ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
माँ का सिंगार
01-Dec-2016 12:00 AM 2463     

निज भाषा के प्रचार
और प्रसार के लिए
हर प्रयास तुम करो
हाँ ये आस तुम करो
विकास तुम करो।

माँ भारती की गोद में लेखनी स्वतंत्र है
है बोलने का हक़ भी विचार भी स्वतंत्र है
तो सोचते हो क्या मूक मूढ़ से खड़े-खड़े
यों बुद्धि के दरवाज़े पर नौ ताल क्यों जड़े

होके अथक, अकथ
रचनात्मक अधीर
अभिन्न रचना करो
अभिव्यंजना करो,
सृष्टि बीज से भरो
हर प्रयास तुम करो।  

अभी-अभी हुए हो स्वतंत्र ये  न भूलना
हो हिन्द के निवासी हिंदी को न भूलना
देश की पहचान क्या ये कभी न भूलना
भाषा की उठान क्या है ये भी मत भूलना
 
किये अमित उपासना
सौम्य उर धारकर
नित उड़ान तुम भरो
परवान तुम चढ़ो
अपना  तुम करो।
हर प्रयास तुम करो।           

अपना झाँक लो निमिष क्या इतिहास है खरा
खुसरो, कबीर, मीरा, सूर ने क्या, खूब है गढ़ा
दिनकर, टैगोर, गाँधी, पंत के थी भाल ये सजी
तो रहे भला किसलिए मुरझाई सी दबी-दबी

साँस-साँस वारकर
निखार को निखारकर
सिंगार तुम करो
हर प्रयास तुम करो।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 15.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^