ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
महाकुम्भ की घड़ी
01-Apr-2016 12:00 AM 1375     

भारतीय सनातन संस्कृति शा?ात मूल्यों और सिद्धांतों के आधार पर विकसित हुर्इं है। सनातन का अर्थ ही है - शा?ात, निरन्तर और चिरस्थायी और इस प्रकार सनातन धर्म का अर्थ - शा?ात, निरन्तर, चिरस्थायी और दृढ़ तत्त्व (द्रद्धत्दड़त्द्रथ्ड्ढ) हो जाता है। व्युत्पत्ति शास्त्र के अनुसार धर्म और अंग्रेजी शब्द फर्म (ढत्द्धथ्र्) अर्थात् दृढ़ एक ही मूल "धृ' (कायम रखना, सहारा देना) से जन्मे हैं, अतएव हमारा धर्म सम्पूर्ण चराचर जगत को कायम रखने वाले सत्य पर दृढ़ रहना है। यह न तो व्यक्ति के व्यक्ति विशेष के द्वारा प्रतिपादित कृत्रिम नियमों का अनुगामी है और न ही रिलिजन (आस्था) या मज़हब (सम्प्रदाय) है या फिर दीन (जीवन पथ, ध्र्ठ्ठन्र् दृढ थ्त्ढड्ढ) ही। उपनिषद् के वाक्य "सत्यं वद, धम्र्मम् चर' से ही धर्म का अर्थ सत्य कथन हो जाता है। अन्य सम्प्रदायों के विपरीत सनातन धर्म ब्राहृाण्ड को अनादि और अनंत मानता है अर्थात् इसका न तो आरंभिक समय था और न ही अंत होगा, जबकि इस्लाम और कतिपय अन्य सम्प्रदायों में क़यामत का दिन तय है। पाश्चात्य दर्शन और विज्ञान में समय को एकदिश मानते हैं, क्योंकि समय प्रवाह के विपरीत अतीत में नहीं जा सकते हैं। यह तभी तक सत्य है जब तक समय की माप कृत्रिम घड़ियों से और न?ार पदार्थों के सापेक्ष हो। किन्तु जब समय की माप ब्राहृाण्ड के शा?ात मानकों अर्थात् सूर्य चन्द्रादि नव ग्रहों के आकाश में परिभ्रमण के सापेक्ष हो और जीवात्मा तथा परमात्मा को अविनाशी मान लें, तो इस स्थिति में समय चक्रवत हो जाता है और हम पुनः अतीत के उन्हीं संयोग (ग्रहों की युति) का सृजन होता हुआ पाते हैं। तात्पर्य यह है कि भारतीय पर्व और त्यौहार जूलियन या ग्रेगोरियन कैलेन्डर के कृत्रिम या मानव निर्मित दिनांकों पर आधृत न होकर समय के शा?ात पैमानों अर्थात् नवग्रहों के भचक्र (न्न्दृड्डत्ठ्ठड़) या राशिचक्र के सापेक्ष परिभ्रमण पर आधृत होते हैं। भूकेंद्रीय मॉडल (क्रड्ढदृड़ड्ढदद्यद्धत्ड़ ग्दृड्डड्ढथ्) में चन्द्रमा की गति के आधार पर दिन, सूर्य की आभासी गति के आधार पर माह और गुरु या वृहस्पति की गति के आधार पर वर्ष की गणना होती है। चंद्रमा मध्यम मान से 29 दिन 12 घंटे 44 मिनट (लगभग 30 दिन) में भचक्र का एक परिक्रमण करता है। सूर्य आभासी तौर पर 365 दिन 5 घण्टे 48.8 मिनट (लगभग 12 न् 30 दिन उ 360 दिन) में भचक्र का एक चक्कर पूरा करता प्रतीत होता है। गुरु लगभग 12 वर्षों में भचक्र की परिक्रमा करता है। इस प्रकार चन्द्रमा एक राशि में लगभग 5/2 (ढाई) दिन रहते हुए कुल 12 राशियों को लगभग 30 दिन (उ 12 न् 5/2 दिन) पार करता है। चूँकि सूर्य प्रत्येक दिन लगभग 1 अंश आगे बढ़ता है, तो लगभग 30 दिन का एक सोलर माह होता है अर्थात् लगभग 1 माह तक सूर्य एक ही राशि (30 अंश) में रहता है और सूर्य के द्वारा एक राशि से दूसरी राशि में गमन को संक्रांति कहते हैं। इस प्रकार 1 वर्ष में मेष, वृष आदि कुल 12 संक्रांतियाँ होती हैं। गुरु भचक्र की 12 राशियों को लगभग 12 वर्षों में पार करता है, अतएव 1 राशि में गुरु लगभग 12/12 वर्ष उ 1 वर्ष तक रहता है। इस प्रकार सूर्य, चन्द्र और गुरु एक खगोलीय घड़ी का निर्माण करते हैं, जिसमें गुरु को वर्ष की सूई, सूर्य को माह की सूई और चन्द्रमा को दिन की सूई मान सकते हैं और 12 राशियों को घड़ी की 12 संख्यायें मान सकते हैं।
अब घड़ी शब्द की अवधारणा समझने का प्रयास करते हैं। कल्पना करिये क़ि जब यांत्रिक घड़ियाँ नहीं होती होगीं, तब समय का ज्ञान कैसे होता होगा? आप कहेंगे - धूप घड़ी से। मैं कहूँगा - घड़ी से या घटी से या घट से। यह सच है कि धूप घड़ी से सूर्योदय, मध्य अहन् और सूर्यास्त तक का समय ज्ञात हो सकता है, किन्तु रात्रि मान का पता कैसे हो? युक्ति खोज ली गयी थी। शिवालयों में शिवलिंग मात्र उत्तर दिशा का ज्ञान ही न करावें। शिवलिंग के ऊपर जलघट्ट हो और हर पलक झपकने में लगे समय (पल) में जल की एक बूँद शिवलिंग पर गिरे। फिर जल की मात्रा समय बतावे। यह आरम्भिक विज्ञान का विकास था। जल घट ही घटी अर्थात् घड़ी बनी। फिर लोगों ने दो सूर्योदय और दो चन्द्रोदय के बीच समय को घटते-बढ़ते हुए पाया और सूर्य और चन्द्र की गति तिथियों का नियामक बनी। विस्तार देना यहाँ सम्भव नहीं है। मात्र इतना जानिये कि चन्द्र की गति से दिन, सूर्य की गति से माह और गुरु की गति से वर्ष का निर्धारण होने लगा। यह खगोलीय घड़ी या घट्टिका या फिर कलश या कुंभ था। पृथ्वी के तीन चौथाई भाग में जल और शेष भाग में स्थल होने के कारण इसे कुम्भ (कु, पृथ्वी या मिट्टी और उम्भ, भरना) कहा गया। हमारे दार्शनिकों ने देखा कि समय के साथ सभी मृत होते हैं, केवल महाकाल (कद्यड्ढद्धदठ्ठथ् च्र्त्थ्र्ड्ढ) ही अमृत हैं; अतएव महाकाल की नगरी उज्जयनी (भारत का प्राचीन ग्रीनविच) से गुरु के सिंह राशि में स्थित होने के समय अमृत कुम्भ का आरम्भ हुआ। सूर्य, चन्द्र और गुरु इसके साक्षी बने। अब चूँकि गुरु बारह वर्षों में सूर्य की परिक्रमा पूर्ण करते हैं, इसलिए बारह वर्षों बाद जब गुरु जब पुनः सिंह राशि में दृष्टिगोचर होते हैं, तब उज्जैन में कुम्भ आता है। अब बारह वर्ष तो लम्बा समय है, अतएव भचक्र अर्थात् 12 राशियों को तीन भागों में बाँट दिया। फिर क्रम से सिंह (राशि सं. 5), कुम्भ (राशि सं. 11), वृष (राशि सं. 2) और सिंह (राशि सं. 5) में गुरु के आने पर उज्जैन, हरिद्वार, प्रयाग और नासिक में अमृत कुम्भ घटित होने लगा। कुछ विद्वानों का मत यह है कि अमृत कुम्भ का आरम्भ हरिद्वार से गुरु के कुम्भ राशि (राशि सं. 11) में स्थित होने के समय हुआ, किन्तु यहाँ राशि नाम कुम्भ रहने के कारण यह सम्भावना जतायी जाती है। अन्यथा वृत्ताकार राशिचक्र पर कौन सी राशि आरम्भ है और कौन अंत, यह कहना निरर्थक है। उज्जैन में सूर्य की उच्च राशि यानि मेष 1 में (अन्य मत से, सूर्य की नीच राशि 7 अ1उ8 में), प्रयाग में 8अ2उ10 राशि के सूर्य के समय, हरिद्वार में 10अ3उ13 यानि 1 राशि के सूर्य वाले माह में और नासिक में 1अ4उ5 यानि सिंह राशि वाले सूर्य के माह में कुम्भ पर्व मनाया जाने लगा। लोगों को समय बीतने का सही ज्ञान होने लगा और ज्ञान रूपी जलधाराओं में स्नान कर लोग निष्णात या स्नातक होने लगे। इस प्रकार कुम्भ खगोलीय समय का मापक बना और अदृश्य समय को जनसाधारण कुम्भ पर्व से याद रखने लगे। विभिन्न चन्द्र तिथियों को पुण्य काल माना गया। यह समय और संस्कृति का समावेश था।
कुम्भ मेले के प्रारम्भ के विषय में सही-सही कहना कठिन है, अपितु पुराणों में कुम्भ मेले का जिक्र मिलता है। उज्जैन में आयोजित होने वाले कुम्भ के विषय में लिखा गया है, "मेषराशिं गते सूर्ये सिंहराशौ बृहस्पतौ। उज्जयिनयां भवेत् कुंभः सदा मुक्तिप्रदायकः।।' अर्थात् सिंह राशि में बृहस्पति और मेष राशि में सूर्य के स्थित होने पर उज्जैन (अत्यधिक विजय की नगरी) में मुक्ति देने वाला कुम्भ घटित होता है। हरिद्वार में होने वाले कुम्भ के समय के विषय में स्कन्द पुराण में जिक्र है, "पद्मिनीनायके मेषे कुम्भराशिगते गुरौ। गंगाद्वारे भवेद्योगः कुम्भनामा तदोत्तमः।।' अर्थात् पद्मिनी के नायक सूर्य के मेष राशि में स्थित होने के समय और गुरु के कुम्भ राशि में होने के समय हरिद्वार में कुम्भ स्नान पर्व होता है। तीर्थराज प्रयाग में कुम्भ घटित होने का समय इस प्रकार है, "मकरे च दिवानाथे वृषगे च बृहस्पतौ। कुम्भयोगो भवेत्तत्र प्रयागे ह्रतिदुर्लभः।।' अर्थात् सूर्य के मकर और गुरु के वृषभ राशि में स्थित होने पर प्रयाग (यज्ञभूमि) तीर्थ (त्रिवेणी के तीर पर) कुम्भ योग होता है। इसी तरह नासिक में सिहस्थ गुरु और सूर्य होने पर कुम्भ सम्पन्न होता है।
चीनी यात्री ह्वेनसांग (602-664 ई.) ने 629-645 ई. के समय भारत की यात्रा की थी, उसके विवरण में सम्राट हर्षवर्धन के प्रयाग कुम्भ में शामिल होकर मुक्तहस्त से स्नानोपरांत दान देने का जिक्र मिलता है। उनके साथ वल्लभी के राजा और कामरूप के राजकुमार भी शामिल हुए थे। "डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लिखा, "मैं अपने शहर इलाहाबाद या हरिद्वार में महान स्नान पर्व कुम्भ मेले में जाता था और देखता था कि पूरे भारत से लाखों लोग ठीक उसी प्रकार आते थे जैसे उनके पुरखे हज़ारों वर्ष पहले गंगा में स्नान करने के लिए आये होंगे। मुझे स्मरण है कि चीनी यात्री ह्वेनसांग एवं अन्य ने तेरह सौ वर्ष पहले इस मेले का विवरण लिखा था और तब भी यह मेला प्राचीन होकर अज्ञात अतिप्राचीनता में गुम था। मैं चकित हो जाता था कि वह कौन सी प्रचण्ड आस्था थी जो लोगों को अज्ञात पीढ़ियों से इस विख्यात नदी के तट पर खींच लाती थी?' ध्यातव्य है कि सभी प्राचीन सभ्यताओं और संस्कृतियों का विकास नदी तट पर ही हुआ और सनातन धर्म में नदी के तीर को तीर्थ कहा गया। स्पष्ट है कि हरिद्वार और प्रयाग में कुंभ क्रमशः गंगा (सतत् गमन करने वाली) और यमुना (जो गंगा को यम करे या रोके) तीर्थ पर, नासिक में गोदावरी (गो, जल; दा, देनेवाली और आवृत) तीर्थ पर और उज्जैन में क्षिप्रा (वेगवती) तीर्थ पर लगता है। नदी का कल-कल स्वर नादब्राहृ के अविकल प्रवाह अर्थात् अनादि अनंत होने का प्रतीक है। नदियों के साथ भारतीय जनमानस का जुड़ाव इस कारण भी है कि इन्हीं पवित्र नदियों में पुरखों के अस्थि कुम्भ प्रवाहित होते हैं और इन नदियों में स्नान अपने पुरखों से जुड़ने का भावनात्मक लगाव देता है। प्रातः स्नान मन्त्र "गंगे चैव यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदा सिंधु कावेरी जलेच्स्मिन् सन्निधिम् कुरु।।' में हमारी राष्ट्रीय एकता की झलक मिलती है। कुम्भ पर्व में जाति, धर्म, सम्प्रदाय, भाषा, राज्य, संस्कृति, साहित्य, दर्शन, वेशभूषा आदि सभी संदर्भों में भारतीय विविधता में एकता का दर्शन होता है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता "भारत तीर्थ' की पंक्तियाँ कुम्भ पर्व के मर्म को अभिव्यक्त करती हैं :
हे मोर चित्त, पुण्यतीर्थ जागो रे धीरे
    एई भारतेर महामानवेर सागार्तीरे।
    हेथाय दाडाय दुबाहु बाड़ाय नमि नरदेवतारे,
    उदारछ्न्दे परमानंदे वंदन करि तारे।
    ध्यानगंभीर एई-जे भूधर नदी-जपमाला-धृत प्रांतर,
    हेथाय नित्य हेरो पवित्र धरित्रीरे
    एई भारतेर महामानवेर सागार्तीरे
    केह नाहि जाने कार आह्वाने कत मानुषेर धारा
    दुर्वार स्त्रोते एल कौथा हते, समुद्रे हलकारा।
    हेथा आर्य, हेथा अनार्य, हेथाय द्राविड़ चीन-
    शक-हून-दल पाठान मोगल एक देहे हल लीन।
    पश्चिमें आज खुलियाछे द्वार, सेथा हते सबे आने उपहार,
    दिबे आर निबे, मिलाबे मिलिबे, जाबे ना फिरे-
    एई भारतेर महामानवेर सागार्तीरे।
"भारत देश महामानवता का पारावार है। किसी को भी ज्ञात नहीं कि किसके आह्वान पर मनुष्य की कितनी धाराएं दुर्वार वेग से बहती हुई कहाँ-कहाँ से आर्इं और इस महासमुद्र में मिलकर खो गर्इं। यहाँ आर्य हैं, यहाँ अनार्य हैं। यहाँ द्रविड़ तथा चीनी वंश के लोग हैं। शक, हूण, पठान, मुग़ल और न जाने कितनी जातियों के लोग इस देश में आए तथा सब के सब एक ही शरीर में समाकर एक हो गए। समय-समय पर जो लोग रक्त की धारा बहाते हुए एवं उन्माद और उत्साह में विजय के गीत गाते हुए रेगिस्तान को पार कर एवं पर्वतों को लांघकर इस देश में आये थे, उनमें से किसी का भी अब अस्तित्व नहीं है। वे सब के सब मेरे भीतर विराजमान हैं। मुझसे कोई भी दूर नहीं है। मेरे रक्त में सबका स्वर ध्वनित हो रहा है। आज जो भी नवीन आगमन हो रहे हैं, सभी मुझमें विलीन हो जाएंगे, एकात्म हो जाएंगे। इस भारतीय महामानव- सागर में सभी एकाकार हो जाएंगे।'
कुम्भ पर्व के कथानक में भी मनुष्य के अन्तःकरण में छिपे प्रकाश और अंध प्रवृत्तियों के परस्पर संघर्ष से हुए मानस मंथन का सांकेतिक विवरण पाते हैं। जब विष्णु (संसार में व्याप्त तत्त्व) के निर्देश पर द्युतिमान और अंध प्रवृत्तियों ने मिलकर मानस सागर का मंथन किया, तो जीवन के निःश्रेयस के चौदह सूत्र रूपी रत्न निकले : 1. ऐरावत (बादल), 2. कल्पवृक्ष (वनस्पति संसाधन), 3. कौस्तुभमणि (विष्णु को प्रिय यानि जिजीविषा), 4. उच्चै श्रवस (सूर्य का अ?ा यानि सौर ऊर्जा), 5. चन्द्रमा (सकारात्मक मन), 6. धनुष (संकल्प), 7. कामधेनु (आशा), 8. रंभा (सौंदर्य), 9. लक्ष्मी (लक्ष्य), 10. वारुणी (स्त्री शक्ति), 11. विष (जीवन विरोधी तत्त्व), 12. शंख (शांति), 13. धन्वन्तरि (स्वास्थ्य) और 14. अमृत (जीवनदायिनी शक्ति)। स्वास्थ्य के देवता धन्वन्तरि अमृत कुम्भ लेकर निकलते ही हैं कि बाह्र वातावरण के देवता इंद्र के पुत्र जयन्त जीवन को अमृतमय बनाने के लिए अंध प्रवृत्तियों से बचकर भागते हैं और अंध प्रवृत्तियाँ जयंत (सत्य की जय अंत में का प्रतीक) का पीछा करते हुए युद्ध करती हैं। जीवन के पोषक तत्त्वों से लबालब अमृत कुम्भ नदियों के तीर्थ पर छलककर गिरता है और नदी घाटियों में मानव सभ्यता पुष्पित पल्लवित होती है। समय के खगोलीय मानक गुरु, सूर्य और चन्द्र इस मानव सभ्यता और संस्कृति के साक्षी होते हैं।
कुम्भ पर्व हमारी सांस्कृतिक विरासत है। यह धरती पर मानवों का सबसे बड़ा प्रदर्शन है। यह जीवन सरिता का कल कल निनाद करता कालप्रवाह है। अमृत कुम्भ जिजीविषा और मुमूर्षा का प्रतीक है।
अंत में, मानवतावादी और जीवविज्ञानी जूलियन हक्सले के कुम्भ मेला अनुभवों को उद्धृत करना समीचीन होगा,
"भारत के विशाल मानव प्रवाह को जानने की इच्छा ने 1954 ई. में मुझे बल पूर्वक यहाँ धकेल दिया, जब मैंने उस वर्ष में आयोजित दुर्भाग्यपूर्ण कुम्भ मेला की यात्रा की। यह आस्था का पर्व इलाहाबाद में दो बड़ी नदियों गंगा और यमुना के संगम पर होता है। यहाँ एकत्र तीर्थयात्री इन नदियों के पवित्र जल में स्नान कर पुण्य और मुक्ति पाते हैं। प्रत्येक बारहवें वर्ष पर आयोजित पर्व विशेष रूप से पवित्र होता है, 1954 ई. का मेला इस मायने में भी महत्वपूर्ण था कि यह भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् होने वाला पहला कुम्भ मेला था। इस पर्व का एक ख़ास दिन अति शुभ होता है और उस दिन स्नान करना विशेष पुण्यदायी होता है। तीर्थयात्री ट्रेन, गाड़ियों, बैलगाड़ियों और टट्टूओं पर सवार होकर भारत के सभी कोनों से उमड़े थे। जिस दिन हम सब पहुँचे थे, उस दिन नदियों के तटों पर पचीस लाख लोग तम्बुओं में बसाये गए थे और तीन दिन बाद महापर्व के दिन यह संख्या पैंतालीस लाख हो गयी थी। मैं इस अति विशालकाय मानव चीटियों के अम्बार का दृश्य कभी नहीं भूलूँगा जो यमुना के अस्थायी पीपा पुल पर संगम जाने के लिए उमड़ आयी थी। इतनी भयंकर भीड़ भय और आपदा अंदेशा छोड़ जाती है। यह अलौकिक और अलौकिक जान पड़ता है। यह अंदेशा तीन दिन बाद सच हो गया जब भीड़ बेकाबू हो गयी और 400 असहाय लोग असमय काल के गाल में समा गए।'
कुम्भ पर्व भारत की बहुलतावादी संस्कृति का महोत्सव है। अतीत में कई बार हमने इस उत्सव को त्रासदी में बदलते देखा है। अतएव राज्य शासन, स्थानीय प्रशासन, मेला प्राधिकार, नागरिक समाज और तीर्थयात्रियों में भीड़ नियंत्रण एवं आपदा प्रबंधन से सम्बंधित जागरूकता अवश्य होनी चाहिए। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकार (ग़्ठ्ठद्यत्दृदठ्ठथ् क़्त्द्मठ्ठद्मद्यड्ढद्ध ग्ठ्ठदठ्ठढ़ड्ढथ्र्ड्ढदद्य ॠद्वद्यण्दृद्धत्द्यन्र्) ने इस विषय पर "मैनेजिंग क्राउड एट इवेंट्स एंड वेनुस ऑफ़ मास गैदरिंग' शीर्षक से एक पुस्तिका प्रकाशित की है जो इंटरनेट पर भी उपलब्ध है। यह पुस्तिका हरेक मेला प्रतिभागी के लिए पठनीय है। कुम्भ पर्व हमारी गंगा यमुना की संगम संस्कृति को सनातन रूप से और क्षिप्र वेग से प्रवाहित करती रहे और सिंहस्थ कुम्भ भारतीय अध्यात्म से सकल वि?ा को अमृतपान कराता रहे।

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