ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
साहित्य, राजनीति और समाज
01-May-2019 04:19 PM 426     

उन्नीस सौ छत्तीस ईसवी से पहले भारत के हिंदी साहित्य के परिदृश्य को राजनीति से संचालित नहीं माना जाता था। 1883 ईसवी से जब भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि कवियों के नेतृत्व में हिंदी खड़ी बोली ने नयी चाल में ढलना शुरू किया तब से खड़ी बोली और उसमें रचा जा रहा हिंदी साहित्य भारतीय समाज की धरोहर बना। हिंदी साहित्य की यह धरोहर भारत के स्वतंत्रता संग्राम से एक गहरा संवेदनात्मक रिश्ता जोड़कर निर्मित हो रही थी और जिसका नेतृत्व राजनैतिक रूप से महात्मा गांधी कर रहे थे। यह वह समय था जब महावीर प्रसाद द्विवेदी 20वीं सदी की शुरूआत में "सरस्वती" नामक हिंदी साहित्य की पत्रिका निकाल रहे थे और हिंदी के व्याकरण को सुव्यवस्थित कर रहे थे। इसी सदी के शुरुआती दौर में माखनलाल चतुर्वेदी, रामधारी सिंह दिनकर, बालकृष्ण शर्मा नवीन जैसे कवियों की कविता राष्ट्र को सम्बोधित कर रही थी और जिसका संस्कार भारतीय समाज की लोक चेतना ने किया था जो अंग्रेजों की गुलामी से भारत की मुक्ति चाहती थी। इसी समय जयशंकर प्रसाद जैसे महाकवि कामायनी जैसे काव्य की रचना कर रहे थे जो आधुनिक हिंदी में मनुष्य की नियति का काव्य है। जयशंकर प्रसाद यह चिंता कर रहे थे कि वह कौन-सा मनुष्य होगा जो अपने पूर्वज मनु से चलकर आधुनिक समय में एक नयी आनंद सृष्टि को जन्म देगा। सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और महादेवी वर्मा इसी आकांक्षा से भरे हुए कवियों के रूप में सामने आये जो भारती की विजय का संगीत अपनी कविता में बुन रहे थे। हरिवंशराय बच्चन, सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय जैसे कवि दुनिया के सम्पर्क में आ रहे भारतीय समाज और उसके कवि को अपनी कविता में परख रहे थे। भारत दूसरे विश्वयुद्ध के बाद योरोप के व्यक्ति और भारतीय समाज के बीच छिड़े अंतरद्वंद्व को विभिन्न धरतलों पर परख रहा था। इसी बीच भारत में एक रूसी प्रगतिशीलता का प्रवेश हुआ। 1936 में एक प्रगतिशील लेखक सम्मेलन बुलाकर उस समय के महान कथाकार और उपन्यास सम्राट प्रेमचंद से उस सम्मेलन की अध्यक्षता करवाई गई और पहली बार कविता और साहित्य को राजनीति से जोड़ने का दुस्साहस करते हुए उसे राज्य का पिछलग्गू बनाने की कुटिल चाल भारत में चली गई। हम सब जानते हैं कि रूस की राज्य क्रांति और उसके बाद भी जो महान लेखक हुए उन्होंने रूस में कभी राजनीति का पिछलग्गू बनना स्वीकार नहीं किया और कई महान लेखक, कवि साइबेरिया की जेलों में भेजे गये। चूंकि भारत में कोई साइबेरिया नहीं था इसीलिये साहित्य के इस राजनीति प्रेरित प्रगतिशील आंदोलन ने भारत के उन हिंदी लेखकों को लगातार अकेला किया और साहित्य के परिदृश्य से बाहर रखने की कोशिश की जो भारतीय परम्परा का गहराई से अनुशीलन करते थे और 20वीं सदी में वैचारिक दुनिया में खुल रहे आधुनिक दरवाजों से आने वाली हवा को भी महसूस कर सकते थे। हिंदी में प्रगतिशील आंदोलन का परिणाम यह हुआ कि कविता समाज की नहीं रही। वह राज्य की खिलाफत में अपनी ऊर्जा खोने लगी। अनेक कवि हुए जो राज्य को तो ललकराते रहे पर समाज उनके हाथों से छूट गया। जबकि उनके मन में यह अच्छी भावना थी कि राज्य समाज को छोड़कर चल रहा है पर उनने कविता ऐसी की कि राज्य के विरोध के नाम पर खुद उनके हाथों से समाज छूट गया। भारत में नयी कविता के प्रतिमान आये, लेकिन कविता के पहले के प्रतिमानों को कोई इतनी आसानी से धूमिल नहीं कर सकता था। यह भी कहा जा सकता है कि भारतीय काव्य शास्त्र में जो कविता के प्रतिमान स्थापित किये गये हैं उनको दुनिया की कोई प्रगतिशीलता अनदेखा नहीं कर सकती, लिहाजा उसने इन प्रतिमानों की अवहेलना करके भारत में सिर्फ हिंदी ही नहीं दूसरी भारतीय भाषाओं की साहित्य रचना को भी विकृति के गर्त में धकेल दिया है। हिंदी के बाद अगर किसी भाषा का साहित्य प्रगतिशील दुर्गति का शिकार हुआ है तो मराठी भाषा है। कमोबेश दूसरी भाषाओं में भी इस प्रगतिशील साहित्य परियोजना ने भी अपनी जड़ें जमाने की कोशिश की पर वह विफल रही। रूस की राजनीति भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों के माध्यम से ही चलती रही है और इन दलों में पहले माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और बाद में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ने इस देश के केवल साहित्यकारों को ही नहीं नाटककारों और चित्रकारों को भी अपनी गिरफ्त में लेने की कोशिश की। एक ऐसा राजनैतिक यथार्थ भारत के पारम्परिक समाज पर आरोपित करने की कोशिश की गई जिसका मनुष्य के जीवन से तो उतना नहीं, शासकों के जीवन से गहरा सम्बन्ध था। संसार हमेशा यह कामना करता रहा है कि मनुष्य का जीवन अपने शासकों के जीवन को निर्धारित करे पर पूंजीवाद और माक्र्सवाद के द्वंद्व ने दुनिया में यह हालत पैदा कर दी कि हर तरह का राज्य अब मनुष्य की नियति का निर्धारण करता है। कहने को तो दुनिया के बहुत से देशों में लोकतंत्र है बहुत कम ऐसे देश हैं जो तानाशाही या सामंती गिरफ्त में है, पर शासकों का स्वभाव नहीं बदला है वे लोकतंत्र की चदरिया ओढ़कर भी सामंती बने रह सकते हैं। वे लोकतंत्र के मुखौटे में तानाशाह भी हो सकते हैं। वे एक ऐसे लोकतंत्र का बहाना बनाये रह सकते हैं जो मुट्ठीभर विश्व पूंजीपतियों का समर्थन करते हुए पृथ्वी पर फैले दो-ढाई अरब असहाय जीवन को बेहाल किये रह सकते हैं और उसे अपनी मौत मर जाने पर छोड़ भी सकते हैं। आज जब हम हिंदी ही नहीं विश्व साहित्य की चिंता करते हैं तो यह भरोसा होता है कि साहित्य में ही वह गुण है जो राजनीति के द्वारा पृथ्वी पर रचे गये नर्क की समीक्षा कर सकता है। स्वर्ग, धर्म और राजनीति में एक भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं। कोई एक राबिया नाम की संत थी जो सूफी सम्प्रदाय से आती थी वह एक दिन अपने एक हाथ में आग और दूसरे हाथ में पानी लेकर चली जा रही थी लोगों ने पूछा कि राबिया तुम ये एक हाथ में आग और एक हाथ में पानी लेकर कहां जा रही हो तब वह राबिया बोली कि मैं इस आग से जन्नत को जला देना चाहती हूँ और पानी से दोजख की आग को ठंडी कर देना चाहती हूँ। जिससे कि आदमी जन्नत के लालच और दोजख के डर में न रहे। साहित्य इसी बेचैनी से पैदा होता है कि वह जन्नत को जला दे और दोजख की आग को बुझा दे। साहित्य किसी राज्य, किसी व्यवस्था, किसी बाजार को बचाने के लिये नहीं रचा जाता। साहित्य कभी किसी धर्म को भी नहीं बचाता। उसका सिर्फ एक ही काम है कि वह मनुष्य को और उसकी मनुष्यता को बचाये। अगर यह दोनों बचे रहे तो धर्म, राजनीति और जीवन के हाट-बाजार भी उस मूल्य की रक्षा कर पायेंगे जो केवल मानव जाति ही नहीं पृथ्वी पर फैले समूचे जीवन की रक्षा करेगा। इसमें केवल आदमी ही नहीं पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, नदी-पहाड सब शामिल हैं। आज दुनिया में दुनिया के राजनैतिक सूबेदारों के द्वारा प्रगति और विकास का जो आश्वासन दिया जा रहा है वह आदमी के स्वार्थ और उसकी लिप्सा को तो उकसाता है पर जिस मानवीय संतोष से दुनिया दीर्घअवधि तक बची रहती है उसकी प्रेरणा वह नहीं देता। साहित्य एकमात्र ऐसा अस्त्र है जो मानवजाति के जीवन में प्रेरणा का एक ऐसा प्रांगण रचता है जिसमें पूरी पृथ्वी पर बसने वाला जीवन एक कुटुम्ब की तरह स्पंदित हो सके।

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