ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
योरोप के बदलते मूल्यों पर नज़र
01-Apr-2019 09:40 PM 443     

देसी चश्मे से लन्दन डायरी - योरोप के बदलते परिवेश, समाज और मूल्यों का विचारशील व रोचक लेखा-जोखा है। विविध शीर्षकों के तले लन्दन की संक्षिप्त लेकिन महत्वपूर्ण जानकारी, पाठक की जिज्ञासा बढ़ाती जाती है और अन्त तक उसे क़ायम रखती है। हमें भारत में बैठ कर लगता है कि लन्दन बहुत समृद्ध-सम्पन्न और सुख-सुविधाओं से पटी हुई नगरी है, बल्कि मात्र लन्दन ही नहीं, अन्य योरोपीय शहरों की यही छवि हमारे दिलोदिमाग़ में खचित है। जबकि एक लम्बे समय से वहाँ हालात कब के बदल चुके हैं। योरोप की जिस संस्कृति में रचे-बसे युवा जहाँ 16-18 के होते ही माता-पिता से अलग रहने लगते थे, अपनी गर्लफ्रेंड खोज कर उसके साथ रहते हुए, जीवन का आनन्द उठाते थे, अब वे ही युवा मंदी की मार के कारण, अपने माता-पिता के साथ रहने को मजबूर हैं। मंदी के कारण बहुत से भत्ते बन्द हो चुके हैं, रोज़गार मिलना कठिन हो गया है। इसलिए युवा पीढ़ी अलग घर बसाने की सोचना तो दूर, ख़्वाब भी नहीं देखती।
"कहाँ बुढ़ापा ज़्यादा", लन्दन के बुज़ुर्गों की एकाकी पर, दमदार स्थिति से परिचित कराती है। वहाँ के वृद्ध निश्चित ही अकेले रहने के आदी हैं और बच्चों के अलग रहने को बिना आँसू बहाए या भावुक हुए, सहजता से लेते हैं, भले ही बुढ़ापे के नितान्त असहाय मोड़ पर, वे बच्चों की कमी महसूस करते हो, पर अपनी आकस्मिक बीमारी और रोज़मर्रा की दिनचर्या को सम्हालने में असमर्थ होने पर भी, अलग रहते बच्चों से बताना पसन्द नहीं करते। ऐसी हैं वहाँ के शारीरिक रूप से कमज़ोर और थके हुए वृद्धों की मानसिक ताक़त। हमारे भारत में तो वृद्ध बच्चों से आसानी से अलगाव स्वीकार नहीं करते और बच्चे अग़र अलग रहने भी लगते हैं तो, वे भावुक होकर याद करते रहते हैं या उन्हें गरियाते हैं कि बुढ़ापे में अकेला छोड़ कर, क्या इस तरह माँ-बाप का कर्ज़ अदा किया जाता है, जब इनकी औलाद इनके साथ ऐसा करेगी, तब ये नालायक समझेगें कि हमने कैसे अकेले दिन काटे।
"शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन" में यह जानकर हैरानी हुई कि योरोप में बच्चों को प्राइमरी शिक्षा दिलाना ही कितना कठिन और असम्भव हो गया है। वहाँ भी भारत की तरह प्राइवेट स्कूल लूट का स्रोत बने हुए हैं। मँहगी फ़ीस देना हर किसी के बस की बात नहीं। पुरानी शिक्षा व्यवस्था बदलकर "ओ" लेवल की बना दी गई है और उसके लिए बाक़ायदा परीक्षा का प्रावधान है। इस तरह की भौतिकवादी और पूँजीवादी शिक्षा व्यवस्था से बच्चे और माता-पिता सभी त्रस्त हैं। बेरोज़गारी की समस्या लन्दन के लिए मानो एक नासूर बनती जा रही है। युवाओं को नौकरी देने में सरकारी और प्राइवेट प्रतिष्ठानों की रंग-भेद और जाति-भेद नीति साफ़ नज़र आती है। एशियन मूल के वही जन्मे युवा इस भेदभाव के कारण अवसाद, निराशा और हताशा के शिकार हो रहे हैं और यह मानसिक दशा, अनेक बार उन्हें ग़लत दिशा में भी जाने का कारण बन जाती है।
बीच-बीच में शाही राजघराने की बातें रोचक बन पड़ी हैं। रानी का परम्परागत रूप में लंदनवासियों को अपने दर्शन देना, उनके दर्शन के लिए अधिकारियों द्वारा भीड़ जुटाना और लोगों द्वारा उनकी झलक पाकर निहाल हो जाना, आज 21वीं सदी में बेमानी-सा लगता है। अब राजा-रानी और उनके राजसी ठाठ-बाट व जनता पर उनके रौबदाब के ज़माने लद चुके। अब राजतंत्र के बजाय लोकतंत्र का युग है। फिर भी ग्रेट ब्रिटेन जैसे देश में, जहाँ सदियों से वहाँ की रानी ने उसके शाही घराने ने अपने देश की जनता के दिलों पर तो राज किया ही, साथ ही वह विश्वभर में भी अपने शाही उत्सवों और गतिविधियों के लिए छाई रहीं। पर आज आधुनिक विकास, बदले हुए दृष्टिकोण, डिजिटल बूम वाले लोकतांत्रिक युग में रानी-राज अपना युगों पुराना आकर्षण खो चुका है। ठीक है - उनका अपना अस्तित्व है - पर वह साफ़ सिमटा हुआ महसूस होता है। दो-एक दशक से, राजघराने के क़िस्से ब्रेकिंग न्यूज़ और पीत-पत्रकारिता की सनसनीख़ेज़ सामग्री बन चुके हैं। राजशाही सोच और व्यवहार के विपरीत, सामाजिक और उदार सोच वाली पिं्रसेस डाअना अपने जीवनकाल में जनता द्वारा हमेशा सराही गईं और मरने के बाद भी अपने सरल व मानवीय स्वभाव के लिए याद की जाती हैं। आज उनकी बहू यानी बेटे विलियम की पत्नी कैट अपनी स्वर्गवासी सास डाअना की तरह उदार मानवीय सोच वाली नज़र आती हैं। समय निकाल कर, मलेशिया के अस्पताल जाना और गम्भीर रूप से रोगग्रस्त बच्चों से मिलना, आत्मीयता से बातचीत करना, लोगो को दयालु राजकुमारी डाअना की याद दिलाता है। बहरहाल कैट स्वभाव से ही ऐसी है या शाही परिवार द्वारा इस तरह बनाई जा रही है - जो भी बात हो, पर यह एक अति सराहनीय मानवीय नज़रिया है, जिसके लिए वे जानी जाती है और सम्मान पाती हैं।
"स्कूल बस का महत्व" शीर्षक के अन्तर्गत बस को जिस ख़ूबसूरती से सामाजिक, साँस्कृतिक और धार्मिक एकता का पर्याय बताया गया है, वह निस्सन्देह क़ाबिले तारीफ़ है। लेखिका ने बताया है कि पहले लन्दन में स्कूल बस व्यवस्था नहीं हुआ करती थी और थी भी तो कुछ ख़ास व ज़रूरतमंद लोगों तक ही सीमित थी। इससे सामाजिक अलगाव पसरता था। लेकिन जब से डेविड लेविन ने भावी पीढ़ी को इस अलगाव की भावना से दूर रखने के लिए, अमेरिका की तरह स्कूल बस की व्यवस्था का निदान निकाला, तब से इस भेदभाव के पनपने पर रोकथाम की उम्मीद बढ़ गई है। अब माता-पिता भी अपने बच्चों को स्कूल बस से भेजना पसन्द करते हैं जिससे उनके बच्चे, किसी भी धर्म, जाति और तबके के बच्चों के साथ मिलजुल कर रहना सीखें, परस्पर दोस्त बनें और एक दूसरे के लिए प्यार और सद्भाव रखें। बच्चों को केन्द्रित करके अन्य आलेख - "समान पाठ्यक्रम", "शिक्षा का मक़सद", में लड़के-लड़की का भेद मिटाने, बच्चों के स्वस्थ भावी व्यक्तित्व का निर्माण करने के जैसे सुन्दर और ज़रूरी मुद्दों पर विचार किया गया है।
"वैवाहिक स्वतन्त्रता" और "मिश्रित सँस्कृति और विवाह", ये आलेख इस सच्चाई पर प्रकाश डालते हैं कि विवाह करना हर इंसान का व्यक्तिगत मौलिक अधिकार है। उस पर किसी भी गोत्र, धर्म, जाति, देश-विदेश को लेकर सामाजिक प्रतिबन्ध लगाना, क़ानून बनाना, इंसानी रिश्तों के साथ अन्याय है। वहाँ के युवाओं की भी यह सोच है कि विवाह किसी भी धर्म, जाति या अन्य देश के व्यक्ति से हो - उसका आजीवन निभना ज़रूरी है। इसलिए मिश्रित सँस्कृति, देश और धर्म के तहत किए गए विवाह में पति-पत्नी अपने बच्चों को मानवता की सीख और मिश्रित सँस्कृति की जानकारी देने, उसका मान-सम्मान करने की बात करते हैं, जो भावी पीढ़ी के मानवीय होने के प्रति हमें आश्वस्त करता है। इसी तरह "विवाह और लिव-इन" भले ही स्त्री-पुरुष को बिना किसी झंझट के साथ रहने की सुविधा देता हो, पर फिर भी, "लिव इन" की आज़ादी से अधिक हर इंसान को विवाह का वह बन्धन पसन्द है जिसमें प्यार, मुहब्बत, भरोसा और भावनात्मक सुरक्षा हो। सच में, इंसानी सम्बन्धों से बढ़कर कोई धर्म, कोई जाति, कोई समुदाय, कोई देश नहीं होता। "अधिकारों की दुविधा" लेख भी विवाहित हो या लिव इन, युवा जोड़ो के ऐसे बदले और सुलझे हुए रूप को सामने लाता है, जिसमें काम-काजी पत्नी का पति घर के सारे काम- खाना बनाना, कपड़े धोना, बर्तन धोना, बच्चों की नैपी बदलना, बिना किसी कुण्ठा के कर सकता है। हालांकि वर्किंग नारी अपने बच्चे को उचित समय नहीं दे पाती और उनका मातृत्व एक कमी सी महसूस करता है। माता-पिता की डिमांडिग जॉब होने पर, उन्हें नैनी या गवर्नेस रखनी पड़ती है। नैनी की देखरेख में बड़े हुए बच्चे भी रिश्तों की उष्मा से रहित होते हैं। "घर बन पाते हैं फ़ोस्टर केयर" आलेख में भी लगभग ऐसी ही मिलती-जुलती समस्याएँ पेश की गई है। अतैव, अप्रिय स्थिति को उपजने से रोकने के लिए, माँएं अपने ऑफ़िस के घंटों में परिवर्तन कर, कैरियर के साथ समझौता कर लेती है और बच्चों को समय देना श्रेयस्कर मानती हैं।
"भारत में असुरक्षित महिलाएँ", "अपराधों को रोकने की पहल" लेख, भारत में जब-तब घटने वाले बलात्कार काण्ड और दिसम्बर 2012 में दिल्ली में घटे, आज तक के सबसे ख़ौफ़नाक़ दामिनी बलात्कार हादसे ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया। तब से, वेदों, उपनिषदों के आध्यात्मिक ज्ञान, पवित्र गंगा, काशी, हरिद्वार की जगमग आरती के लिए विश्व में ख्यात भारत, रातों-रात महिलाओं के लिए एक दु:स्वप्न बन गया। भारत की ही नहीं, बल्कि विदेशी व भारतीय मूल की प्रवासी महिलाएँ अकेले भारत आने से डरने लगी। भारत की छवि धूलधूसरित हो गई। लेकिन इस तूफ़ान के बाद, फिर से महिलाओं के अधिकारों, समान शिक्षा, सुरक्षा को लेकर तेज़ी से लोगों का नज़रिया उदार हुआ है और जागरुकता आई है, सुरक्षा प्रबन्ध ही कड़े नहीं किए गए, बल्कि पुरुषों का, युवकों का रवैया बदला है, मानसिकता बदली है अनेक "मलाला" सम्मानित होएँ, अपनी आवाज़ बुलन्द कर सके और कोई भी दामिनी बेमौत न मरे।
"महिलाओं के साथ अत्याचार जारी है", मेरे ख़्याल से स्त्रियों के प्रति अपराध एक वैश्विक मुद्दा है। विश्व के हर देश में महिला वर्ग पीड़ित, उपेक्षित और खमोबेश अन्याय का शिकार है। जबकि लन्दन में शासक के रूप में सर्वोच्च पद पर महारानी विराजमान है, फिर भी नारी जाति की दुर्गति का वही हाल है।
"गलियों के गैंग", "मज़हब नहीं सिखाता", "सुरक्षित समाज का असुरक्षित युवा" ये लेख लन्दन की अपराधी, निराश, हताश और असुरक्षित युवा पीढ़ी की तस्वीर सामने लाते हैं। जैसे भारत में बेरोज़गार युवक निराशा से भरे होने के कारण ग़लत राह पर चलने लगते हैं, चोरी, डकैती, क़त्ल, मारपीट जैसे अपराध करना उनका चुटकियों का काम होता है, या फिर कुछ युवा अवसाद के कारण आत्महत्या कर लेते हैं। इसका मतलब कि "खाली दिमाग़ शैतान का घर", यह उक्ति विकसित-अविकसित, सब देशों के उन युवा लोगो पर लागू होती है, जो खाली हैं, जिनके जीवन में धन का व अन्य आम सुविधाओं का अभाव है, या जो माता-पिता की अवहेलना का शिकार हैं, जिन्हें कोई सही राह दिखाने वाला नहीं, बेरोज़गार हैं।
"सँस्कृति के समन्वयक त्यौहार" और "लन्दन में एशियाई त्यौहार" और "मेले तो मेले होते हैं" - ये आलेख वाकई विभिन्न धर्मों और जातियों के लोगों को किस प्रकार एकता और स्नेह के सूत्र में बाँध सकते हैं, लन्दन के इस सत्य का वास्तविक चित्र प्रस्तुत करते हैं। आज वहाँ विविध देशों से आए हुए, अलग-अलग धर्मों और जातियों के परिवार स्थाई रूप से बस कर, वहीं का ऐसा हिस्सा हो गए है कि वहाँ के बाज़ार पश्चिम के लोकप्रिय त्यौहार "क्रिसमस" के मौके पर ही नहीं, अपितु गणेश चतुर्थी, नौदुर्गे, करवा चौथ, ईद, दशहरा, दीवाली पर भी उत्साह से सजे-धजे रहते हैं और चारों ओर रौनक व खुशी का माहौल रहता है। इसे पारम्परिक त्यौहारों का तिलस्म कहें या चमत्कार कहें, जो भी कहें, पर है यह कमाल ही कि इनके आने पर, हर देश, हर धर्म व जाति के अनुयायी, पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण का भेदभाव भूल कर सभी उत्सवों को ख़ूब जोशोख़रोश से मनाते हैं और पहले से अधिक घनिष्ठ होते जाते हैं।
"लन्दन में हिन्दी" की सुखद स्थिति और लोकप्रियता देखकर, मुझे बहुत गर्व हुआ। वर्षों पहले, रूस का "हिन्दी प्रेम" सर्वविदित था, पर अब लन्दन का हिन्दी के प्रति लगाव और रुचि देख कर और अधिक, ख़ुशी हुई कि हमारी हिन्दी विदेशी धरती पर भी पैर जमाने में पीछे नहीं। वह सिर्फ़ पसन्द की ही चीज़ नहीं, बल्कि बाक़ायदा विदेश में जन्मे, पले, बढ़े बच्चों द्वारा सीखी जाती है। बच्चों का हिन्दी की विभिन्न प्रतियोगिताओ में भाग लेना, पुरस्कार पाना, यहाँ तक कि भारत की नि:शुल्क यात्रा का अवसर मिलना, उन्हें हिन्दी के निकट लाता है। हिन्दी के जानकार, बड़े शौक से लन्दन के भारतीय मूल व विदेशी मूल के बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा देते हैं। अनेक संस्थान "सामुदायिक भवन" अथवा मन्दिरों में हिन्दी की कक्षाएँ लगाते हैं। यह सच में, हिन्दी के विकास और प्रगति की एक बेहतर स्थिति और भविष्य के प्रति आशान्वित करती है।
"लन्दन का वीआईपी कल्चर", इस आलेख ने मुझे बहुत प्रभावित किया। कितनी काबिलेतारीफ़ बात है कि लन्दन में सांसद, मेयर आदि वीआईपी पद और क़द के लोग आम आदमी की तरह मेट्रो से सफ़र करते हैं, साइकिल से ऑफ़िस जाते हैं। टिकिट विन्डो और कॉफ़ी शॉप पर टिकिट और कॉफ़ी लेने के लिए लाइन में लगते हैं। जबकि हमारे भारत में, जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र है - वहाँ प्रधानमन्त्री से लेकर, सांसद, विधायक तक, लाल बत्ती वाली कार से नीचे पैर नहीं रखते, पैदल चलना या मैट्रो में जाना-आना, ट्रेन में सफ़र करना तो जैसे उनके लिए बहुत बड़ी मानहानि होती है। यूके के प्रधानमंत्री डेविड कैमेरॉन जब मेट्रो से ऑफ़िस गए, तो यह सोशल मीडिया में ख़ासा चर्चा का विषय रहा।
"आपकी सुरक्षा आपके हाथ" लेख में लन्दन की युगों पुरानी उदात्त सभ्यता और सँस्कृति गिरती नज़र आई। सड़क पर चलते "वरिष्ठ नागरिकों" का सम्मान, उन्हें बाइज़्ज़त रास्ता देना, उनके लिए अपनी गाड़ी रोक कर, पहले निकलने देना, रेड लाइट होने पर, धैर्य से प्रतीक्षा करना, बिना बात हार्न न बजाना। पर अब सब बदल गया है। अब तो अकेले पार्क़ में घूमने पर इंसान लगातार तनावग्रस्त रहता है कि कोई सन्दिग्ध आदमी तो पीछा नहीं कर रहा।
"पुस्तकालय ऐसे भी" आलेख लन्दन के 400 ऐसे पुस्तकालयों के बारे में बड़ी रोचक और काम की जानकारी देता है कि पुस्तकालय एक ऐसा स्रोत है, जहाँ से हर तरह की सूचना और जानकारी, हर समस्या का निदान आपको मिल सकता है।
अग़र मैं कहूँ कि यह पुस्तक, लन्दन के हवाले से योरोपीय समाज के विविध पहलुओं का "गागर में सागर" जैसा एक ज्ञानवद्र्धक ख़ज़ाना है, तो अत्युक्ति नहीं होगी। लेखिका शिखा वाष्र्णेय इस महत्वपूर्ण और उपयोगी जानकारी को जिज्ञासु पाठकों तक पहुँचाने के लिए बधाई की पात्र हैं।

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