ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
लोक में कबीर
01-Jun-2016 12:00 AM 2763     

बुन्देली

नैहर खेल लेव चार दिन चारी
पैले लुबउवा तीन जनें आये, नाई बामन बारी।
बाँह पकर माता सें बोली, अबकी गवन देव टारी।।
दुजे लुबउवा ससुर जू आये, कर घोड़ा असवारी।
बाँह पकर बाबुल सें बोली, अबकी गवन देव टारी।।
तीजे लुबउवा सैयाँ जू आये, संग में चार कहारी।
बाँह पकर भौजी सें बोली, करो गवन की तय्यारी।।
मिलनें होय तो मिल लेव सखी री, अब न भेंट हमारी।
घर छूटो वारो अंगना छूटो, छूटे बाप मतारी।।
कहे कबीर सुनो भाई साधो, सतगुर की बलिहारी।।

बघेली

मानुस देही पाइ कै अंधरा,
फिरइ करम केर बाँधा...
माया मोह जरै सब आगी
ता संग जरसि कउन रस लागी
मानुस देही पाइ कै अंधरा...
साध संगत कर मोर भाई
राम नाम ले मोर भाई
राम नाम हय तारन हारा
काहे फिरइ कम केर बांधा...

मालवी

माया ऐसी डाकनी काट कलेजा खाय।
वेद विचारा क्या करें कहाँ तक दवा लगाय।।
ज्ञान की जड़ियां दई मोरे सतगुरु ने,
ज्ञान की जड़ियां दई।। टेक।।
काया नगर माही घर एक बंगलों,
ता बीच गुपत धरी।।
पाँच नाग और पच्चीस नागणि
सूँघत तुरत मरी।।
इणी काली ने भाई सब जग खाया
सतगुरु देख डरी।।
कहे कबीर सुणों भाई साधो
ले परिवार तिरी।।

निमाड़ी

जल में ही मरत पियासा, धोबिया जल में ही मरत पियासा।
जल ही में ठाड़ो पीवत नहीं मूरख, है सुन्दर जल खासा।।
पठायो संदे¶ाो घर अपणे को, करे धोवन की आसा।
आप ही धोवे, आप ही रोवे, आप ही करत तमासा।।
आप ही पड़े कर्म के व¶ा में, अपने हाथ का फाँसा।
साबुन ग्यान लेत नहीं मूरख, है संतन के पासा।
दाग पुराना छूटत नहीं, रहा विसय रस माता।।
आप ही साहब ख्याल खिलावे, आप ही करत तमासा।।
कहे कबीर दाग जब छूटे, करे सतगुरु की आसा।।

राजस्थानी

नाम सुमिर पछताएगा रे।
पापी जियरा लोभ करत है, आज काल उठि जाएगा रे।।
लालच लागी जनम गवाँया, माया भरम भुलायेगा रे।।
धन यौवन का गर्व ना कीज्ये, कागज ज्यों गल जाएगा रे।।
जब यम आये केस तेरे पकड़े, ता दिन कछु न बसायेगा रे।।
सुमिरिन भजन दया नहीं कीन्ही, क्या मुख लेके जाएगा रे।।
धर्मराज जब लेखा मांगे, तब मुख चांटा खाएगा रे।।
कहत कबीरा सुना भाई साधो, साध संगत तर जाएगा रे।।

छत्तीसगढ़ी

डर लागे और हांसी आवे अजब जमाना आया रे।
धन दौलत ले माल खजाना बेसिया नाच नचाया रे।
मुट्ठी अन साधु कोई मांगे कहे नाज नहीं आया रे।
कथा होय तहाँ सोजा सोंवय वक्ता मूड़ पचाया रे।
होय जहाँ कहीं स्वांग तमासा तनिक न नींद सताया रे।
भांग तमाखू सुलफा गांजा सुख्या खूब उड़ाया रे।
गुरु चरनामृत नेम न धारे मधुवा चाखन जाया रे।
उल्टी चलन चली दुनियाँ में तासे जी घबराया रे।
कहे कबरी सुनो भई साधो का पाछे पछताया रे।

भोजपुरी

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो।
चन्दन काठ के बनल खटोलवा,
तापर दुलहिन सूतल हो।
उठ री सखी मोर मांग मरोरी
दुलहा मोसे रूसल हो।
चारि जने मिली खाट उठाये,
चहुं दिसि धू-धू उठत हो।
कहत कबीर सुनो भाई साधो
जग से नाता टूटल हो।

मैथिली

चुनरी पहिरी हम चलली बजरिया
ताहि बिच लगलै किनरवा हे बलमुआ
सत्-सुकृत एहो चुनरिया
तहि बिच लगलै किनरवा रे बलमुआ।
तोरा देसवा में।

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