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महाकाल की छाया में अमृत का प्लावन
01-Apr-2016 12:00 AM 1292     

कुम्भ पर्व को सुनते ही पवित्र जल श्रोत पर एक उमड़ता महा जनसमुद्र स्मृति में कौंध जाता है। यह एक नहान (स्नान) की ओर उन्मुख तीर्थ यात्रा का आखिरी पड़ाव होता है, जिसमें भिन्न-भिन्न जाति, वर्ग, आयु और समुदाय के भांति-भांति के देसी परदेसी लोग शामिल होते हैं। सालों पहले प्रयाग के कुम्भ में शामिल होने का अवसर मिला था, फिर कुछ संयोग बना कि हरिद्वार के कुम्भ में भी पहुँच सका था। मिथक, इतिहास और किम्बदन्ती के दायरे में रचे मानस के साथ कुम्भ में पहुँचना बहुतों की वर्षों से मन में संजोई आस का प्रतिफलन होता है। देवासुर संग्राम और उसमें से प्राप्त अमृत का कुम्भ, उसकी यात्रा की कथा रोमांचित कर देती है। जहां-जहां वह अमृत इस धरती पर रखा गया वहां-वहां ग्रह नक्षत्रों की गति और स्थिति के हिसाब से कुम्भ पर्व आयोजित होने की परम्परा सदियों से चलती चली आ रही है।
अमृत को अक्सर अमरता से जोड़ कर (मृत्युहीन जीवन के रूप में) देखा जाता है पर यह न मरनेे यानी जीवन का भाव या जीवन्तता को भी इंगित करता है। जीना तो देश और काल में अवस्थित संवेदना से ही संभव हो पाता है। उसके लिए अपने देश काल से जुड़ना जरूरी है। कुम्भ का पर्व उसमें शरीक होने वाले तीर्थयात्रियों के लिए जीवन का उत्सव हो जाता है। परम्परा के अनुसार चार स्थानों - हरिद्वार, प्रयाग (इलाहाबाद), उज्जयिनी और नासिक में ज्योतिष की गणना के अनुसार समय-समय पर कुम्भ महापर्व का आयोजन किया जाता है। देश के कोने-कोने से जवान, प्रौढ़ और बूढ़े सब परिजनों समेत अपनी-अपनी चाह के साथ यहाँ पहुँचने की योजना बनाते हैं। अक्सर लोग एक गोल या दल बनाकर आते हैं। समूह में चलने पर यात्रा की मुश्किल राह आसानी से कट जाती है और एक-दूसरे के लिए सहारा भी बना रहता है। अनजानी जगह में ठहरने और खाने-पीने की व्यवस्था भी समूह में रह कर आसानी से संभव हो पाती है। कुम्भ की यात्रा श्रद्धालु लोगों के जीने की दास्ताँ बन जाती है और सामाजिक स्मृति को रचती है जिसमें यात्रा के कष्ट, तनाव और खट्टे-मीठे अनुभव सभी मिल कर एक अद्भुत जीवन रस का सृजन करते हैं। अमृत के प्लावन में सभी अवगाहन करते हैं।
सिंहस्थ का आयोजन उज्जयिनी में हो रहा है। तीव्रवाहिनी क्षिप्रा नदी के दक्षिणी तट पर बसी उज्जयिनी (जिसे प्राचीन ग्रंथों में अवन्तिका भी कहा गया है) भारत की सांस्कृतिक यात्रा का एक महनीय पक्ष है। विंध्याचल एवं सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच अवस्थित यह मालवा का क्षेत्र है। मोक्ष दायिनी और महाकाल की इस नगरी का इतिहास में कुमुद्वती और विशाला के रूप में भी सन्दर्भ मिलता है। उज्जयिनी के शिव, महाकाल की गणना भारत के सुप्रसिद्ध द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुखता से होती है। उज्जयिनी नगरी के साथ कृष्ण, सुदामा और संदीपनी आश्रम की स्मृति जुड़ी है। विक्रमादित्य और उनके नवरत्न जिसमें वराहमिहिर, कालिदास, धन्वन्तरि, क्षपणक, वररुचि, अमर सिंह, घटकर्पर आदि परिगणित हैं की प्रतिभा जगद्विश्रुत हैं।
उज्जयिनी का ज्ञात इतिहास बताता है कि यह नगरी अनेक राजाओं महाराजाओं के उत्थान पतन की साक्षी रही है। शोडष जनपदों में अवन्ती भी परिगणित है। चंड प्रद्योत, वासवदत्ता और वत्स नरेश उदयन की प्रेम कथा, पराक्रमी मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त, बिन्दुसार और अशोक से यह नगरी जुड़ी रही है। मौर्य शासन के पतन के बाद शकों और सातवाहनों की लड़ाई हुई। विक्रमादित्य के नेतृत्व में यहाँ की जनता ने शकों के आक्रमण को विफल किया। गुप्तों के काल में इसका खूब विकास हुआ। सातवीं शती में कन्नौज के हर्षवर्धन के साम्राज्य में विलीन हुई। आगे चलकर परमार, चौहान और तोमर वंशों का शासन हुआ। मुंजदेव, उदयादित्य का नाम प्रसिद्ध है। अकबर, जहांगीर, शाहजहाँ, औरंगजेब आदि मुग़ल बादशाह यहाँ आये थे। आगे चल कर सिंधिया का शासन हुआ।
भूगोल के हिसाब से उज्जैन कर्क अयन तथा भूमध्य रेखा के बीचों-बीच स्थित है। मेष राशि में सूर्य और सिंह राशि में गुरु के आने पर यहाँ कुम्भ पर्व का निश्चय होता है : "मेषराशिगते सूर्ये सिंहराश्यां वृहस्पतौ, उज्जयिन्यां भवेत् कुम्भः सर्वसौख्य विवर्धनः'। चैत्र पूर्णिमा से शुरू होकर वैशाख पूर्णिमा तक यह पर्व चलता है।
धार्मिक दृष्टि से आज की उज्जयिनी में अनेक आकर्षण हैं। इनमें प्रमुख है पवित्र देवालयों की श्रृंखला। इसके अंतर्गत महाकाल, चिंतामणि गणेश, नवग्रह मंदिर, हरसिद्ध मंदिर, गोपाल मंदिर, मंगलनाथ और भर्तृहरि गुफा उल्लेखनीय हैं। इन सबको अपने में समाये हुए यह नगरी अभी भी धार्मिक आस्था और वि?ाास का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनी हुई है। अनेक साधु-संतों के आश्रम यहाँ हैं जहां लोग अपनी आध्यात्मिक रुचि के अनुसार समागम और सत्संग करते हैं। विक्रम वि?ाविद्यालय, कालिदास अकादमी और संस्कृत वि?ाविद्यालय आदि शिक्षा के केन्द्रों में महत्वपूर्ण कार्य हो रहा है। हिन्दी के प्रमुख कवि डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन और पंडित सूर्यनारायण व्यास ने यहाँ की साहित्यिक और सांस्कृतिक परम्परा को बहुविध समृद्ध किया था।
उज्जयिनी की परम्परा की बात कविकुलगुरु कालिदास का उल्लेख किये बिना अधूरी ही रहेगी। महाकवि ने अपनी अद्भुत कल्पनाशीलता से यक्ष की कथा और मेघ को दूत बना कर रचित अमर कृति गीतिकाव्य "मेघदूत' में उज्जयिनी का अनेक प्रकार से स्मरण किया है।
आज की उज्जयिनी आधुनिक हो चली है पर संस्कृति के स्मारक अनेक अवसर अभी भी जीवंत हैं। सिंहस्थ उसी कड़ी का हिस्सा है। कुम्भ पर्व की ओर अग्रसर सभी लोग सिर्फ इस तरफ ही ध्यान देते हैं कि कब स्नान होगा, पावन जल में कब डुबकी लगायेंगे। इसी का इंतज़ार सब को रहता है। एक व्यापक अनुभव में शामिल होने की लालसा उन्हें इस महान मानवीय घटना से जोड़ती है और उसके लौकिक अलौकिक व्यवस्था में शामिल करती है। इन लोगों के चेहरे देखें तो यह लगेगा कि इनके अंतर्मन में कहीं किसी विशाल, निराकार व्यापक के प्रति समर्पण का भाव जरूर बैठा है जो परोक्ष होकर भी साक्षात अनुभव का हिस्सा बनता है। ऐसे में मनुष्य के साझे जीवन की प्रखर अनुभूति होती है। अब कुम्भ का आयोजन आधुनिक व्यवस्था में एक ऐसी सांस्कृतिक घटना के रूप में किया जाता है जहां सभी पुरुषार्थ जुड़ते हैं और जिसे जो चाहिए वह उस ओर उन्मुख होता है। धर्म, कला, संस्कृति, संगीत-साहित्य के चिर नूतन उत्सव में सबका स्वागत है।

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