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माया महा ठगनी
01-Jun-2016 12:00 AM 5209     

    बीर सन्त भक्त कवि हैं। उनकी दृष्टि से समाज की
    कौन-सी ऐसी समस्या थी जो अछूती रह गई हो।
    उनकी रचनाएँ अब भी राह दिखाती हैं। प्र¶न है कि क्या आज के भौतिकवादी जीवन में जहाँ वस्तुवाद का चहुँओर बोलबाला है कबीर के पद या दोहे समाज को किस हद तक प्रेरित करते हैं।
आज वि·ा में परिवर्तन के नाम पर भौतिकवाद प्रधान हो उठा है। और वह इसकी अंधी दौड़ में दौड़ रहा है। इसका फल क्या होगा, किसी को नहीं मालूम। आज वि·ा में भौतिकवाद का बोलबाला है। इसकी लहर अमेरिका से उठती हुई वि·ा के कोने-कोने में लहरा रही है। कम या ज्यादा। इस भौतिकवाद से कहीं कुछ लाभ भी हैं- जैसे विकास, नये-नये आविष्कार आदि तो हानि भी कम नहीं। इसके कारण आज वि·ा, दे¶ा, समाज एवं परिवारों में एक ओर अहंकार पनपा हैं तो दूसरी ओर दिखावा। इसके  कारण समाज एवं परिवार में टूटन, बिखराव, एकाकी जीवन, मानसिक तनाव, दि¶ााहीनता, स्वेच्छाचारिता, स्वकेन्द्रिता, पति-पत्नि में तनाव अत: बच्चों का अकेले बढ़ना, आगे चलकर बच्चों से उपेक्षा मिलना, नैतिक विहीनता, जीवन के अंत तक संघर्ष, भ्रम, पथ भ्रष्टता आदि  चार्वाकीय मत की विसंगतियाँ दिखाई देती हैं।
आज अमेरिका में यौनाचार का नंगा नृत्य हो रहा है। स्कूलों में कक्षा छह से ही यौन ¶िाक्षण दिया जा रहा है। मर्यादाओं का खुला उल्लंघन हो रहा है। तात्पर्य यह है कि आज यहाँ मर्यादा नाम का ¶ाब्द ही गायब है। यहाँ विवाह से पूर्व लड़की लड़के का एक साथ रहना मानो नियमाचार बन गया है। विवाह से पूर्व कई बच्चों की माँ बनना यहाँ कोई नई बात नहीं मानी जाती है। अथवा समलैंगिक विवाह भी मान्य है। स्वच्छन्दता जन जीवन का प्राण बन चुकी है।
कभी न समाप्त होने वाली इच्छाओं को कबीर ने माया माना है, क्योंकि माया (इच्छा) ही तो मन को भटकाती है। एक  इच्छा पूरी नहीं हुई कि दूसरी की लालसा प्रारम्भ हो जाती है। आज मानव इच्छाओं के इस घनीभूत जंगल में बस भटकता ही रहता है। संतुष्टि का तो नाम ही नहीं। कबीरदास जी कहते हैं--
माया मरी न मन मरा, मर मर गये ¶ारीर,
आ¶ाा  तृष्णा ना मरी, कह गये दास कबीर।
आज के इस भौतिकवादी जीवन में, मनुष्य को अधिक से अधिक धन कमाने या अधिक ऐ¶ाो आराम की लालसा लगी हुई है, इसी होड़ा-होड़ी में वह किसी को कुछ नहीं समझता, साथ ही अपने पास कुछ कमी न रह जाय अत: वह किसी को कुछ बाँटना भी नहीं चाहता।
भौतिकता के प्रभाव में बहुत से धर्माचारी, धर्माचरण के नाम पर अपनी अपनी दुकान खोलकर बैठे हैं और असीम धन कमाने की लालसा पूर्ण कर रहे हैं। धर्माचारियों पर कबीर ने आक्षेप करते हुए कहा है---
काजी कौन कतेब पढ़ाई,
पढ़त-पढ़त केते दिन बीते, गति एकै नहिं जानी,
छांडि कतेब राम कहि काजी, खूण करत हौं भारी,
पकरी टेक कबीर भगत की काजी रहे झख मारी,
धन और भौतिकता के स्वामित्व का अर्थ है आनन्द रहित अ¶ाान्त जीवन। क्योंकि धन अथवा दिखावटी जीवन की दौड़ मृगतृष्णा ही तो है। यही माया भी तो है। कबीर ने इस माया को रूपायित करते हुए कहा है--
माया महा ठगनी हम जानी,
तिरगुन फांस लिये कर डौलै, बोलै मधुर बानी।
आज मानव आधुनिकता के नाम पर कंचन-कामिनी के मोह जाल में फंसा हुआ है। कबीरदास जी ने इस बात पर वि¶ोष ध्यान देते हुए कहा है---
एक कंचन अरु कामिनी, दोऊ अगिनी की झाल
पैसे ही तन प्रजलैं, परस्या है पैमाल।
कंचन और कामिनी दोनों को छूते ही ¶ारीर जल जाता है, अर्थात उसका विना¶ा होने लगता है।
नारी पराई आपनी भोगै नरकै जाय,
आग आग सब एक-सी हाथ दिये जरि जात
किन्तु क्या आज इस कथन पर काàई विचार करता है? व्यक्ति स्वतंत्रता का चहुँओर बोल-बाला है। यह विचार धारा प¶िचम की देन है। बच्चे हों या बड़े सभी स्वतन्त्रता का डंका पीट रहे हैं और समाज परिवार के अलावा माता-पिता तक को अनदेखा कर रहे हैं।
अमेरिका में जरा-सी तबियत खराब होने पर माता-पिता को नर्सिंग होम में भेज मुक्ति पाने का चलन है।  भारत में भी अब यह संस्कृति प्रारम्भ हो चुकी है। कितने ही माता-पिता को वृद्धाश्रम की ओर उन्मुख कर स्वतंत्रता का अनुभव करते हैं। जीवित रहते उनको भोजन पानी को तरसाते हैं और उनके मरने पर समाज दिखावे के लिये पिंड दान करते हैं।
 कबीर के अनुसार --
जीवित पित्र कू अन्न न ख्वावै, मूवा पाछै प्यंड भरावै।
आज मनुष्य जब वृद्धावस्था को प्राप्त होता है और संतान भी उसको छोड़ कर चली जाती है तो उसमें एकाकीपन आ जाता है और वह क्षीण होने लगता है तो कबीर का यह पद सार्थक हो जाता है-- "काहे री कमलनी तू कुम्हलानी तेरे नाल सरोवर पानी' यद्यपि यह पद आध्यात्मिकता का आधार है, किन्तु आध्यात्मिकता सामान्य धरातल से ही तो उठकर ऊपर आती है। अत: अकेलेपन को इंगित करती है।
चार्वाक सिद्धान्त भी भौतिकता का ही एक अंग है, जिसमें कहा गया है -- "आज करै सो कल करले, कल करै सो परसों, अभी अभी क्यों करत है जीना है जब बरसों' और भी -- "यावत जिवेत सुखं जिवेत, ऋणं कृत्वा धृतं पिवेत' अर्थात जब तक जीयो सुख से जीयो, भले ही ऋण करो पर घी पीयो।
आज पूजा पाठ के स्थान पर सिनेमा, पार्टी काकटेल पार्टी आदि का बोलबाला हो गया है। अत: बच्चे भी वही सीखते हैं। अत: धर्म और संस्कृति से दूर हटते जा रहे हैं। इन लोगों की दृष्टि में धर्म कुछ मूल्य नहीं रखता। ये वस्तुएं तो आनन्द प्रदान करती हैं। आज की भाषा में "एन्जोय' (आनन्द) कराती हैं। पर क्या यह आनन्द असीम है? कबीर कहते हैं --
फिरहु का फूले फूले फूले
जारै देह भसम होई जाई, गाड़े माटी खाई,
जौ माखी सहते नहीं बिहुरे सोच सोच धन कीन्हा
 मुये पिछे लेहु लेहुकै सब भूत रहनी कस दीन्हा।
हे मन तू जो इस विषय वासनाओं में मस्त हुआ खु¶ाी से फूला-फूला घूम रहा है। यह केवल दो दिन का मेला है जिनके साथ तू मस्त होकर विचरता है। तेरे मरने पर वे लोग ही तेरा साथ छोड़ देंगे।
अच्छे संस्कार और भावात्मक ऊंचाइयां अधिक ¶िाक्षा से नहीं, परिवार और माता-पिता से प्राप्त होते हैं। आधुनिक ¶िाक्षा के साथ संस्कार भी हों तो यह सोने में सुहागा की अवस्था हो जाती है।

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