ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
माछेर झोल
01-Aug-2019 03:52 AM 881     

माछेर झोल

जब ओडिशा में
चलें ठंडी हवाएं
तट को छूने वाली
तब तुम आना मुझे याद
बंगाल में

मैं चख लूँगा
तुम्हारे हाथ की बनी
माछेर झोल
जब उदास होना
साहिर को सुनना
मैं तुम्हें अमृता-सा
महसूस कर लूँगा

मन हो तभी खिलना
रातरानी-सी
महकना
मेरी कविताओं में
शब्द बन जीवित रहना
संस्कृति की बेड़ियों से बेपरवाह
उम्र की सारी हदों को तोड़ हीर-सी।

 

रंग दाग़ और इश्क़

ऑक्सीजन को देखा है? नहीं न
इश्क़ को?
रंग मटमैला होता है मुहब्बत का
ठीक वैसा जिसे ज़माना
चुनरी में लागा दाग़ कहता है
ये जो गुलाबी रंगत है
बेख़ुद कर देने वाली
देह की गंध, मादक
यह इश्क़ का रंग नहीं
इश्क़ का रंग न जामुनी होता है न ताम्बई
जैसे लहरें किरणों का दुपट्टा ओढ़ तट को छूती हैं
फिर लौट आती हैं अपनी हद में
या जैसे गुम्बद पर अनायास आ बैठता है
चिड़ियों का जोड़ा
शाम के धुंधलके में
हर फ़लसफ़े को झुठलाता
लोबान की ख़ुशबू महक जाती है रूहानी
ठीक वैसा ही इश्क़ एक मुठ्ठी बाँध लाना
माँ की दी हुई रुमाल में
अपने बस्ते में थोड़ी-सी जगह
छोड़ रखी है मैंने
उस गाँठ बंधी रुमाल के लिए
जिसे क्षितिज के उस पार
साथ ले जाने का वादा लिया है मैंने
उस नियंता से भी।

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