ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
लॉन्ग मार्च का संदेश
01-Apr-2018 02:24 AM 1435     

विगत माह अखिल भारतीय किसान सभा के नेतृत्व में किसानों का लॉन्ग मार्च महाराष्ट्र सरकार के लिखित आश्वासन के बाद खत्म हो गया। हाल के बरसों में पहली बार इस तरह के विशाल आंदोलन की समाप्ति बहुत शांतिपूर्ण रही है। इसके लिए राज्य सरकार और किसान दोनों की प्रशंसा करनी होगी। जैसा कि सब जानते हैं कि मुंबई से 180 किमी दूर नासिक से चले 35 हजार से ज्यादा किसानों (कुछ रिपोर्टों के मुताबिक 50,000) ने यह रास्ता तपती धूप में नंगे पैर तय किया था। हालांकि मुंबई पहुंचते-पहुंचते उनके पैरों में छाले पड़ गए लेकिन बूढ़े से बूढ़े किसान, महिला हों या पुरुष, अपनी आवाज सत्ता तक पहुंचाने के लिए जिस शांति और धैर्य का प्रदर्शन किया, उसकी जितनी प्रशंसा हो वो कम ही होगी।
आश्चर्य इस बात का है कि महाराष्ट्र सरकार ने इस आंदोलन के समाधान पर तत्परता से ध्यान केन्द्रित क्यों नहीं किया। यह बात इसलिए भी अहम है क्योंकि पिछले साल भी इसी समस्या को लेकर महाराष्ट्र के किसान नासिक में इकट्ठा हुए थे। ऐसे में सरकार से ज्यादा संवेदनशीलता की अपेक्षा थी। लेकिन लगता है कि सरकार उसे निभाने में चूक गई। अतीत के अनुभव बताते हैं कि महानगरों में पहुंचकर ऐसे आंदोलन प्रायः हिंसक हो जाते हैं हालांकि इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ। लेकिन ये आंदोलन जितनी शांति से मुंबई में खत्म हुई वो उतनी ही आसानी से नासिक या 180 किमी के रास्ते में कहीं भी खत्म हो सकते थे। ऐसी स्थिति में सरकार, आंदोलनकारी किसानों और आम लोगों को जो कठिनाई उठानी पड़ी, उसकी नौबत ही नहीं आती।
इतने कम दिनों में विकसित इस आंदोलन की विशालता से पता चलता है कि सरकार और शहरों में निवास करने वाली अधिसंख्य आबादी विकास की प्राथमिकता की गड़बड़ी को ठीक से नहीं समझती। मूलतः खेती-किसानी के लिए केंद्र सरकार के आधे दर्जन से अधिक मंत्रालयों ही नहीं बल्कि राज्य सरकारों की भी अहम भूमिका है क्योंकि खेती राज्य के अधिकार क्षेत्र में आता है। लेकिन जिम्मेदारी के विभाजनों में बंटे होने और उदारीकरण के बाद शहर और कॉर्पोरेट केन्द्रित विकास नीति की प्राथमिकता ने किसानों की समस्याओं पर से सबका ध्यान हटा दिया है। स्वयं ग्रामीण आबादी का एक बड़ा हिस्सा जल्द से जल्द खेती-किसानी छोड़ शहर और कॉर्पोरेट की दुनिया को अपनाना चाहता है इसलिए बीते तीन दशकों में इस बारे में बहुत ज्यादा बातें नहीं हुईं। पर 2008 की अमेरिकी आर्थिक संकट के बाद शहर और कॉर्पोरेट को लेकर भी ग्रामीण आबादी के अनेक तबकों में फिर से अपने मूल पेशे के प्रति सोच में बदलाव आया है और वे उसकी उन्नति और वृद्धि के बारे में सोचने लगे हैं। पर शहर और कॉर्पोरेट इंडिया अब भी अपनी डफली पुराने अंदाज में बजा रहा है। इसलिए बीते दो-तीन सालों से किसानों के आंदोलनों में तेजी देखने को मिल रही है।
ज्ञात हो कि पिछले साल के मई-जून में हुए किसान आंदोलन खराब मौसम से पीड़ित मध्य प्रदेश, पश्चिम महाराष्ट्र, राजस्थान के शेखावत और तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा स्थित बड़े व संपन्न किसानों का आंदोलन था, जबकि इस बार का आंदोलन उत्तरी महाराष्ट्र के नासिक, धुले, ठाणे, पालघाट और नन्दुबार जिलों के गरीब आदिवासी किसानों का आंदोलन था जो कई पीढ़ियों से वन विभाग की भूमि पर बगैर पट्टे के खेती करते हैं और वन विभाग के अधिकारियों के रहमो-करम पर आश्रित हैं। जहां पिछला किसान आंदोलन नोटबंदी से उत्पन्न कैश की कमी और बड़े पैमाने पर उत्पादित खाद्य उत्पादों के दामों में बड़ी गिरावट से जनित थी। यह आंदोलन मूलतः खेती के जोतों के स्थायी पट्टे के लिए आयोजित थे। हालांकि ऊपरी तौर पर देखने पर इनकी मांगों में देश के अन्य भागों के किसानों की समस्याएं ही नजर आती हैं।
इस बार की समस्या मूलतः ऐसे आदिवासी किसानों की है जो बरसों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी तकनीकी रूप से वन विभाग के रूप में दर्ज जमीन पर खेती कर रहे हैं। पर भूमि पर स्वामित्व नहीं होने के कारण न तो वे किसी सरकारी सहायता के लाभ के पात्र हैं और न ही जोत की भूमि के विकास के लिए वे किसी सरकारी बैंकों से कर्ज ले सकते हैं। ऐसे में वे अपनी खेती के लिए निजी महाजनों के मुंह जोहते हैं। उधर उन्हें वन विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों को भी खुश करना पड़ता है जिससे कई बार उनकी हालत बटाईदारों किसानों से भी बुरी हो जाती है। हालांकि इस आंदोलन की पूरी देश के मीडिया ने पूरजोर ढंग से कवर किया फिर भी अधिकांश समाचारों में आदिवासी किसानों की समस्या पर उस कदर ध्यान नहीं दिया गया।
ज्ञात हो कि दक्षिण महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में तो वन भूमि पर निर्भर किसानों की समस्या तो बरसों पहले निबटा दी गई थी पर नासिक और आसपास के जिलों में इस पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया। इसलिए इस आंदोलन में इन इलाकों के आदिवासी किसानों की बड़ी भागीदारी रही। इसलिए अब उम्मीद की जानी चाहिए कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अपने वायदे के मुताबिक अगले छह महीने में आदिवासी किसानों की जोतों की जांच करवा उनके जायज मांगों का समुचित निबटारा करा सकेंगे।

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