ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भगवान बुद्ध का देश सिक्किम
01-Mar-2019 03:21 PM 2014     

इन पंक्तियों को गुनगुनाती हुई मैं अपने ड्रीम टूरिज्म हॉट स्पॉट की तलाश में भारत के नक्शे में सुदूर उत्तर से दूर दक्षिण तक और सुदूर पूर्व से पश्चिम तक "बकोध्यानम" की भांति दृष्टि लगाए हुई थी कि मेरी नजर पश्चिम बंगाल के ऊपर मुकुट की भांति चमकते हुए सिक्किम पर पड़ी और मैंने जनवरी के अंत में ही फौरन यहां जाने का अपना मन बना लिया। टिकट, होटल आदि की बुकिंग करने के प्रति पूर्ण आश्वस्त होकर बड़ी बेसब्री से यात्रा आरंभ करने का इंतजार करने लगी।
निर्धारित दिन मैं न्युजलपाईगुड़ी पहुंची। सिक्किम में प्रवेश करने के लिए न्युजलपाईगुड़ी या सिलिगुड़ी पहुंचना होता है। यहां से गंगटोक की दूरी लगभग 120 किमी। है। न्युजलपाईगुड़ी स्टेशन के बाहर टैक्सी व बस बहुतायत में उपलब्ध हैं। यहां से हमने एक टैक्सी रिजर्व की और अपनी मंजिल गंगटोक की ओर चल पड़े। न्युजलपाईगुड़ी शहर से बाहर आते ही एक नई दुनिया दिखाई पड़ने लगती है। शहर का कोलाहल व प्रदूषण धीरे-धीरे पीछे छूटने लगता है। यहां से गंगटोक तक का रास्ता तीस्ता नदी के साथ-साथ चलता है। यह सर्पिलाकार रास्ता पहाड़ को अपनी कुंडली में लपेटता हुआ आगे बढ़ता जाता है। सड़क के एक तरफ ऊँचे पहाड़ तो दूसरी ओर कल-कल बहती नदी बहुत ही सुंदर दृश्य प्रस्तुत करते हैं। इन सुंदर वादियों से गुजरते हुए करीब 4 घंटे की यात्रा के पश्चात मैं गंगटोक पहुंच गई। सिक्किम की सीमा में प्रवेश करते समय अनिवार्य तौर पर किसी फोटोयुक्त पहचान-पत्र की जांच होती है।
होटल में चेक इन करने के पश्चात उस दिन अधिक समय हमारे पास नहीं बचा था। इसलिए पहले दिन गंगटोक में स्थानीय दर्शनीय स्थलों को देखने की योजना बनाई और हम निकल पड़े। लगभग सवा लाख की आबादी वाला गंंगटोक शहर बौद्ध धर्म की विरासत को अपने में संजोए हुए बौद्ध मठ व बौद्ध संस्कृति की कहानी बयां करता है। कई बौद्ध मठ व बौद्ध धर्म के स्कूल भगवान बुद्ध का संदेश कहते हुए से प्रतीत होते हैं। इसमें तिब्बतोलॉजी म्यूजियम, कोर्तेन स्तूप और इनचे मोनस्टरी प्रमुख हैं। इनमें कई जगहों पर भगवान बुद्ध के संपूर्ण जीवन चरित्र को चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। यहां पर पहुंचते ही हृदय से स्वयमेव ही ध्वनि प्रतिध्वनित होने लगती है- बुद्धं शरणं गच्छामि।
बौद्ध धर्म की इन विरासतों से बहुत कुछ जानते समझते हुए हम आगे बढ़े गंगटोक के अद्भुत प्राकृतिक नजारों को देखने। इस कड़ी में हम पुष्प प्रदर्शनी केंद्र, ल्हासा फाल, गणेश टोक, हनुमान टोक आदि स्थानों पर गए। गणेश टोक से पूरे गंगटोक का स्पष्ट एरियल व्यू देखा जा सकता है। गंगटोक प्रशासन द्वारा विकसित ये टूरिस्ट हॉटस्पॉट दर्शनीय बिंदु हैं।
अगली सुबह गंगटोक की ताजी सुहानी सुबह, खिली धूप, ठंडी हवाएं, साफ नीला आसमान, ताजगी का अहसास और प्रकृति के स्पर्श के साथ ही दिन बहुत ऊर्जावान व स्फूर्तिदायक लग रहा था। इस दिन हमारी मंजिल थी- भारत और तिब्बत (चीन) की सीमा नाथूला दर्रा, छांगू लेक व बाबा मंदिर। एक दूसरे के बहुत समीप ये तीनों ही स्थान पूर्वी सिक्किम जिले में आते हैं। करीब चार हजार मीटर की उंचाई पर स्थित नाथूला दर्रा का व्यापारिक महत्व बहुत अधिक है। नाथूला दर्रा की गंगटोक से दूरी करीब 58 किलोमीटर है। यह पूरा क्षेत्र सेना के नियंत्रण में है। इस वजह से परमिट लेकर ही इस क्षेत्र में प्रवेश करना पड़ता है। यहां पर केवल भारतीय नागरिक ही जा सकते हैं। परमिट के लिए पते के प्रमाण वाला फोटोयुक्त आईडी कार्ड की जेरोक्स कॉपी और रंगीन फोटो की आवश्यकता होती है। साथ में कुछ शुल्क भी लगता है। किसी भी ट्रेवल एजेंसी से संपर्क कर उनकी सहायता से परमिट आसानी से हासिल किया जा सकता है। गंगटोक से बाहर निकलते ही सेना नियंत्रण का क्षेत्र प्रारंभ हो जाता है और यहां पर एक बार परमिट की जांच होती है। इसके बाद ऊबड़-खाबड़ सड़क से होते हुए आगे बढ़ते निरंतर उंचाई पर जाने का आभास मिलता है। आगे चलने पर एक-दो छोटे-छोटे गांव दिखाई देते हैं। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं, ठंड भी बढ़ती जाती है। आगे बढ़ने पर बर्फ से ढँकी चोटियां दूर से ही चमकती दिखाई देने लगती हैं। गंगटोक से करीब 40 किमी आगे चलने पर हमें दूर से सिक्किम की पहचान छांगू लेक दिखाई देने लगी। दूर से आंख जैसी दिखने वाली यह झील चारों ओर से बर्फ से ढँकी पहाड़ियों से घिरी हुई अत्यंत सुंदर लग रही थी। झील के पानी पर तैरती हुई बर्फ को देखकर ऐसा लग रहा था कि मानो कोई सुंदर स्त्री धवल वस्त्रों में जलक्रीड़ा कर रही हो।
आधे बर्फ और आधे पानी से युक्त यह झील प्रकृति का एक नायाब नमूना प्रस्तुत कर रही थी। झील के साफ पानी में स्वच्छ नीला आसमान, आसपास की पहाड़ियों का प्रतिबिम्ब और रंगबिरंगी तैरती मछलियां एक अलग ही दुनिया की उपस्थिति को बयां कर रही थी। झील के चारों ओर हिमाच्छादित पहाड़ियों पर जाने के लिए याक की सवारी बड़ी ही आनंददायक लगती है। याक पर बैठते ही मुझे अपने बचपन में की गई एक घुड़सवारी की बरबस याद आ गई और वह कविता भी जो मैं बचपन में गुनगुनाती थी-
लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा
घोड़े की दुम पे जो मारा हथौड़ा।
छांगू लेक में पानी, बर्फ और पहाड़ियां सब कुछ गुनगुनाते हुए से लगते हैं, लगता है जैसे सब परम शांति में डूबकर शांतिपाठ कर रहे हों। करीब चार हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित छांगू लेक की प्रतिकृति मन में बसाकर हम आगे बढ़े नाथू ला दर्रे की ओर।
छांगू लेक से नाथूला की दूरी करीब 18 किलोमीटर है। नाथूला पहुंचते ही अचानक ठंड की तीव्रता बहुत अधिक बढ़ गई। बर्फीली हवाओं के थपेड़े चेहरे को ठंड से सुन्न कर देने की पुरजोर कोशिश कर रहे थे। भारत चीन की सीमा नाथूला दर्रे पर अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा कंटीले पतले तार से चिह्नित की गई है। सीमा के दोनों तरफ दोनों देशों की सेनाओं के जवान पूरी सतर्कता, साहस और बहादुरी के साथ अपने देश को महफूज रखने में अपना कर्तव्य निभा रहे थे। जहां पर हमें 10 मिनट खड़े रहने में ठंड से शरीर सुन्न होने का आभास हो रहा था, वहीं पर हमारी भारतीय सेना मुस्तैदी से तैनात थी। सेना के जवान हमें वहां की जानकारी प्रदान कर रहे थे। हर एक स्थिति का सामना करने को तैयार खड़े हमारे बहादुर जवानों के जज्बे को सलाम करते हुए हम वापस लौट आए।
नाथूला से वापसी में हम बाबा मंदिर भी गए। बाबा मंदिर वीर सैनिक हरभजन सिंह की याद में बनाया गया है। ड्युटी पर शहीद सैनिक हरभजन सिंह को सेना आज भी ऑनड्युटी मानती है। इस मंदिर में उनका कार्यालय व आवास भी बनाया गया है। जहां आज भी उनकी वर्दी रोज प्रेस की जाती है, धोई जाती है, जूते पॉलिश किए जाते हैं, सेना के नियमानुसार छुट्टी प्रदान की जाती है आदि। आस्था के केंद्र इस मंदिर में दर्शन कर हमें अपूर्व आनंद आया।
बाबा मंदिर नाथूला दर्रे से 5 किलोमीटर पहले है। पर्यटकों की सुविधा के लिए मुख्य मार्ग के नजदीक एक अन्य बाबा मंदिर का निर्माण कराया गया है। 14 हजार फीट की ऊँचाई पर जनजीवन को सरल बनाने के साधन यथासंभव उपलब्ध कराए गए हैं। अन्य साधनों के साथ ही हमें उस ऊँचाई पर नाथूला दर्रे से थोड़ा पहले स्टेट बैंक का एटीएम भी दिखाई पड़ा।
पूर्वी सिक्किम के बाद अगले दिन हम दक्षिणी सिक्किम की ओर गए। पूरे सिक्किम को प्रशासनिक दृष्टि से चार जिलों में बांटा गया है- पूर्वी सिक्किम, पश्चिमी सिक्किम, उत्तरी सिक्किम और दक्षिणी सिक्किम। दक्षिणी सिक्किम जिले का मुख्यालय नामची है। यह स्थान चाय के बागानों के लिए प्रसिद्ध है। यहां पर टेमी टी फैक्टरी और उसके चाय के बाग हैं।
चाय के बाग बहुत ही सुंदर और आकर्षक दिखते हैं, बिलकुल हरे रंग की मखमली चादर की तरह। यहां पर फैक्टरी की चाय का आनंद लिया जा सकता है। यहां के कई दृश्य फिल्मों में देखे गए जैसे लग रहे थे।
यहां थोड़ी देर चाय के बागानों में घूमने टहलने के बाद हम आगे बढ़े नामची कस्बे की ओर। नामची कस्बे से 5 किलोमीटर दूर है- सर्वेश्वर धाम तीर्थ स्थान। सोलोफोक पहाड़ी की चोटी पर इस धाम को बसाया गया है। 2011 में सिक्किम के मुख्यमंत्री द्वारा इसका उदघाटन किया गया।
इस तीर्थ स्थान पर 108 फीट ऊँची भगवान शंकर की मूर्ति स्थापित की गई है। शिव के विराट स्वरूप को प्रदर्शित करने वाली यह प्रतिमा बहुत दूर से ही दिखाई देने लगती है। यहां पर हिंदुओं के चारों धाम, भगवान शंकर के 12 ज्योतिर्लिंग और साईं बाबा मंदिर बनाया गया है। यहां पर पहुंचते ही एक दिव्य वातवरण का अहसास होने लगता है। मानों संपूर्ण भारत के तीर्थस्थानों का पुण्य हमें प्राप्त हो रहा है। मंदिर के बीच में भगवान शिव की प्रतिमा के ठीक नीचे भगवान शिव का विशाल मंदिर भी बनाया गया है। थोड़ा समय मंदिर प्रांगण में बिताने के बाद हम लौट आए। नामची से वापस लौटते समय हमें रास्ते में प्रसिद्ध फुटबॉल खिलाड़ी बाइचुंग भूटिया का गांव दिखाई दिया जहां पर उनके नाम से फुटबॉल स्टेडियम था।
सिक्किम राज्य प्रकृति के अनूठे सौंदर्य से भरा पड़ा है। उत्तरी सिक्किम और पश्चिमी सिक्किम की पहचान नयनाभिराम झीलों, ऊंचे दर्रों, हिम ग्लेशियर, गर्म पानी के स्रोत इत्यादि से है। सिक्किम के उत्तरी व पश्चिमी भाग इसकी सुंदरता में चार चांद लगाते हैं।
गोवा के बाद क्षेत्रफल के आधार पर देश के दूसरे सबसे छोटे राज्य सिक्किम में दुनिया का तीसरा सबसे ऊंचा पर्वत शिखर कंचनजंघा है। सिक्किम में 28 पर्वत शिखर, 80 ग्लेशियर, 227 झीलें और 5 गर्म पानी के स्रोत हैं। इसके साथ ही सिक्किम को तिब्बत, भूटान व नेपाल से जोड़ने वाले 8 पहाड़ी दर्रे हैं। समुद्र तल से सिक्किम की उंचाई 280 मीटर से लेकर 8586 मीटर तक की है। यहां पर एकमात्र विमानपत्तन पाकयोंग में है, जहां पर केवल छोटा एटीआर विमान ही उतर सकता है। यहां की मुख्य भाषाएं नेपाली, भूटिया, लेप्चा व हिंदी हैं। गंगटोक में खाने-पीने की सुविधाएं बहुत अच्छी हैं। शाकाहारी, मांसाहारी, चाईनीज, कांटिनंेटल इत्यादि के बहुत से होटल हैं। जगह-जगह पर मोमोज और यहां का स्थानीय व्यंजन थुत्पा मिलता है।
अगर बात सिक्किम की हो और गंगटोक के स्थानीय बाजार की बात न की जाए तो बात अधूरी रह जाएगी। गंगटोक के एमजी रोड पर स्थित बाजार अपने आप में अनूठा व अद्भुत है। पूरी तरह से क्लीन व ग्रीन इस बाजार में कोई भी वाहन नहीं चलता है। केवल पैदल ही चला जा सकता है। सड़क के दोनों ओर बहुत-सी दुकानें हैं और सड़क के बीच में डिवाईडर के दोनों ओर बैठने के लिए बंेच हैं और डिवाइडर में सुंदर-सुंदर पेड़ पौधे लगाए गए हैं और यहां पर लगातार कर्णप्रिय संगीत बजता रहता है। रात में यहां पर बहुत अच्छी लाईट का प्रबंध भी है। यहां बेंचों पर बैठकर इस सुंदर बाजार को जीभर कर देखा जा सकता है। एमजी रोड के नीचे सीढ़ियों पर लाल बाजार है जो कि अपेक्षाकृत सस्ता है।
सिक्किम की सुंदरता पर प्रकृति दिल खोलकर मेहरबान हुई है। प्रकृति ने सिक्किम को जहां एक ओर स्वास्थ्यकर व सुंदर जलवायु, पर्वत शिखर, झीलें, जंगल, झरने आदि दिए हैं, वहीं दूसरी ओर प्रकृति ने यहां के निवासियों को सुंदरता, ईमानदारी, निश्छलता व सादगी भी दी है। यहां की सुंदर युवतियां पूरे आत्मविश्वास व गरिमा के साथ हर जगह प्रमुखता से अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं, जो अपनी काबिलियत से जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाती नजर आती हैं। इस तरह से सिक्किम के जनजीवन और वहां की संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को जानते समझते हुए हमारा टूर समाप्त हुआ और हम मन में मधुर स्मृतियों को समेटे हुए वापस लौटने की तैयारी करने लगे, लेकिन इस संकल्प के साथ कि भगवान बुद्ध के अपने देश सिक्किम के दक्षिणी व पश्चिमी भाग की यात्रा भी हम जल्द ही करेंगे। गंगटोक से वापस न्युजलपाईगुड़ी लौटते समय टैक्सी में गाना बज रहा था जिसे हम गुनगुनाते हुए फ्लैशबैक में चले गए थे - तुम मुझे यूं भुला न पाओगे।

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