ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
सौभाग्य से मैं उनसे मिल सका
02-Jul-2019 10:30 AM 581     

अपने एक नाटक "नागमंडला" के बारे में बात करने वे वाशिंगटन विश्वविद्यालय आए
थे। कार्यक्रम की समाप्ति पर मैं उनके पास पहुँचा। अधिकांश लोग तब तक जा चुके
थे। मैंने उनसे अपने साथ तस्वीर लेने का अनुरोध किया। वे सहर्ष तैयार हो गए।

मैं उनके अभिनय से प्रभावित फ़िल्म "स्वामी" से हुआ। फ़िल्म का कथानक भी काफ़ी हद तक सहायक रहा मेरी पसन्द में। शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की कहानी पर बनी इस फ़िल्म के सम्वाद मन्नू भण्डारी ने लिखे थे, जिनकी रचना "आपका बंटी" साप्ताहिक पत्रिका "धर्मयुग" में धारावाहिक उपन्यास के रूप में आठ वर्ष की आयु में मेरा दिल जीत चुकी थी। जब मैंने "स्वामी" देखी थी, तब मैं तेरह वर्ष का था। अमिताभ-राजेश खन्ना की फ़िल्मों का दीवाना था। गीतों का शौक़ीन। इस फ़िल्म के गीत कर्णप्रिय थे, लेकिन प्रमुख कलाकारों ने इन्हें पर्दे पर गाया नहीं। बहुत अनूठा प्रयोग लगा। और यह भी कि फ़िल्म के टाईटल्स सिर्फ हिन्दी में थे। और सर्वप्रथम शरतचन्द्र जी का नाम आया, और उनके बाद मन्नू भण्डारी का। तीसरा नाम योगेश का जिन्होंने इस फ़िल्म के अर्थपूर्ण गीत लिखे। यानि शब्द और साहित्य को महत्व दिया गया।
इस फ़िल्म के किरदार की तरह गिरीश कर्नाड मुझे हमेशा संजीदा इन्सान लगे। बाद में उनकी कई और फ़िल्में देखीं और इनके प्रति मेरा आदर बढ़ता रहा।
जब उनके देहावसान का समाचार मिला तो उनके व्यक्तित्व के बारे में और भी जानकारी मिली। वे फ़िल्म संसार के अकेले व्यक्ति हैं, जिन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
हालाँकि उन्हें पुरस्कार नाटक के क्षेत्र में मिला और मैंने उनका कोई भी नाटक न देखा, न पढ़ा। जबकि मैं कलकत्ता में छ: साल रहा हूँ, जो कि देश की सांस्कृतिक राजधानी मानी जाती रही है। यहाँ मैंने बांग्ला और हिन्दी के कई नाटक देखें। कहा जाए तो रामलीला को छोड़ दिया जाए तो मैंने अपने जीवन का पहला नाटक कलकत्ता में ही देखा। बाद में दिल्ली में भी देखे। अमेरिका में भी। और अमेरिका के दो अंग्रेज़ी नाटकों में अभिनय भी किया।
यह उन दिनों की बात है जब मैं अल्पायु में सेवानिवृत्त होकर जीवन को नए दृष्टिकोण से देख रहा था। और नए आयाम खोज रहा था। अभिनय का शौक़ चर्राया और फिर तगड़ी रिहर्सलों के आगे टूट भी गया। प्रतिदिन इतना समय दे पाना अनुचित सा लगने लगा।
अमेरिका में हर विधा में हर तरह के लोग हैं। काफ़ी पारंगत से लेकर नौसिखिए तक। इसी प्रकार हर विधा में लाखों कमाने वाले भी हैं और भूखे मरने वाले भी। और कुछ नाटक सालों-साल चलते हैं खचाखच भरकर। और कुछ दो दिन भी नहीं चल पाते हैं। ख़ुद के मित्र-परिजन भी आने से कतराते हैं। चाहे उन्हें मुफ़्त में टिकट दे दो तो भी नहीं।
जो बहुत सफल नाटक माने जाते हैं उनका टिकट सौ-दो-सौ डॉलर पड़ता है। फिर पार्किंग इत्यादि का ख़र्चा अलग। आमतौर पर वहाँ स्मारिका आदि भी रखी जाती हैं, जिसे आप ख़रीदने पर बाध्य हो जाते हैं।
कुल मिलाकर यह सम्पन्न लोगों का शग़ल है। कोई भी धनाढ़्य जब न्यूयॉर्क जाता है सैर-सपाटे के लिए तो ब्रॉड-वे सड़क पर स्थित मशहूर नाट्य घरों में एक नाटक देखकर अवश्य आता है। और पहले से योजना न बनाई हो तो "ब्लैक" में दुगना-तिगना दाम देकर।
पिछले दिनों यहाँ के पूर्व राष्ट्रपति हैमिल्टन पर आधारित नाटक इतना मशहूर हुआ कि टिकटों के लिए ख़ूब मारामारी हुई। इस वर्ष नवम्बर में फिर से मंचित होगा। जिसके टिकट अभी ख़रीदे जा सकते हैं - दो सौ से लेकर आठ सौ तक में।
इसके मुक़ाबले फ़िल्म का टिकट दस-पन्द्रह डॉलर में मिल जाता है। यानि नाटक क़रीब दस गुना ज़्यादा महँगा। और उसमें भी कलाकारों को दूरबीन लगाकर देखना पड़ता है।
फ़िल्म उद्योग के बड़े से बड़े कलाकार होड़ करते हैं कि वे एक दिन नाटक में काम करे। न्यूयॉर्क टाईम्स हर सप्ताह चल रहे नाटकों की समीक्षा प्रस्तुत करता है, संतुलित समावलोकन करता है।
अक्टूबर 2009 में जब मैंने सुना कि गिरीश कर्नाड वाशिंगटन विश्वविद्यालय आ रहे हैं तो बहुत ख़ुशी हुई कि मेरे प्रिय कलाकारों में से एक से मुलाक़ात का सुहाना अवसर है। भारत में तो बॉलीवुड के कलाकारों के दर्शन दुर्लभ हैं। जब वे यहाँ शो करने आते हैं तब भी महँगे टिकट ख़रीदने पर बस एक सेल्फि लेने भर की कोशिश जा सकती है। (हालाँकि संजय दत्त से न्यूयॉर्क में मुलाक़ात बहुत ही दिलचस्प रही, लेकिन वो कहानी फिर कभी) श्रोताओं की संख्या बहुत कम थी। दस साल पहले वैसे भी सिएटल में भारतीयों की जनसंख्या बहुत कम थी। ऊपर से यह भी कि गिरीश कर्नाड की पहचान अब कम होने लगी थी।
वे सत्तर-अस्सी के दशक के कलाकार थे। जिन्हें 2009 में जनता भूल चुकी थी। अब भी जब उनके देहावसान पर मैंने उनके साथ ली तस्वीर व्हाट्सैप की डी-पी पर लगाई तो नई पीढ़ी के कुछ लोग पूछने लगे कि आपके साथ कौन हैं? जबकि "एक था टाईगर" और "टाइगर ज़िन्दा है" में उनकी असरदार भूमिका थी। "टाइगर ज़िन्दा है" में तो वे नाक में नली लगाकर दर्शाए गए और वह भी बिना किसी भूमिका के। यानि नाक में नली है, तो क्यूँ है इसे समझाने की कोई आवश्यकता नहीं समझी गई। इसे कहते हैं निर्देशक और दर्शकों की परिपक्वता। ऐसे महान कलाकार जिस भी रूप में, हाल में होते हैं, अपनी छाप छोड़ जाते हैं। उन्होंने नसीरुद्दीन शाह या अमरीश पुरी जैसा व्यापक अभिनय नहीं किया। अपने सीमित दायरे में ही रहे। लेकिन हमेशा प्रभावित किया।
बहरहाल मैं तो काफ़ी उत्सुक था उनसे मिलने के लिए। वे अपने एक नाटक "नागमंडला" के बारे में बात करने आए थे। इस नाटक के अंग्रेज़ी रूपांतर के कुछ अंश स्थानीय अभिनेताओं द्वारा पढ़े गए और वे बीच-बीच में टिप्पणी करते गए।
कार्यक्रम की समाप्ति पर मैं उनके पास पहुँचा। अधिकांश लोग तब तक जा चुके थे। मैंने उनसे अपने साथ तस्वीर लेने का अनुरोध किया। वे सहर्ष तैयार हो गए। मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि सबकुछ कितना आसानी से हो रहा था।
मैंने उनसे क़रीब पाँच मिनट बात की होगी, खड़े-खड़े ही। वार्तालाप अंग्रेज़ी में ही हुआ। कार्यक्रम अंग्रेज़ी में था इसलिए या शायद वे हिन्दी में इतने सहज न हो। (ऐसा ही अनुभव पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर कलाम के साथ हुआ। मैं उन्हें अपनी कुछ कविताएँ भेंट देना चाहता था। वे देवनागरी पढ़ नहीं सकते। सो मैंने एक पढ़ कर सुनाई। और अंग्रेज़ी में अनुवाद भी करता गया।)
ख़ैर, बातों-बातों में मैंने लम्बी रिहर्सलों का रोना रोया। बजाय सहानुभूति के, उन्होंने कहा कि तुम्हें यदि अभिनय से सच्ची लगन होती तो यूँ शिकायत न करते।
बस मेरे लिए इतना ही काफ़ी था, निर्णय के लिए। जैसे कि मैं इन्हीं का इंतज़ार कर रहा था, अभिनय की दुनिया को तिलांजलि देने के लिए। यह मेरा सौभाग्य है कि मैं उनसे मिल पाया और उनकी सलाह को समझ पाया।

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