ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कथा सम्राट प्रेमचन्द से अल्प असहमति
01-Feb-2018 10:38 AM 2179     

हिन्दी साहित्य से परिचित भला ऐसा कौन व्यक्ति होगा, जिसके मन में महान कथाकार प्रेमचन्द के प्रति असीम आदर न हो। मेरा भी है परन्तु उनकी कुछेक रचनाएं, कतिपय चरित्र-चित्रण खटकते रहे हैं लम्बे समय से...
उनकी प्रसिद्ध कहानी "कफन" को लीजिए। प्रमुख पात्र, बाप बेटे, निम्न वर्ग के हैं - धीसू और माधव। दोनों कंगाल और चोटी के निकम्मे। बहानेबाजी और झूठ बोलने में उस्ताद। प्रेमचन्द जी ने इस अत्यन्त रोचक और यथार्थपरक कहानी में इन पात्रों का चित्रण न केवल सहानुभूति के साथ किया है, बल्कि उनकी काहिली और चालबाजियों को महिमामंडित भी कर दिया है, यह लिखकर कि ये दोनों कम से कम उन "विचारशून्य" परिश्रमी किसानों जैसे तो नहीं है जिनका "बेजा फायदा" उच्च वर्ग ("बैठकबाजों की मंडली") के लोग उठाते हैं।
अपने जीवन के अन्तिम 10-12 वर्षों में प्रेमचन्द जी स्वयं एक छोटे से पूंजीपति बन गए थे, बनारस में निजी "सरस्वती प्रेस" खोल कर। उसमें कई कर्मचारी थे। यदि उनमें कोई धीसू और माधव जैसा होता (एक दिन आया और दो दिन नदारद, काम किया भी तो अधूरा, किसी प्रश्न का सीधा उत्तर नहीं) तो प्रेमचन्द जी क्या सहानुभूति करते ऐसे व्यक्ति से? कितने दिन सहन करते उसे? संभवतः दो तीन माह से अधिक नहीं।
पर यदि वे "कफन" में व्यक्त अपने विचारों को शिरोधार्य करते, तो उस अयोग्य कर्मचारी की पीठ थपथपाते कहते - "शाबास, बहुत अच्छे! तुम्हारी कामचोरी के कारण मैं तुम्हारा अनुचित लाभ नहीं उठा पा रहा हूँ। तुम विचारवान हो।" उनका प्रेस यूँ ही घाटे में चलता था। ऐसा करने लगते, तो उसके ठप्प होने में देर न लगती।
संक्षेप में, "कफन" कहानी में दो निरीह पात्रों का संवेदनापूर्ण चित्रण तो समझ में आता है, हृदयस्पर्शी भी है, पर उनके निठल्ले, निर्दयी और दायित्वहीन व्यवहार की पक्षधरता करते हुए लेखक ने कहानी के बीच एक परिच्छेद में जो उपर्युक्त "सम्पादकीय" टिप्पणी लिखी है वह शायद काल की कसौटी पर खरी न उतरे।
प्रेमचन्द यथार्थ के अप्रतिम चितेरे के रूप में जितने जाने जाते हैं उतने ही जाने जाते हैं अपनी आदर्शवादी रुझान के लिए। पर यह कहानी आदर्शोन्मुखी न होकर, अराजकता को प्रश्रय देती लगती हैं, उस लम्बी टिप्पणी के कारण।
प्रेमचन्द जी लगभग एक वर्ष के लिए बम्बई फिल्म उद्योग से जुड़े, जहाँ उन्होंने "मजदूर" फिल्म के संवाद लिखे। सरकारी प्रतिबन्ध के कारण यह फिल्म केवल उत्तरी भारत में दिखाई गई। पर श्रमिकों पर इतनी प्रभावकारी थी कि पुलिस बुलानी पड़ी एक स्थान पर।
दुर्योग कुछ ऐसा कि इसी समय बनारस में उनके अपने प्रेस की हालत इतनी खस्ता हो गई कि तीन महीने से मजदूरों को वेतन न मिला। उन्होंने हड़ताल कर दी। प्रेमचन्द जी स्वयं "हृदयहीन" पूंजीपति जैसे दिखे कुछ दिन।
पर इसके थोड़े समय बाद, अपने जीवन के अन्तिम वर्ष में लिखे, प्रसिद्ध निबंध "महाजनी सभ्यता" में उन्होंने "नारकीय महाजनवाद या पूंजीवाद" को भरपूर कोसा है। देखिए लेख के प्रारम्भ में व्यक्त उनके ठेठ माक्र्सवादी विचार :
"आज दुनिया में महाजनों का ही राज्य है। मनुष्य समाज दो भागों में बँट गया है। बड़ा हिस्सा तो मरने और खपने वालों का है, और बहुत ही छोटा हिस्सा उन लोगों का, जो अपनी शक्ति और प्रभाव से बड़े समुदाय को बस में किए हुए हैं। इन्हें इस बड़े भाग के साथ किसी तरह की हमदर्दी नहीं... उस का अस्तित्व केवल इसलिए है कि अपने मालिकों के लिए पसीना बहाए, खून गिराए और चुपचाप इस दुनिया से विदा हो जाय।"
दूसरे शब्दों में, सभी व्यवसायी उत्पीड़क और उनके अधीन सभी कर्मचारी उत्पीड़ित! ऐसी विचारधारा वाले यह समझते हैं कि पूंजीवाद कोई चमत्कारी वृक्ष है जिसमें पूंजी निवेश करने के कुछ समय बाद स्वतः ही लाभ-रूपी फल टपकने लगते हैं। खोलो झोली और लगो बटोरने... यह भी मान लिया जाता है जिन सहायकों की मदद से पेड़ बढ़ा उनको कभी कोई यथेष्ट पारिश्रमिक नहीं देता।
यथार्थ कहीं अधिक जटिल है। बहुतेरे नए व्यवसाय, चाहे भारत हो या विदेश, एक दो वर्ष से अधिक नहीं चल पाते। पूंजी मारी जाती है, लाभ की बात ही क्या। किसी व्यवसाय को सफल बनाने के लिए पूंजी के साथ-साथ श्रम-स्वेद तो लगाना ही पड़ता है, बीसियों निर्णय भी लेने होते हैं। किस चीज का उत्पाद हो, किस मात्रा में हो, खपत हो रहे सामानों का कहाँ से और कितना खरीदें, उनकी गुणवत्ता कैसी हैं, उधार लें तो किससे कितना, ग्राहक कहाँ और कितने मिलेंगे, विज्ञापन पर कितना और कहाँ खर्च किया जाय, प्रतियोगी कौन कौन हैं, आदि आदि..। कुछ निर्णय तो इतने महत्वपूर्ण होते हैं कि यदि उनमें चूक हुई तो धंधा भँवर में जाते देर नहीं। ऐसे तथ्य एक मोहल्ले तक सीमित किसी छोटे व्यवसाय पर उतना ही लागू होते हैं जितना किसी बहु-राष्ट्रीय व्यापारिक संस्थान पर।
स्वयं प्रेमचन्द जी इन विषम वास्तविकताओं से परिचित होने लगे थे। "सरस्वती प्रेस" के सम्बन्ध में एक मित्र को उन्होंने लिखा था - "प्रेस मुझे इस कदर परीशान कर रहा है कि तंग आ गया हूँ। वह बुरा वक्त था जब मेरे सर में यह सौदाएखाम समाया... 2272 बकाया पड़े हुए हैं और इसके वसूल होने में अभी न जाने कितनी देर है। इधर मुझ पर 500 टाइप के, 400 कागज के, और 200 किराया मकान के सवार हैं... दरअसल मैंने यह झंझट मोल लेकर अपनी जान आफत में फंसाई। नहीं तो मेरे खाने-भर को बहुत काफी था।"
यदि इस महान लेखक का जीवन काल कुछ और लम्बा होता तो संभव है कि उनमें व्यवसाय प्रबंधन की दक्षता आती। इस क्षेत्र की पेचीदगियों से तो अवश्य ही वे पूरी तरह अवगत हो जाते। तब उनका वैचारिक क्षितिज और विस्तृत होता, उनका जीवन-दर्शन और निष्पक्षीय होता। वे शायद यह सोचना छोड़ते कि हर पूंजीवादी शोषक है और हर मजदूर शोषित!
निस्सन्देह प्रत्येक समाज में कुछ मुनाफाखोर व्यवसायी होते हैं जो श्रमिक वर्ग को न्यूनतम मेहनताना देना चाहते हैं पर इनका प्रतिशत उन मजदूरों से अधिक नहीं है जो कम से कम काम करके अधिक से अधिक वेतन लेना चाहें। आदर्श समाज, जिसको लाने की उत्कट आकांक्षा प्रेमचन्द जी में सदैव रही, तभी आ सकता है जब समाज के सभी वर्ग की अतियों पर अंकुश लगे।

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