ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
लोक का आँगन
CATEGORY : लोक-स्मृति 01-Mar-2017 08:03 PM 682
लोक का आँगन

लोक अनंत भी है और आँगन भी। वह अनन्त को आँगन में उतार लेता है और घर के आँगन से ही अनंत की यात्रा करता है। लोक में ही यह शक्ति है कि वह आवाहन न जानते हुये भी सारे देवताओं को एक छोटा-सा चौक पूरकर उसमें प्रतिष्ठित कर सकता है। लोक में ही साहस है कि वह देवता को प्रतिष्ठित करके उसे चाहे जब नदी में सिरा दे और विसर्जित करते हुए यह आश्वासन भी दे सके कि अगले वर्ष फिर बुलायेंगे। ऊपर-ऊपर से देखने पर लगता है कि लोक मोहग्रस्त है, हमेशा अपने दुखड़े रोता रहता है। पर वह निष्ठुर भी है। वह समय की नदी में अपने देवताओं और उनसे जुड़े हुए दुखों को रोज बहाया करता है। अगर बहाता नहीं, तो लोक कब का मर चुका होता।
अनन्त के साथ अपने घर के छोटे-से आँगन में जीने की कला को ही लोक कला कहना चाहिए। इस आँगन में बैठकर ही लोक जगत समीक्षा करता है और लोककण्ठ से गीत फूटते हैं, गाथाएँ झरती हैं। लोक ही देवत्व का आख्यानकर्ता है। वही उसे बनाता है और मिटाता है। लोक रचना की प्रक्रिया बहुत धीमी होती है। लोक तो सदियों तक मन में घोल-घोलकर रचता रहता है। रचकर संशोधन भी करता चलता है, तभी तो लोकगाथाएँ सदियों तक अमर बनी रहती हैं।
लोक एक मण्डप है बाँसों और पत्तियों से बना हुआ। जिसके चारों तरफ आम के पत्तों के वन्दनवार झूलते हैं। पताकाएं फहराती हैं। इस छोटे-से मण्डप में अंतरिक्ष के मेहमानों को आमंत्रित कर लोक उनसे सम्वाद करता है। वह एक वेदी रचता है और धुएँ की लकीरों पर सवार देवता दौड़े चले आते हैं। लोक अपने आपको होम करने के लिए आतुर है जिससे कि उसे बार-बार रचा जा सके।
लोक को जो मिला है वह उसी में गुजारा करता है। उसे माटी मिली हुई है तो उसी को जोत लेता है। उसी में हल चलाकर कोई न कोई हल निकाल ही लेता है। उसी माटी से अपने बर्तन बना लेता है, चूल्हा और घर बना लेता है। लोक देवता तो कच्ची मिट्टी के ही होते हैं। जिन्हें वह कभी अकेला नहीं छोड़ता। रोज उनके माटी के चबूतरे पर एक दिया जला आता है। उन्हें कोई छोटी-सी गाथा सुना आता है। सुमिरन की कड़ियों को बार-बार दुहराता है।
लोक ही है जो देवताओं को घास-पूस की कुटिया में ले आता है। उन्हें रैया, दिलरी, फाग सुनाता है। कजरी और बिरहा गाता है। घी चुपड़ी गाँकर का भोग लगाता है। जहाँ गोखुर की धूल से लथपथ गौओं के गले में लटकी घण्टियों की आवाज़ सुनते देवता किसी घने बरगद की छाँव में विराजते हैं। उन पर गिलहरियाँ दौड़ती हैं। बूढ़े बरगद की जटाओं में गाँठ बाँधकर फटा अँगरखा पहने बच्चे प्रसन्न झूलते हैं।
भरी बरसात में झुकी-सी दालान या किसी छपरी में ढुलकिया बजने लगती है। मंजीरे झनझना उठते हैं। कोई देवी की भक्तें गाने लगता है। दूर कहीं मैया के मंदिर में टिमकी टिमकने लगती है। खंजड़ियाँ खनक उठती हैं। फिर रात-रात भर आल्हा जमता है। पंछी अपने-अपने घोंसलों में चुपचाप बैठे रहते हैं। उनकी बारी भोर होने पर आती है। लोक में कोई चुप नहीं रहता। सब अपनी बारी आने पर गाते हैं। जैसे ऋतुएँ बदलती हैं।
लोक एक पगडण्डी है जिस पर सब अपनी-अपनी राह चलते हैं। जिसे जो जी में आता है सो खोजता है। काठी गायक दक्ष प्रजापति की कन्या सती के बिखरे हुए अंगों को खोजने निकल पड़ते हैं। कोई काँवड़िया एक सरोवर से जल उठाकर किसी दूसरे सरोवर को भरने के लिए चल देता है। कोई वसुदेवा बड़े सबेरे दान की महिमा सुनाने निकल पड़ता है। कोई नाथपंथी राजा भर्तृहरि का विराग गुनगुनाने लगता है। भोर होते ही अँगना में राम दुलैया के कँगना खनकते हैं।
हँसिया, खुरपी और फावड़े लेकर लोक धरती को गोड़ने चल पड़ता है। चरवाहे अपनी-अपनी कबरी और धौरी गौओं को लिए एक-दूसरे को टेर लगाते हुए वनों की ओर निकल पड़ते हैं और जब साँझ ढलने पर सूरज अंतरिक्ष में अदिति की गौएँ हाँकता हुआ ढल रहा होता है, उसी बेला में चरवाहे भी गो दुहनी के लिए लौट आते हैं।
चन्द्रमा को देखकर लगता है वह एक पारदर्शी बर्तन है जिसमें सूरज अपनी गौओं का दूध दुहकर अंतरिक्ष के छींके पर लटका देता है। पूरी आकाश गंगा में छिटका हुआ माखन झिलमिलाने लगता है। रात गोरी लगने लगती है। लोक गोरस की मटकी में अपने आपको रोज मथता है। लोक एक बछड़े जैसा है जिसे भोर होते ही सुरहन गैया रँभाकर जगाती है। लोक ही महिष है जिस पर यम सवारी करते हैं। लोक जीवन और मृत्यु-दोनों को पालता है तभी तो कारसदेव के बाड़े में गाय और भैसें साथ बैठकर जुगाली करती हैं। लोक ही ममता से भरी हुई हिरणी है और लोक ही शिकारी है।
लोक हजारों साल पुरानी गुफा की तरह है। भीमबैठका की गुफाओं में झाँको तो इन गुफाओं की भित्तियों पर एक आदि आख्यान पट उभरता दिखाई देता है। जो साँची की गलियों से होता हुआ खजुराहो तक जाता है। पत्थर पर आख्यान उकेरने की परम्परा अति प्राचीन है। पर खजुराहो में वह पूर्णता प्राप्त करती है। खजुराहो के मंदिरों में भारतीय देव परिवार के विकास की झाँकी जीवन के उच्चतम धरातल पर दिखायी देती है-- मत्स्य से लेकर कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, बलराम और कल्कि अवतारों को विष्णु के व्यक्तित्व में गूँथ दिया गया है। विष्णु ही छोटे से वामन हैं जो पूरे अंतरिक्ष को आदित्य रूप से तीन पगों में नाप लेते हैं। ध्यान दें तो ब्रह्मा जीवन की भोर हैं और विष्णु जीवन की तपती हुई दुपहर और शिव श्याम रंग में डूबी संध्या। सूर्य और भू-देवी खजुराहो के प्रतिमा दर्शन के केंद्र में हैं।
खजुराहो में जीवन का आख्यान करती शार्दुल प्रतिमाएँ जो कहीं वराह, कहीं सिंह, कहीं अश्व और कहीं मेढ़ा, हिरण और बैल आदि के चेहरों को धारण किए हुए हैं। उन्हें देखकर बृहदारण्यकोपनिषद में मिथुन के द्वारा प्रपंच सृष्टि का प्रसंग याद आता है जिसमें मनु ही शतरूपा प्रकृति से भिन्न-भिन्न रूपों में सम्भोगरत हैं। खजुराहो के मंदिरों पर शतरूपा प्रकृति और उसकी टोह लेते मनु ही तो छाये हुए हैं। मंदिरों के गुम्बदों पर नये-नये चेहरे बदलता यह शार्दूल और कोई नहीं, मनु ही है जो देहेन्द्रियों में मन की तरह रहता है। जो अपने से अपने को भोगता है।
खजुराहो के मंदिर लोक के इसी चरित का आख्यान करते हैं

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