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महाकुंभ और वैश्विक गांगेय संस्कृति
01-Apr-2016 12:00 AM 1321     

भारत से बाहर विश्व के अन्य देशों के भारतवंशियों और भारतीयों के जीवन में भोलेशंकर बाबा से जुड़े पर्वाें का विशेष माहात्म्य है। हर माह की शिवरात्रि से लेकर महाशिवरात्रि तक का इसमें प्राधान्य रहता है जिसके अंतर्गत भारतवर्ष में शिव भक्ति की उपासना के विधानों में कॉवरियाँ, (सावन माह) मकर संक्रांति का नहान और महाशिवरात्रि के अन्य आयोजनों का प्रावधान शामिल रहता है। विश्व के अन्य देशों में नदी तट और समुद्र तटों को वहां के श्रद्धालुओं ने गंगासागर जैसे समानार्थक पर्यायवाची नाम दे रखे हैं। जिससे गंगा माँ के प्रति आस्था और शिव भगवान के प्रति विश्वास भाव उजागर होता है। जिसका महत्व भारत के विभिन्न प्रदेशों और नगरों में आयोजित होने वाले कुंभ तथा महाकुंभ से किसी मायने में कम नहीं है। अगर कम है तो उनके पास वह हजारों वर्ष प्राचीन सांस्कृतिक, पौराणिक और ऐतिहासिक विरासत नहीं है जो भारत भूमि की धरोहर है इसीलिए भारत देश पावन है महान है।
विश्व की अन्य नदियों के तटवर्ती नगरों में भारतवंशियों के प्रभुत्व से गांगेय संस्कृति का वर्चस्व दिखायी देता है। भारत से बाहर कुंभ और नहान की तिथियों में तटवर्ती नगरों में हिन्दुस्तानी जन उमड़ पड़ते हैं। नदी का नाम कोई भी हो लेकिन वह श्रद्धालुओं के लिये गंगा-धारा होती है जिसमें उनकी आस्था का विलय हो जाता है। कानपुर के गांव में जन्म होने के कारण, नहान की तिथियों में मैंने बचपन से यह लख लिया था जब बैलगाड़ियों में भर-लदकर श्रद्धालु बिठूर की गंगा तक पहुँचते थे। कुछ बस में भर-ठुसकर इलाहाबाद के संगम और काशी के दशाश्वमेघ घाट तक पहुँचते थे। पूर्वजों के पिंडदान के लिये कलकत्ता के गंगा सागर तक। वस्तुत: पिंडदान-नहान आस्था के उत्सव-सूत्र है।
उत्तर-भारत के ऐसे ही आस्थावान प्रदेशों से हिन्दुस्तानी गांगेय संस्कृति सन् १८३४ ई. से १९१६ के बीच-ब्रिटिश, फ्रेंच और डच कोलोनाइजरों द्वारा पूर्व से पश्चिम तक पृथ्वी के कोनों-अतरों देश-द्वीपों में ऊर्जा-बीज (मजदूर) के रूप में ले जायी गयी। जहां पहुंचकर उन्होंने अपनी ईश्वरीय आस्था को यदि एक ओर सूर्य से जोड़ा तो दूसरी ओर अपने श्रम और पसीने की बूंदों से सृष्टि में समर्थ पृथ्वी से संबद्ध किया। अपनी श्रम-साधना के उपासक बने। सूर्यदेव को अपने पसीने का अघ्र्य चढ़ाया। फसले लहलहायी। घर के कुठले। भरे चित्त ने समृद्धि का तोष जिया। चेतना ने शनै:शनै: अपनी आत्मा में बसा भारतीय संस्कृति का शंखनाद करना शुरू लिया क्योंकि भारतवंशियों और भारतीयों के जीवन और जिजीविषा की सक्रियता की मूल शक्ति भारतीय संस्कृति है।
अनेक भारतवंशी बहुल देशों यथा नेपाल, श्रीलंका, मॉरीशस जैसे देशों में भारतीय संस्कृति की परछाई का होना सहज और स्वाभाविक है। नेपाल और श्रीलंका में शिवाराधना का पौराणिक सांस्कृतिक इतिहास भी है। लेकिन मॉरीशस देश तो हिन्द-महासागर में ही शिवलिंग सरीखा है। हिन्द-महासागर की सुनील लहरें अहर्निश शिवलिंग सरीखे मॉरीशस के महास्नान के कर्मकांड में सक्रिय रहती है।
महाशिवरात्रि मॉरीशस के हिन्दुस्तानियों का महापर्व है। द्वीप के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में झील के एक हिस्से में शिव मंदिर की स्थापना है। राजधानी से वहां तक पहुंचने के मार्ग पर तांबई वर्ण की विशाल शिव प्रतिमा है। जो त्रिशूल लिए हुए भक्तों को आशीषती रहती है। मॉरीशस की महाशिवरात्रि के लिए कई माह पूर्व ही तैयारी शुरू हो जाती है। सरकार के कई विभाग और संस्थाओं की समितियां आयोजन को भव्य, सार्थक और सुविधाजनक बनाने में प्राणपण से जुट जाती है। कांवरों की तैयारी शुरू हो जाती है। योग, ध्यान, भजन, कीर्तन के रास्ते भर में पंडाल लग जाते हैं। रोशनी की चकाचौंध में भजनों का संगीत अपनी तरह का अद्भुत आध्यात्मिक वातावरण रचता है। भक्तों तक प्रसाद, भोग, महाभोग वितरित होता रहता है। वैष्णों देवी के दर्शनार्थ जैसी भीड़ उमड़ती रहती है। भक्तों का ताँता लगा रहता है। प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन जैसे शहरों में महाकुंभ का जो रुतबा रहता है उसका रुआब महाशिवरात्रि के दिन मॉरीशस में दिखायी देता है।
इसी तरह पृथ्वी के पश्चिमी गोलाद्र्ध लातिन अमेरिका के उत्तरी शीर्ष पर बसे (डच गयाना) सूरीनाम, ब्रिटिश गयाना, फ्रेंच गयाना देशों और कैरीबियाई देश-द्वीप ट्रिनीडाड, कुरुसावा, सेंट लूशिया के (हिन्दू) भारतवंशी समुदायों के बीच मंदिरों का साम्राज्य सा दिखता है। जिसमें उनके धर्म की झंडियां फहराती हुई आशीषती रहती हैं। विदेश की धरती भी भारत-भूमि सरीखी आत्मीय लगती है। यहां के मंदिरों में ही धार्मिक पर्वाें का भव्य आयोजन होता है। मंत्रोच्चार, भजन और कीर्तन की गूँज उठती है। घंटे और शंखों से धर्म के जयघोष का निनाद उठता है कि वादियां, पवित्रता के झंकार से आहलादित हो उठती है। इन देशों में भी आम्रमंजरियों, केलों, तुलसी और नीम के पत्तों का धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग होता है। सूरीनाम के हर इलाके में सनातनी और आर्य समाजियों के मंदिर हैं। पारामरिवो शहर में दोनों ही शाखाओं के प्रधान मंदिर आमने-सामने ही हैं। अर्थात विधिवत पूजन-भजन, कीर्तन होता है। उस क्षेत्र के सभी नागरिक शामिल होते हैं। पूरा गांव मंदिर में परिणत हुआ दिखता है। शेष दिनों में इन मंदिरों में नृत्य, संगीत, योग और हिन्दी भाषा की कक्षाएं होती हैं। जिसमें न तो विद्यार्थी शुल्क देते हैं और न ही शिक्षक किसी तरह का वेतन लेते हैं। भारतीय संस्कृति की आस्था के तहत उपासना में लगे रहते हैं। जो किसी कुंभ समागम से कम नहीं होता है।
सूरीनाम की राजधानी पारामरिवो के वैखनारजी रास्ते के अंत में समुद्र तट पर शिवालय रचित है और निकेरी के अंतलांतिक महासागर के समुद्र तट पर शिवलिंग की स्थापना हुई है जहां मंदिर निर्मित है। अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियों के कारण यह स्थान भी देवालय सरीखा महिमा मंडित दिखायी देता है। सूरीनाम में भी महाशिवरात्रि के दिन पूरे देश के समुद्रतटवर्ती इलाकों और नदियों के तटी में भारत वर्ष के नहान जैसा शमा बंधा रहता है। सभी नदियां उस दिन गंगा का रूप धारण कर लेती है। देर रात तक पूजा-पाठ नहान की सक्रियता रहती है। भारतीय पुरखों के द्वारा बनाये गये १८८० के गोवद्र्धन घाट पर अपनी प्राचीनता के कारण विशेष आकर्षण रहता है। किसान-मजदूरों की खून की कमायी से बना और बचा हुआ वही प्राचीनतम मंदिर है। वैखनार जी के शिवालय पर शिवरात्रि के दिन कौम्बे मारकेट और अन्य व्यवसायिक तथा धार्मिक संगठनों द्वारा प्रसाद और भोज का आयोजन किया जाता है। भारतीय दूतावास के अधिकारी और राजदूत जो वर्ष भर अन्य उत्सवों में मंदिरों और मसजिदों में उपस्थित रहते हैं। महाशिवरात्रि के दिन इस शिवालय में उपस्थित होते हैं। उनका विशेष स्वागत होता है। रेडियो द्वारा कई सप्ताह पहले से इस आयोजन के प्रचार-प्रसार की गूँज होने लगती है। दूरदर्शन द्वारा इन कार्यक्रमों का प्रसारण होता है। गयाना, ट्रिनीडाड में भी महाविशरात्रि का महापर्व-महाकुंभ सरीखा वैभवशाली दिखायी देता है। भारत से चौदह हजार किलोमीटर दूर इन देशों में महाशिवरात्रि का पर्व ही महाकुंभ है।

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