ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
महात्मा गांधी चरित स्वयं ही काव्य
CATEGORY : स्मरण 01-Oct-2016 12:00 AM 2529
महात्मा गांधी चरित स्वयं ही काव्य

भारत के हृदय प्रदेश के उज्जयिनी नगर निवासी यशस्वी कवि श्री शिवमंगल सिंह "सुमन" की नोटबुक में पण्डित नेहरू ने, 1954 में यह वाक्य लिख दिया था- "अपने जीवन को कविता बनाना चाहिये"।
1989 में जब पूरे देश में नेहरू जन्मशती के आयोजन हुए, तभी इस अवसर पर भोपाल में कलाओं के घर भारत भवन में विश्व कविता समारोह आयोजित हुआ। पण्डित नेहरू की स्मृति को समर्पित इस समारोह के एक पोस्टर पर यह वाक्य भी प्रकाशित हुआ- "अपने जीवन को कविता बनाना चाहिए"।
पण्डित नेहरू कवि हो सकते थे, पर हुए नहीं। वे अपने जीवन को कविता बना सके या नहीं, इस पर अनेक मत हो सकते हैं, पर यह निर्विवाद है कि उन्होंने जीवन और कविता को आत्मीयता से देखा और पढ़ा। उनकी "भारत एक खोज" भारत के जीवन में रची-बसी कविता की ही खोज मालूम पड़ती है। महात्मा गांधी के निकटवर्ती और लाडले पण्डित नेहरू यह निश्चय ही जान सके होंगे कि कविता को जगह कहां मिली, वह तो ग्रामवासिनी भारतमाता की कुटिया से भी दूर होती गयी।
अगर हम इस अहसास से भर उठे हैं कि "बापू भारत की कविता" हैं तो बापू के समकालीन और कविता के आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से पूछ लिया जाये कि कविता क्या है। बीसवीं सदी के चौथे दशक में स्वाधीनता संग्राम जब चरम उत्कर्ष की ओर अग्रसर था, उनका प्रसिद्ध निबंध "कविता क्या है" प्रकाशित हुआ। आचार्य शुक्ल कहते हैं-
"जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिये मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आयी है, उसे कविता कहते हैं। इस साधना को हम भावयोग कहते हैं और कर्मयोग और ज्ञानयोग का समकक्ष मानते हैं।"
"कविता की हृदय को प्रकृत दशा में लाती है और जगत के बीच क्रमश: उसका अधिकाधिक प्रसार करती हुई उसे मनुष्यत्व की उच्चभूमि पर ले जाती है। भावयोग की सबसे उच्च कक्षा पर पहुंचे हुए मनुष्य का जगत के साथ पूर्ण तादात्म्य हो जाता है, उसकी अलग भावसत्ता नहीं रह जाती, उसका हृदय विश्व-हृदय हो जाता है। उसकी अश्रुधारा में जगत की अश्रुधारा का, उसके हास-विलास में जगत के आनंद-नृत्य का, उसके गर्जन-तर्जन में जगत के गर्जन-तर्जन का आभास मिलता है।"
हृदय की मुक्ति के लिये किया गया शब्दविधान हर युग में नये कर्म-विधान की मांग करता है। बापू ज्ञानयोगी और कर्मयोगी तो थे ही, वे भावयोगी भी थे। इस मणिकाञचन संयोग में उनका ज्ञान तपा हुआ स्वर्ण है। उनका स्वयं प्रकाशित कर्म ही मणि है और उससे बिखरने वाली द्युति ही भाव है। बापू कहते थे "मैं उस प्रकाश के अनुरूप आचरण करता हूं जो मुझे प्राप्त होता है। यह प्रकाश कभी मन्द और कभी अधिक प्रखर होता है। यह मेरी आन्तरिक बुद्धि और साधना पर निर्भर है।" बापू के जीवन पर महाकवि तुलसीदास द्वारा रचित कागभुसुण्डि और गरुड का संवाद छाया हुआ है। वे कविता से निकलते अनुभवगम्य मार्ग पर परमेश्वर की अंगुली पकड़कर चलते हैं। जहां किसी वाद का बन्धन नहीं, बेहद का मैदान फैला है। इस मार्ग पर -विषय बयार से बार-बार बुझ जाने वाले दिये भी नहीं, स्वयं प्रकाशित मणि ही रोशन है, जिसकी रोशनी में भूला हुआ मार्ग फिर प्रतीत होने लगता है, दूर टिमटिमाता हुआ अपने गांव का चिराग दीखता है।
हम जीते-जी तो "रामचरित मानस" पढ़ते ही हैं, जब मरने लगते हैं तो फिर उसे ही सुनने की इच्छा करते हैं। मृत्यु की गहराई में उतरते हुए उसे साथ ले जाना चाहते हैं। कामनाओं से भरे जीवन में ऐसा काव्यात्मक सहारा कोई दूसरा नहीं। वह परिवार की कथा है इसीलिए घर-घर में पूजी जाती है, मानस रोगों का उपचार करती यह कविता औषधि बन जाती है। कागभुसुण्डि कहते हैं- शरीर ही मोक्ष की सीढ़ी है। दरिद्रता के समान दुख: नहीं है। सन्तों के मिलन में ही सुख है। अहिंसा ही परमधर्म है। परनिन्दा ही पाप है और सब रोगों की जड़ हमारा मोह ही है।
कलिकाल के पुरुषोत्तम के लिये "धर्म की रसात्मक अनुभूति" और गुणगान ही तो एकमात्र सहारा है। महात्मा गांधी अकेले लोकनायक हैं जिनका काम एकाध तराने से नहीं चला। उन्हें तो बहुत सारी कविता की जरूरत पड़ी - कबीर, तुलसी, सूर, मीरा, नानक, रैदास, नरसिंह मेहता, तुकाराम, नजीर, बंकिम और रविन्द्र सबकी कविताएं उनकी प्रात:-सायं प्रार्थनाओं में शामिल हो गयीं। बापू ने हमारे लिये ऐसे लोक प्रचलित गुणगान चुने जो सबकी सांसों की लय पर हर पल साथ चल सकें।
हम एक अकथ और अनन्त कथा के ही पात्र हैं। हम हर बार अपनी कथा से दूर छिटक कर उसे ही कहने की कोशिश करते हैं। सब उसे बहुविध कहते हैं। हमारी जड़े जमीन में नहीं, गगन में हैं। उल्टे पेड़ की तरह लटके हुए हम इस संसार में पत्तियों सरीखे हैं। हमारे अलग-अलग तरह के स्वाद उसी वृक्ष के फलों को चखते हैं। स्वादों की भिन्नता ही शायद जीवन और कविता का रूप बदलती होगी।
किसी की कविता पढ़कर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि उसने जीवन का स्वाद किस तरह चखा है। इसी तरह जीवन को देखकर यह पता चल ही जाता है कि जीवन में कविता किस तरह अवतरित हुई है। चखने की यह "तरह" ही कविता और जीवन का शिल्प बनती होगी। कविता और जीवन एक-दूसरे में इस तरह घुले-मिले हैं कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। कविता कब जीवन और जीवन कब कविता बन जाये, कहना मुश्किल है।
बापू उस शाश्वत वर्तमान को भजते रहे जो कभी नहीं बीतता, हमेशा सबके साथ चलता है। जो लोग निरन्तर वर्तमान में जी नहीं पाते उन्हें ही लगता होगा कि समय बीत गया। शायद इसी भ्रम के कारण उन्हें भविष्य भी आता हुआ दिखायी देता होगा, जिसका बस एक ही तराना है-
हम होंगे कामयाब एक दिन
होगी शान्ति चारों ओर एक दिन
हम चलेंगे साथ-साथ
ले के हाथों में हाथ एक दिन
इस आने वाले किसी एक दिन की चाहत उस पल में रहने ही नहीं देती जो अभी ही कर्मकुशल और बेहद शान्त है। उसमें अतीत को कोसने और भविष्य को पोसने का कोई अवकाश ही नहीं। वह तो नश्वरता के बोध से भरा एक जीता-जागता पल है, जहां सिर्फ प्रार्थना की जा सकती है - प्रार्थना मृत्यु का स्मरण है।
आचार्यों की दृष्टि में कविता और उपासना दोनों ही भाव साधनाएं है। दोनों में ही सत्य की काल्पनिक प्रतिमा गढ़ी जाती है, जिसमें निश्चल ही पूर्ण सत्य का दर्शन नहीं होता पर सत्याग्रह अवश्य होता है। बापू सत्याग्रह को अहिंसक देह का विरागी प्रयत्न ही मानते हैं, जो खुद अपने आपको ही त्यागकर संसार को भोगती है। ऐसी देह निर्भय और संचय विमुख हो जाती है, फिर उसके खालीपन में सहज ही कविता का आलोक भर जाता है और वह जगमगा उठती है। बापू अपने जीवन में इसी तरह कविता को चरितार्थ करते हैं। वे कविता नहीं लिखते, उनके चरित से ही कविता का आलोक झरता है और शब्द युगानुरूप अर्थगौरव से भर उठते हैं।
इस नये अर्थगौरव से भरी यह मूर्तिमयी-करुणामयी देह जब महाकवि निराला की कविता मे अवतरित होती है तो समर को त्याग देती है, वह पहले अपने स्वराज्य को सिद्ध करती है :
शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन
छोड़ दो समर जब तक न सिद्धि हो रघुनन्दन
आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर
तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर
"राम की शक्ति पूजा" - निराला
"भारत छोड़ो आन्दोलन" के लगभग छह-सात वर्ष पहले महाप्राण निराला ने "राम की शक्तिपूजा" कविता की रचना की थी, जिसमें संयत प्राण पुरुषोत्तम ही शक्ति की मौलिक कल्पना करके उसी से अपनी विजय का आशीर्वाद पाते हैं, पुरुषोत्तम नवीन कहलाते हैं। महाशक्ति और कोई नहीं, सागर तल से ऊपर उठी हुई पृथ्वी माता ही साक्षात् शक्ति हैं और सागर ही उनका वाहन है। दसों दिशाएं उनके हाथ हैं। संसार की विराट देह में अपने आप को ऊपर उठाती उन्नत प्राण देह निराला की इस कविता में मन और बुद्धि के दुर्गों को लांधती हुई जीवनव्यापी सर्वनाम में समा रही है।
बीसवीं सदी मनुष्य की देह में ही सिमट गयी। इस सदी के पहले दशक में ही बापू ने चेताया था कि प्राणों की उन्नति के बिना ज्ञान और कर्म दोनों ही अधूरे रह जायेंगे। ज्ञान और कर्म तो उस भाव यज्ञ की समिधा की तरह हैं जो अपने आपको जलाकर प्राणों को ऊपर उठाती है। शायद आत्म साक्षात्कार की यही विधि है, जहां प्राण ही उन्नत होकर आत्मा बन जाते हैं। अपने प्राणों की उन्नति को भूलकर पूंजी और प्रविधि से घिरा मनुष्य असीम में उठना भूल गया है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल फिर अपने उसी निबन्ध - "कविता क्या है" - में याद दिलाते हैं :
"आदिरूपों और व्यापारों में वंशानुगत वासना की दीर्घ परम्परा के प्रभाव से भावों के उद्बोधन की गहरी शक्ति संचित है। अत: इनके द्वारा जैसा रस परिपाक संभव है वैसा कल-कारखाने, गोदाम, स्टेशन, हवाई जहाज जैसी वस्तुओं तथा मोटर की चरखी घुमाने या एंजिन में कोयला झोंकना आदि व्यापारों द्वारा नहीं।
बापू ने प्रविधि का विरोध इसलिए भी किया कि वह मनुष्य के दैहिक प्रयत्न का अनादर करती है और उस कर्मकुशलता को विचलित करती है जिसके बिना जीवन और कविता में रस परिपाक सम्भव ही नहीं। लगता है कि जैसे बापू का जीवन मनुष्य देह में कविता के पुनर्वास का पुरुषार्थ है। उनका सत्याग्रह उस परिवेश की रक्षा करता है जिसमें कविता सम्भव होती है और अपनायी जाती है।
हम बापू के जीवन की कविता के सामने अपनी-अपनी अधबनी कविताएं लिये मैथिलीशरण गुप्त की वाणी को याद कर सकते है- "राम तुम्हारा चरित स्वयं की काव्य है" - और कह सकते हैं कि बापू तुम सचमुच भारत की कविता हो।

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