिली तो उसने मजबूर होकर अपने घर के बाहर ही अंतिम संस्कार कर दिया। ऐसी ही घटना पर महेश अनघ ने शाह जी की "सद्गति" शीर्षक कहानी में वर्ग चेतना की जागृति को भी कौतूहल के अतिरेक के साथ उभारा है जिसका सार संक्षेप यह है कि गाँव के श्मशान में पांच चबूतरे हैं और गाँव में एक साथ पांच ही जानें चली जाती हैं। पांचवी के संस्कार के लिए चबूतरा साफ किया जाता है और चिता सजाई जाती है कि अचानक ही कस्बे के शाह जी के अंतिम संस्कार के लिए भीड़ उमड़ आती है और खाली चबूतरा नहीं दिखने पर एक युवक कहता है कि चूंकि अभी इस में चिता को आग नहीं लगी है इसलिए वे इस चबूतरे को खाली कर दें। इस पर अनुभवी बुजुर्ग कहते हैं कि हम छोटी जात के हैं, गरीब हैं तो क्या हमारी भी कोई इज्जत है कि नहीं? शाह जी के पक्ष के साथ आया थानेदार कहता है कि डेथ सर्टिफिकेट नहीं है तो फौरन लाश के साथ यहाँ से निकल जा, क्या पता आत्महत्या हो या हत्या। इसी सन्नाटे के बीच पोखर के पास खड़ा मृतक का छोटा पुत्र दौड़ कर दरोगा के सामने आकर खड़ा हो गया। यह लीजिए, यह कहते हुए उसने पेंट की जेब से एक कागज़ निकाल कर दरोगा के हाथ में थमा दिया। अच्छी तरह देख लीजिए। दरोगा की बोलती बंद हो गई और मौका देख कर इस पक्ष के बड़े लड़के ने फौरन अग्नि दे दी। चार युवक एक शानदार दीवान ले आये और उस पर रख संस्कार किया गया और इस तरह शाह जी को सद्गति प्राप्त हुई। पर अभी कहानी अशेष है। अनघ यहाँ कौतूहल तत्व का उपयोग कौशल से करते हैं। तो सुनें। तीसरे दिन अस्थि संचय के लिए जब परिजन आए तो देखा राख की पर्तों में ढेर सारी सौ-सौ रुपए की गड्डियां भी राख में हुई पड़ी थीं, वे अपनी अघोषित संपत्ति चोरों और सरकार से बचाने के लिए दीवान के अन्दर ही डालते रहे थे और एक करोड़ रुपए अपने साथ ले गए। "हाई डोज" कहानी में निम्न वर्ग के महतो परिवार के तीसरी पीढ़ी के लड़के को डाक्टरी पढ़ते देख गाँव के पंडितजी ने उसके पछुआ रोग की अनोखी दवा निकाली। कहा महतो तेरा बाप बिल्ले का शरीर धर कर पुनर्जन्म लेकर इसी गाँव में आया गया है, विधि विधान से उसे घर ले आ। किसी तरह लक्ष्मण महतो अपनी घरवाली को बिल्ले रूपी ससुर की अगवानी के लिए तैयार करता है। पर बिल्ला खीर चट करने के बाद कपड़े बदलती बहू पर हमला कर देता है बहू कहती है ससुर जी ऐसे तो नहीं थे। बेटा कहता है बिल्ले की टांग तो क्या समूचा ही तोड़ दूंगा, क्या पंडित जी की पवित्र पौर में फेंकने की इजाजत दोगी? जयप्रकाश चौकसे ने "परदे के पीछेे" में अदूर गोपाल की एक फ़िल्म का जिक्र किया है कि दलित समुदाय अपने शोषण के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष में विजयी होने पर भी पराजित पर तानी हुई अपनी तलवार फ़ेंक कर चला जाता है। सवाल यह है कि ऐसी स्थिति तक बदलाव को सशक्त यथार्थ रूप से दर्शाने के बाद लेखक क्या करे? क्या वह इसका नेतृत्व करते हुए कोई साहित्यिक पहल करे? किसी आन्दोलन का हिस्सा बने?      इस पर कहानीकार महेश का अपने "जोग लिखी" संकलन में कथन है कि मैं कहानी से क्रांति नहीं लाना चाहता। गरीबी, शोषण और भ्रष्टाचार मिटाना मेरे बस की बात नहीं, जिनके बस का है, क्या उन्होंने कर दिखाया है? मैं तो बस इतना चाहता हूँ कि भगवान्, जो लिखूं वह अघटित भले ही लगे, पर झूठ न हो और जिस तरह लिखूँ, पूरा पढ़े तो सही कम से कम। आगे वे कहते हैं कि कहानी का मतलब कुछ और होता हो तो पण्डे पुरोहित जानें। पंचों की राय सर माथे।

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