ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
लोक-बोली के निहितार्थ
CATEGORY : सम्पादकीय 01-Mar-2017 07:58 PM 679
लोक-बोली के निहितार्थ

भारत में लोक शब्द बहुअर्थी है। यहां की पुराण कथाओं में चौदह लोकों की परिकल्पना की गई है। जिनमें पृथ्वी, आकाश और पाताल लोक भी शामिल हैं। लोक का एक अर्थ उस व्यापक बहुरंगी जीवन से भी है जिसकी सदियों पुरानी अनुभव सम्पदा से लोक संस्कृतियों का निर्माण होता आया है। आधुनिक लोग लोक को जनपदीय, आँचलिक और ग्रामीण दुनिया से जोड़कर देखा करते हैं और नगरीय जीवन को उससे अलग करते हैं। शायद इसी कारण ग्रामीण संस्कृति से जुड़े हुए वाचिक साहित्य को लोक साहित्य कहा जाने लगा। प्रायः यह साहित्य लिखा नहीं जाता रहा है। बल्कि यह भारत की विभिन्न बोलियों में रची-बसी लोक संस्कृति की स्मृति में बसा रहा है। और आज भी यह स्मृति पूरी तरह खो नहीं गई है। यही नहीं लोक साहित्य लिखित रूप में भी प्राप्त होता है और आधुनिक समय में तो अब वह दस्तावेजों में भी उपलब्ध होने लगा है।
लोक साहित्य का संबंध मूलतः विभिन्न बोलियों से ही है। इन्हीं में से अनेक बोलियों में से हिंदी की खड़ी बोली भी बनती गई है। अगर मानव जीवन के अतीत पर दृष्टि डालें तो यह सहज ही अनुभव में आता है कि बोली पहले बनती है। जब मनुष्य नहीं होगा तो पक्षियों की बोली तो बनी ही होगी। मनुष्य के समाज सदियों से अपने स्थानीय अनुभवों के आधार पर शब्दों को गढ़ते रहे हैं और बोलियां बनती चली आई हैं। अक्सर बोलियों का कोई व्याकरण भी नहीं बन पाता है। जब बोलियां किसी एक भाषा में या कहें एक नागर भाषा में ढाली जाने लगती हैं तब उस भाषा का व्याकरण भी संभव होता है। शब्दकोषों में शब्दों के अर्थ स्थायी होने लगते हैं, जबकि वे बोलियों में कुछ अधिक बहुरंगी छबियों वाले होते आये हैं।
दुनिया जानती है कि भारत में ज्ञान की भाषा संस्कृत रही और उस ज्ञान पर एक सीमित समाज का अधिकार भी रहा। वह ज्ञान संस्कृत के माध्यम से सीधे भारत के ग्रामीण जीवन तक नहीं पहुँचा, उसे तो बोलियां अपने आँचल में छिपाकर ले गईं और वह ज्ञान लोगों की मातृबोलियों में सदियों तक घुलता रहा। उस ज्ञान के लोक गीत बनते चले गये। वेद, उपनिषद, पुराण, ये सब ज्ञान ग्रंथ भारत की विभिन्न अंचलों की बोलियों में उनके लोक गीतों में बस कर आज भी जीवन का हिस्सा बने हुए हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक, जीवन के सभी संस्कारों में भारतीय ज्ञान लोक गीतों में बस कर जीवन पर छाया हुआ है।
अगर अध्येता गौर करें तो भारत का लोक साहित्य एक तरह से भक्ति और श्रृंगार का साहित्य ही अधिक है। मीरा, सूरदास, तुलसीदास और केशवदास आदि कवि अपने-अपने अंचल की लोक बोलियों का सहारा लेकर भक्ति और जीवन के श्रृंगार-सौन्दर्य को अपनी महानतम कविताओं में रचते रहे।
हम इस दुर्भाग्य को भी अब न भूलें कि पिछले दो सौ बरसों में हम भारत ही नहीं पूरे विश्व में बोलियों की मृत्यु की घोषणा सुनते आये हैं। पिछले दिनों किसी एक बोली के व्यक्ति के मरने की खबर आई थी जो उस बोली को बोलने वाला आखिरी व्यक्ति था। आज की दुनिया विश्व बाजारों में दौड़ते हुए बाजार की ही भाषा में अब बोल रही है और भाषाएँ भी बाजार की भाषाएं बन रही हैं। बोलियों की तो कौन कहे। इसी चिंता से भरकर हमने हिंदी के लोक साहित्य का स्मरण करते हुए सांकेतिक रूप से ही सही एक छोटे से विशिष्ट अंक का यह आयोजन किया है।
इस अंक में हिंदी के कुछ प्रतिष्ठित लेखकों के लेख, महान कवियों की कुछ कविताएँ तो हैं ही, इसी के साथ सिसली में शहतूत को चुनते हुए स्त्रियां जो लोक गीत गाती थीं, उनका एक चयन भी यहां दिया गया है। संभवतः सिसली में लोकगीतों की यह परम्परा 13वीं शताब्दी के आसपास से मिलती है। इसी अंक में चीन की लोकभाषा के कुछ लोक गीतों के अनुवाद भी शामिल है।
संभवतः संपूर्ण विश्व के लोक साहित्य पर एक अभिलेख तैयार करना अत्यंत कठिन काम है पर हम जिस समय में रह रहे हैं उसमें उसकी याद ही बनी रहे तो यही क्या कम है।

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