ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
लोक स्वयंभू होता है
08-Jul-2017 08:06 PM 2698     

बाग़, बगीचे एक योजनाबद्ध तरीके से, किसी उद्देश्य विशेष के लिए लगाए जाते हैं। उनकी सार-सँभाल और विशेष व्यवस्था करनी होती है। वे किसी कारणवश नष्ट भी हो सकते हैं लेकिन जंगल उगाए या लगाए नहीं जाते। वे स्वाभाविक रूप से बनते और जीवित रहते हैं, जंगलों में लगने वाली आग और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के बावजूद। इस रूपक के आधार पर हम कह सकते हैं कि लोक जिसे मोटे तौर पर एक गाँव, कबीले, ढाणी के रूप में पहचाना जा सकता है, स्वयंभू होता है। वह अपने समग्र रूप में आत्मनिर्भर होता है और इकाइयों के रूप में कहें तो सब एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। यह अंतरनिर्भरता उन्हें जोड़ती है। यही उनकी शक्ति है और इसी में उनकी एकता भी छुपी है। गाँव का महाजन किसान का आत्महत्या कर लेने की सीमा तक शोषण नहीं करता था, क्योंकि वह जानता था कि उसे इसी गाय को अनंत काल तक दुहना है। कोई भी अपने पालतू जानवर तक पर इतना गुस्सा नहीं करता कि उसे मार ही डाले क्योंकि वह उसकी संपत्ति और आय का साधन है। व्यापारी के लिए भी किसान और मजदूर महत्त्वपूर्ण थे क्योंकि उनके बल पर ही उसका व्यापार चलता था। ऐसे में मजदूर और किसान अपने श्रम के मालिक होते थे। इसीलिए खेती को सर्वोत्तम पेशा माना जाता था।
यंत्रीकरण के कारण जो पशु, गुलाम या किसान-मजदूर कभी उपयोगी और मूल्यवान संपत्ति लगते थे उनका काम जब यंत्रों से लिया जाने लगा तो गुलाम-प्रथा लाभप्रद नहीं रही। जिंदा मजदूर दोनों समय खाने को माँगेगा। बैल को जब गाड़ी या हल में नहीं जोतो तब भी उसे खाने को तो चाहिए। लेकिन आज आप अनाज जहाँ से भी सस्ता मिले मँगवा सकते हैं। ऐसी स्थिति या परिस्थिति में गोरे अमरीकी मालिकों के लिए, कभी ऊँचे दाम देकर ख़रीदे गए महत्त्वपूर्ण संसाधन काले गुलाम "व्हाईट मैन्स बर्डन" हो गए।
पहले जब गाँव बसते थे तो धीरे-धीरे करके सभी तरह के कारीगर, मजदूर, पंडित-मुल्ला, व्यापारी सब एक-एक करके जुट जाते थे। इन सबसे मिलकर ही गाँव का स्वरूप पूर्ण होता था। सबके अपने-अपने मोहल्ले होते थे और सबके अपने-अपने चौधरी या पंच भी। सबके अपने कुएँ, चौपाल, धर्मशालाएँ और पूजास्थल। फिर भी किसी के भी समारोह-उत्सव सुख-दुःख में सबकी भागीदारी होती थी। सभी कर्मकांडों में कुआँ, कुम्हार के चाक का पूजन, मालिन द्वारा सेहरा लाना, मनिहारी द्वारा चूड़ा पहनाना आदि अनेक संस्कारों में सबकी भागीदारी होती थी। और आज इफ्तार की दावत या हनुमान जी के प्रसाद तक में अपने काम के लोगों को बुलाया जाता है, लोक को नहीं। इससे उत्सवों और कर्मकांडों में अंतरनिर्भरता के स्थान पर स्वार्थपरता आ गई है।
नगर या शहर में रहने वाले या वहाँ बसने वाले अंतरनिर्भर नहीं होते। वे सब किसी और पर निर्भर होते हैं। यह "और" होता है गाँव या लोक जो उनके लिए अन्न उगाता है, दूध की आपूर्ति करता है। अब उनका संबंध सीधे खेत-गाँव से नहीं, मॉल से होता है। यद्यपि यह सब आता गाँवों से ही है। शहरों की संख्या में वृद्धि से गाँव या लोक पर दबाव बढ़ता है। अब उनका दर्द और यहाँ तक कि उनकी आत्महत्या भी नागर जनों में संवेदना नहीं जगाती। इस संबंध में एक घटना याद आती है। तब मैं दिल्ली में रहता था। गाड़ी गाँव से चलकर सुबह-सुबह दिल्ली पहुँचती थी। एक बार कोई साधन नहीं मिला तो दिल्ली केंट स्टेशन से घर के लिए पैदल ही चल पड़ा। रास्ते में चाय की एक बड़ी दुकान मिली। चाय पीने के लिए रुका। तभी एक दूधवाला आया। वह पिछले दिन नहीं आ सका था। दुकानदार ने गुस्से में कहा- "भले ही तू मर जा लेकिन मेरा दूध टाइम पर आ जाना चाहिए।" मुझे इतना बुरा लगा कि मुझसे चाय नहीं पी गई। लोक और शहर का यही संबंध रह गया है। इसी का विस्तार हम सारी दुनिया में विभिन्न क्षेत्रों में देख रहे हैं।
आज व्यापार अपने अधिकतम लाभ के लिए मजदूर और किसान के प्राण चूस लेना चाहता है, कम से कम दाम देकर अधिक से अधिक काम लेना चाहता है। तभी अमरीकी बेकारी का कारण कोई और नहीं है, बल्कि वहीं के उत्पादक हैं जो अधिकतम मुनाफे के लिए तीसरी दुनिया के देशों में अपने कारखाने लगाते हैं और वहाँ के मजदूरों का शोषण करते हैं तथा अपने मजदूरों को बेकार बनाते हैं। दुनिया में विदेशी निवेश और वैश्वीकरण का यही सच है। अमरीका के छोटे स्थानों पर किसान फार्मर्स मार्केट के नाम से आपस में मिलने का व्यक्तिगत प्रयत्न करते हैं लेकिन यह बहुत प्रभावशाली नहीं है। वहाँ के किसानों को भारत के किसानों की तरह बहुत बार अपने उत्पाद मजबूरन बहुत सस्ते बेचने पड़ते हैं। उनके लिए खेती अब पवित्र काम नहीं बल्कि न्यूनतम मजदूरी वाला अन्य कामों की तरह एक काम रह गया है।
वैसे अमरीका का निर्माण योरप के विभिन्न देशों के बंदूकधारी, साहसी और समृद्ध बनने की लालसा लेकर निकले लोगों के द्वारा किया गया है जिनका काम इस देश में बड़ी-बड़ी ज़मीनों पर कब्ज़ा करके गुलामों के द्वारा खेती करवाकर लाभ कमाना था। इसमें कहीं अंतरनिर्भरता का भाव नहीं है। इसमें मात्र स्वामित्त्व और अनंत लाभ की लालसा है। नई दुनिया के इन विजेताओं का अपना लोक पीछे छूट गया और नई भूमि पर आकर उनकी विजेता-ग्रंथि ने उन्हें यहाँ के पुराने लोक की नींव पर कोई साझा लोक विकसित नहीं करने दिया। इसीलिए अमरीका में किसी भी प्रकार का लोक का अपना भोजन, गीत-संगीत, बोली-बानी, पहनावा आदि विकसित नहीं हुए। और अब तो कोई सब कुछ बाज़ार के हाथों में चले जाने पर कोई संभावना भी नहीं बची। और मज़े की बात यह है कि उनसे प्रेरणा लेकर अपने यहाँ विकसित हो रहा नया समाज भी एकरूपता और यंत्रीकृत वस्तुओं में बदलता जा रहा है। योरप के विभिन्न देशों से यहाँ आकर बसे लोग अपने अवचेतन में जो थोड़ा बहुत लोक लेकर आए थे वह समय की गति और बाज़ार द्वारा की जा रही दुर्गति की भेंट चढ़ गया है। यह यान्त्रिक एकरूपता और मुनाफाखोरी अंततः व्यक्ति को हृदयहीन बना देती है फिर उसे प्रकृति के विनाश भी मंज़ूर हैं। वह इस दुनिया से जाने से पहले सारी प्राणवायु सोख लेना चाहता है, सारी खाद्य-सामग्री खा जाना चाहता है। उसे पर्यावरण-संरक्षण व्यर्थ लगने लग जाता है।
पहले यात्रा में कोई भी खाना खाता था तो अपने सहयात्री से भी अवश्य आग्रह करता था और साथ खाते-पीते बतियाते यात्रा एक अनुभव बन जाती थी और आज सरकार जगह-जगह चेतावनी प्रसारित और प्रचारित करती है कि किसी अनजान आदमी द्वारा दी गई खाद्य सामग्री न लें। ऐसे में लोक के निश्छल संबंधों और अंतरनिर्भर जीवन की क्या बात की जाए? इन हालात पर एक शे"र मुलाहिज़ा फरमाएँ-
धूप, हवा, पानी बेचेगा
अब राजा है बनिया, भगतो।
क्या व्यापार की इस सर्वग्रासी मानसिकता में कोई खरीददार (लोक) भी बचेगा या नहीं? यदि नहीं बचेगा तो इस परजीवी वर्ग का क्या होगा?
शायद तब फिर मजबूरी में ही सही, "लोक" विकसित हो क्योंकि हमारे ऋषियों ने तो इस समस्त पृथ्वी को ही लोक कहा था और जो नहीं दिखता उसको भी परलोक कहा था।

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