ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
शान्ति और प्रकाश की तलाश
01-Mar-2018 02:30 PM 1618     

प्रश्न : क्या आपको लगता है कि कभी विज्ञान ईश्वर की सत्ता को सिद्ध कर सकेगा?
टिप्पणी : नहीं। विज्ञान कभी भी ईश्वर की सत्ता सिद्ध नहीं कर सकेगा।
पर क्यों?
क्योंकि ईश्वर विज्ञान के क्षेत्र के बाहर की चीज़ है।
पर अभी तो समाचार मिला था कि वैज्ञानिकों ने ईश्वर-कण (गॉड पार्टिकल) की खोज कर ली है।
क्या वह कण आपकी ईश्वर संबंधी सभी जिज्ञासाएँ शान्त कर सकेगा? क्या आप उस कण की पूजा-उपासना कर सकेंगे? क्या आप उसमें अपने जीवन की समस्याओं का अन्तिम समाधान खोज सकेंगे?
तो जो वैज्ञानिकों ने खोजा है वह क्या है?
टिप्पणी : वैज्ञानिक उस कण की तलाश कर रहे थे जिसके कारण सृष्टि में द्रव्यमान (थ्र्ठ्ठद्मद्म) संभव हो सका। उस कण के बिना सृष्टि की रचना कैसे हुई इसे वैज्ञानिक समझ नहीं पा रहे थे। उस कण की खोज हो जाने से यह संभव हो सका है। क्योंकि यह कण सृष्टि के प्रारंभ को संभव बना सकता था इसलिए किसी ने मज़ाक में इसे "गॉड पार्टिकल" कह दिया और यह नाम कुछ ज़्यादा ही प्रचलित हो गया। ईश्वर से इसका किसी भी प्रकार का कोई संबंध नहीं है।
पर क्या वैज्ञानिक आज नहीं तो कभी भविष्य में ईश्वर को खोज पाने की आशा नहीं कर सकते?
वैज्ञानिक केवल उन चीज़ों के बारे में अनुसंधान कर सकते हैं जिनकी गणितीय परिभाषा उनके पास है। जिस चीज़ को वे निश्चित रूप से पहचान नहीं सकते उसके बारे में वे अनुसंधान करने का प्रयास भी नहीं करते।
पर मान लीजिए कि वैज्ञानिकों ने ईश्वर को खोज ही निकाला।
कृष्णमूर्ति कहते हैं कि यदि आपको कभी ईश्वर मिल भी गया तो आप उसे पहचानेंगे कैसे? क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति को पहचान सकते हैं जिसे आपने कभी देखा नहीं है और जिसका केवल नाम सुना है। यदि वैज्ञानिक कहें कि जो हमने खोजा है वह ईश्वर है तो क्या आप उनकी बात मान लेंगे। आप किस आधार पर उनकी बात का समर्थन या विरोध करेंगे।
पर ईश्वर का कुछ भाव तो हमारे अन्दर है।
आपके अंदर ईश्वर का जो भाव है वह आपको अपने धर्म से मिला है। ईश्वर का भाव अलग-अलग धर्मों में अलग-अलग है। यदि आप ईसाई हैं तो क्या आप ऐसे ईश्वर को स्वीकार कर लेंगे जिसके दाएँ हाथ की ओर ईसा मसीह न बैठे हों। और मान लीजिए कि आपको ऐसा ईश्वर मिल भी गया तो क्या मुसलमान लोग उसे ईश्वर के रूप में मानने को तैयार हो जाएँगे। वे तो मानते हैं कि ईश्वर को किसी शक्ल में देखा ही नहीं जा सकता। यदि हिन्दुओं के ईश्वर की तलाश आप करेंगे तो आपकी समस्या होगी कि आप उसे राम, कृष्ण, शिव, विष्णु आदि अनेक रूपों में से किस रूप में खोजेंगे।
तो फिर क्या विज्ञान से ईश्वर की खोज के बारे में कोई भी सहायता मिलने की आशा नहीं है?
नहीं, बिलकुल नहीं और कभी नहीं।
इसका कारण? आप अपने कथन में कुछ ज़्यादा ही आग्रही लगते हैं।
जैसे कि अभी कहा है, विज्ञान केवल उन्हीं चीज़ों के बारे में खोज कर सकता है जिनकी गणितीय परिभाषा उसके पास है। उदाहरण के लिए, हम सभी को ठंड और गर्मी का अनुभव होता है। उसके आधार पर वैज्ञानिकों ने ताप के बारे में अनुसंधान करना प्रारंभ किया। पर सबसे पहले उन्होंने ताप को तापमापी के आधार पर मापकर उसे एक परिभाषा में बाँध दिया। वैज्ञानिकों के लिए ताप का गर्मी की अनुभूति से कोई संबंध नहीं है। उनके लिए बर्फ में भी ताप है क्योंकि वे बर्फ के तापमान को मापकर उसे एक संख्या दे सकते हैं। वैज्ञानिक यह नहीं कहता कि आज का दिन बहुत ठंडा है, वह केवल यह कहता है कि इस समय हमारे चारों ओर की हवा का तापमान इतना है। ताप से संबंधित संख्याओं को छोड़कर वैज्ञानिक के लिए गर्मी-सर्दी का कोई अर्थ नहीं है।
और यदि किसी चीज़ की गणितीय परिभाषा न बन पाए?
तो वैज्ञानिक उसके बारे में कुछ नहीं कर सकता। आर्थर एडिंगटन ने कहा है कि वैज्ञानिक का वास्ता अपने उपकरणों से मिलनेवाली संख्याओं (द्रदृत्दद्यड्ढद्ध द्धड्ढठ्ठड्डत्दढ़द्म) से ही होता है। उन संख्याओं के पीछे सत्य क्या है यह वह नहीं जानता और न जान सकता है।
तो फिर हमें विज्ञान के द्वारा ईश्वर की खोज की आशा छोड़ देनी चाहिए।
हाँ, सदा के लिए।
पर हम यह आशा करते क्यों हैं?
क्योंकि हम विज्ञान पर आवश्यकता से अधिक निर्भर हो गए हैं। क्योंकि विज्ञान ने हमारी कुछ समस्याओं का समाधान खोज लिया है इसलिए हम मानने लगे हैं कि वह हमारी सभी समस्याओं का समाधान खोज लेगा। ऐसा सोचना अविवेकपूर्ण है।
तो फिर ईश्वर की खोज कहाँ करें?
अपने अंदर। ईश्वर को आप केवल अपने अंदर ही पा सकते हैं और कहीं नहीं।
पर श्रद्धालु लोग तो ईश्वर को पाने के लिए न जाने क्या-क्या प्रयास करते हैं। वे पूजा-उपासना करते हैं, तीर्थयात्रा पर जाते हैं, व्रत, उपवास, रोज़े रखते हैं। क्या यह सब व्यर्थ है?
पूरी तरह नहीं। जहाँ तक ये चीज़ें श्रद्धालुओं को अपने मन को शान्त करने और अपने संकुचित अहंकार से ऊपर उठने में सहायता करती हैं वहाँ तक उनकी सार्थकता है। जब वे बिना समझे केवल यान्त्रिक अनुष्ठानों का रूप ले लेती हैं, तब वे निरर्थक हो जाती हैं।
पर ईश्वर हमारे अंदर है, इसका विश्वास कैसे हो?
आपका अपना विश्वास तो आपको ईश्वर की झलक मिलने से ही होगा, पर प्रारंभ करने के लिए आप कुछ ऐसे व्यक्तियों के जीवन और वचनों पर दृष्टिपात कर सकते हैं जिनके बारे में लगता है कि उन्होंने ईश्वर का साक्षात्कार किया था। वैदिक ऋषि ने ईश्वर के लिए कहा, "युष्माकम् अन्तरं बभूव।" ईश्वर तुम्हारे बाहर नहीं, वह तुम्हारा अंतरतम, सबसे अंदर का अंश है। कबीर ने कहा मोको कहाँ ढूँूंढे बन्दे मैं तो तेरे पास में... मैं साँसन की साँस में...
तो जो चीज़ आपका अन्तरतम है, साँसों की साँस है, उसे खोजने के लिए आप विज्ञान का सहारा कैसे ले पाएँगे। विज्ञान तो जो भी चीज़ आपके सामने प्रस्तुत करेगा वह आपसे बाहर ही तो होगी, भले ही वह वह चीज़ हो जिसे ईश्वर-कण कहा जा रहा है।
वेद और कबीर के अतिरिक्त कोई और?
उपनिषद् पढ़िए, गीता पढ़िए, मध्ययुग के भक्त संतों के वचन पढ़िए। आधुनिक समय में रामकृष्ण, रमण महर्षि की बात सुनिए। जे. कृष्णमूर्ति को पढ़िए, भले ही वे सभी परंपराओं का खंडन करते हैं। कहीं-कहीं आपको ओशो में भी उस सत्य की झलक मिल जाएगी।
क्या इनके मार्ग पर चलने से ईश्वर मिल जाएगा?
नहीं। ईश्वर तक पहुँचने का कोई मार्ग नहीं है। जो चीज़ आपके अंदर पहले से विद्यमान है उस तक पहुँचने के लिए आप कौन-सा मार्ग अपनाएँगे।
पर मनुष्य वहाँ पहुँचना तो चाहता है। इसीलिए ईश्वर को पाने के लिए इतने प्रयास किए जाते हैं।
वास्तव में आपको प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। एल्डस हक्स्ले ने कहा है कि हमारी यात्रा का अंतिम लक्ष्य वहाँ पहुँचना है जहाँ हम सदा से रहे हैं।
इसका अर्थ क्या हुआ?
यदि हम मानते हैं कि ईश्वर ने इस संसार को बनाया है और संसार के बनने से पहले केवल ईश्वर ही विद्यमान था, तो जो कुछ उसने बनाया है उसमें वह किसी न किसी रूप में विद्यमान होना चाहिए। यानी सभी प्राणियों के जीवन में जीनेवाली चेतना ईश्वर की ही होनी चाहिए। तुलसीदास ने इसलिए कहा है- ईस्वर अंस जीव अबिनासी। हम सभी ईश्वर के ही अंश है। ईश्वर को पाने के लिए हमें कुछ नहीं करना, केवल अपने आपको जानना है।
पर अपने आपको जानने का मतलब क्या हुआ?
यही कि जो आप वास्तव में हैं उस रूप में अपने को जानें। इस समय यदि आपसे कोई पूछे कि आप कौन हैं? तो आप कह सकते हैं, "मेरा नाम यह है, मैं भारतीय हूँ, इस शहर का निवासी हूँ, इस मकान में रहता हूँ, उस दफ्तर में काम करता हूँ, इस स्त्री का पति हूँ, दो बच्चों का पिता हूँ", आदि-आदि। पर आपकी यह सारी पहचान आनुषंगिक है। आप भारत के अलावा कहीं और भी पैदा हो सकते थे, किसी और शहर में रह सकते थे, कहीं और काम कर सकते थे, आपका विवाह किसी और लड़की से हो सकता था, तब आपके बच्चे भी कोई और होते, आदि-आदि। आपका वास्तविक रूप वह है जो इन सब आनुषंगिक बातों के ऊपर है।
उस रूप को जानने के लिए क्या करना होगा?
पतंजलि कहते हैं कि अपने स्वरूप को जानने के लिए हमें अपने मन की हलचल को पूरी तरह शांत करना होगा जो कि योग का उद्देश्य है।
क्या इसका संबंध वैज्ञानिकों की खोज से भी है?
अवश्य। हमें सदा याद रखना है कि वैज्ञानिक जिस संसार का अध्ययन कर रहे हैं वे उससे अलग नहीं हैं, उसके अविभाज्य अंग हैं। प्रसिद्ध भौतिकीविद् डेविड बॉम ने कहा है : Ultimately, the entire universe (with all its 'particles', including those constituting human beings, their laboratories, observing instruments, etc.) has to be understood as a single undivided whole, in which analysis into separately and independently existent parts has no fundamental status. (Wholeness and the Implicate Order, p. 221))
पर इस सत्य को हम जान कैसे सकते हैं?
गहरे ध्यान के द्वारा। जब हमारे चित्त की हलचल बिलकुल शान्त हो जाएगी तब संसार का अंतिम सत्य हमारे सामने प्रकट होगा।
तो क्या वैज्ञानिकों को भी ध्यान का अभ्यास करना होगा?
अंतिम सत्य को जानने का और कोई उपाय नहीं है। गैरी ज़ुकाव ने आधुनिक भौतिकी के बारे में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक The Dancing Wu Li Masters (p. 310) में कहा है :
If Bohm's physics, or one similar to it, should become the main thrust of physics in the future, the dances of East and West could blend in exquisite harmony. Physics curricula of the twenty-first century could include classes in meditation.
और हम इक्कीसवीं शताब्दी के पहले दशक के पार आ चुके हैं।
तो इसका प्रारंभ कहाँ से करना चाहिए?
शिक्षा से। हम वैचारिक स्तर पर जो कुछ भी हैं उसमें हमारे धर्म और हमारी शिक्षा का बहुत बड़ा हाथ है। धर्म भी एक प्रकार की अनौपचारिक शिक्षा है यद्यपि उसके प्रभाव बहुत गहरे पड़ते हैं। शिक्षा में बच्चों को प्राथमिक शिक्षा से ही यह बताया जाना चाहिए कि भाषा में केवल संख्यावाची शब्दों के अर्थ निश्चित होते हैं, अन्य शब्दों के अर्थ हम अपने-अपने अनुभव से लगाते हैं। जिस चीज़ को हम मापकर उसके साथ कोई निश्चित संख्या जोड़ सकते हैं वह विज्ञान के क्षेत्र में आ जाती है। शेष सभी बातें मत के क्षेत्र में रहती हैं। इसलिए बच्चों को ही उदारवादी शिक्षा दी जानी चाहिए। अध्यापक को यह ईमानदारी से कहना चाहिए कि, विज्ञान को छोड़कर, वह जो कुछ भी पढ़ा रहा है वह पाठ्यपुस्तक का या उसका अपना मत है। छात्रों को अपना मत बनाने का न केवल अधिकार होना चाहिए अपितु उसके लिए उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। अन्यथा हमारे मेधावी बच्चे भी तोते बनकर रह जाते हैं, धर्म के क्षेत्र में और जीवन के क्षेत्र में भी।
पर क्या धार्मिक नेता इस बात के लिए तैयार होंगे? वे तो कहते हैं कि उनके पास धर्म का अंतिम सत्य है और उस सत्य को संसार में फैलाना उनका पवित्र कर्तव्य है।
इसीलिए संसार में इतना संघर्ष और खूनखराबा है। यदि तथाकथित धार्मिक नेताओं को बचपन में सही शिक्षा मिली होती तो वे अपने मत को लेकर इतने कट्टर नहीं होते। वे अपने ईश्वर को अपने अंदर पाने के लिए प्रयास करते और अपने अनुयायियों को भी वैसा ही करने के लिए प्रोत्साहित करते।
तब संसार में ज्ञान और शान्ति दोनों साथ-साथ रह सकते। आज हमारे जीवन में न शान्ति है, न प्रकाश।

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