ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
शिक्षा नीति प्रारूप में भाषाई संस्तुतियां
02-Jul-2019 11:00 AM 808     

हमारे समाज में भाषाओं को लेकर अपनी-अपनी धारणाएं मौजूद रही हैं।
इनसे सावधानी और विवेकपूर्ण निर्णय लेना अपेक्षित होता है। तभी इस
मसौदे से हिन्दी शिक्षण की अनिवार्यता को हटा दिया गया। यदि हम व्यापक
परिदृश्य में समझने की कोशिश करें तो पाएंगे कि भाषाएं हमारे समाज को
जोड़ने में एक मजबूत सूत्र के रूप में अपनी भूमिका निभाती हैं।

बहुभाषा और बहुभाषी समाज की परिकल्पना कोई आकाश में नहीं की गई है बल्कि बहुभाषी समाज में हमारी मातृभाषा के अलावा क्षेत्र और राज्य की भाषा भी समाहित होती है। इन्हें विलगाकर हम एक धनाढ्य भाषायी परिवार की कल्पना नहीं कर पाएंगे। इन्हें हम विभिन्न शैक्षिक नीतियां और समितियों की संस्तुतियों में भी देख-पढ़ सकते हैं। वह चाहे त्रिभाषा सूत्र हो या फिर भाषा शिक्षण के प्रति शिक्षाविदों की समीक्षा। इन तमाम दस्तावेज़ों की रोशनी में देखने की कोशिश करें तो पाएंगे कि 1964-66 की कोठारी समिति में प्रस्तावित त्रिभाषा सूत्र कहीं न कहीं प्रकारांतर से बहुभाषायी परिवेश को मजबूत करने पर बल देती है। भाषा आधारित विमर्श समय-समय पर शैक्षणिक जमीन पर उगते रहे हैं। इन्हें यदि सावधानी एवं पूर्वग्रह से हट कर समीक्षित नहीं किया और कार्यान्वयन की योजना बना ली तो समस्याएं खड़ी होती हैं। आजादी के बाद और ख़ासकर 1960 के आस-पास भाषा को आधार बनाकर देशव्यापी संघर्ष इतिहास में दर्ज़ हैं। उसमें एक राज्य या ख़ास भाषा को जब दूसरे राज्यों को भी पढ़ने-लिखने, बोलने के लिए प्रस्तावित किया गया तो उसका विरोध कुछ राज्यों ने किया। सन् 1986 में हमारी शिक्षा नीति बनी थी। उसके बाद हमारे पास ताज़ा और समयानुसार शैक्षणिक नीति की आवश्यकता थी। इसमें पूर्व में 2015 से काम होना शुरू हुआ था। हाल ही में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा विद्वत् समाज को सौंपा जा चुका है। इसमें पूर्व में हिन्दी भाषा को अन्य राज्यों में भी पढ़ने-पढ़ाने की वकालत की गई थी जिस पर व्यापक प्रतिक्रियाएं आने लगीं। इन विमर्शों में विरोध के स्वर हिन्दी तो थी ही किन्तु यदि हम कल्पना करें यदि हिन्दी के स्थान पर संस्कृत, पंजाबी, गुजराती आदि भाषा भी रखी जाती तो विरोध तो उठते ही बेशक वह राज्य कोई और होता। यदि ठहरकर मंथन करें तो पाएंगे कि हमारे समाज में भाषाओं को लेकर अपनी-अपनी धारणाएं मौजूद रही हैं। इनसे सावधानी और विवेकपूर्ण निर्णय लेना अपेक्षित होता है। तभी इस मसौदे से हिन्दी शिक्षण की अनिवार्यता को हटा दिया गया। यदि हम व्यापक परिदृश्य में समझने की कोशिश करें तो पाएंगे कि भाषाएं हमारे समाज को जोड़ने में एक मजबूत सूत्र के रूप में अपनी भूमिका निभाती हैं। इस सूत्र को पूर्वग्रहों से मुक्त होकर इस्तेमाल करने की आवश्यकता है।
प्राथमिक स्तर पर भाषा शिक्षण पर बहुत कम सुझाव और रणनीतियां इस शिक्षा नीति में नज़र आती हैं। एक बड़ा हिस्सा प्रारम्भिक बाल्यावस्था में देखभाल और शिक्षा, सीखने की बुनियाद पर खर्च किया गया है। इससे स्पष्ट है कि जिसे अर्ली चाइल्डवुड केयर एवं एजूकेशन ईसीसीई के नाम से जानते हैं। गौरतलब है कि ईसीसीई को शिक्षा के अधिकार अधिनियम से बाहर रखा गया था। इसे भी आरटीई का हिस्सा बनाया जाए इसको लेकर पिछले छह सात वर्षों से विभिन्न संस्थाएं वकालत कर रही हैं। वही आवाज़ इस मसौदे में शामिल किया गया है। आंगनवाड़ी, प्राथमिक स्कूल, पूर्व और पूर्व प्राथमिक स्कूलों के साथ कैसे बाल्यावस्था देखभाल एवं रख रखाव को जोड़ा जाए, इस पर यह मसौदा शिद्दत से विमर्श करता है।
1. 2025 तक 3 से 6 आयु वर्ग के सभी बच्चों को मुक्त, सुरक्षित, उच्च गुणवत्तापूर्ण, विकासात्मक स्तर के अनुरूप देखाभाल और शिक्षा की पहुंच को सुनिश्चित करना।
2. प्रारम्भिक बाल्यावस्था में देखभाल और शिक्षा (ईसीसीई) की समझ, ईसीसीई की अवधारणा, इसकी रूपरेखा आदि की चर्चा इस हेड में की गई है।
3. ईसीसीई के पीछे की नीतिगत पृष्ठभूमि और अंतरराष्ट्रीय घोषणाओं का हवाला दिया गया है।
4. यू डाईस की 2016-17 की रिपोर्ट के हवाले से कहा गया है कि कक्षा 1 में छह वर्ष से पहले प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या 70 लाख से अधिक थी।
5. 3 से 8 वर्ष की आयुवर्ग के बच्चों के लिए लचीली, बहुमुखी, बहुस्तरीय, खेल-अधारित और खोज-आधारित शिक्षा उपलब्ध हो।
भाषायी विमर्श कहीं न कहीं हमें अपनी भाषा-बोली-बानी से जोड़ती है। हमें एक ऐसे बहुभाषी समाज का हिस्सा बनाती है जहां भाषाओं की छटाएं पग पग पर सुनने, बोलने और पढ़ने को मिलती हैं। भारत की यात्रा पर निकलें तो कुछ-कुछ किलोमीटर पर भाषायी विविधताओं का दर्शन होता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि बहुभाषी समाज में जीने वाले व्यक्ति की अभिव्यक्ति क्षमता उसके जीवन के हर क्षेत्र में देखी और सुनी जा सकती है।
इस बहुभाषी समाज को बचाए रखने के लिए ज़रूरी है कि बच्चों को स्कूली शिक्षा से लेकर कॉलेज और विश्वविद्यालयी शिक्षा में बहुभाषायी दक्षता को सीखने का अवसर मिले। हालांकि अन्यान्य रिपोर्ट हमें समय-समय पर ताकीद करती रही हैं कि हमारे समाज से रोज़ कोई न कोई भाषा-बोली खत्म हो रही है। बोलियों का लुप्त होना कही न कहीं एक गहरे संकेत देती है। यह दीगर बात है कि फिर भी हम अपनी भाषा बोली को बचाने, संरक्षण करने, सीखने-सिखाने के प्रति कोई ख़ास गंभीर नज़र नहीं आते। इसका एक प्रमाण तो यही है कि हर साल यू-डाईस, असर, पीसा, जीईएमआर आदि की अध्ययन रिपोर्ट इस ओर इशारा करते हैं कि हमारे बच्चों में भाषायी कौशल दिन प्रति दिन कम होती जा रही है। हमारे बच्चे स्कूली स्तर पर भाषा के बुनियादी कौशल भी हासिल नहीं कर पा रहे हैं। स्कूली बच्चों का एक बड़ा हिस्सा पढ़ने, अक्षर ज्ञान, लिखने आदि कौशल में पिछड़ रहा है। अपने कक्षा-स्तर के अनुरूप बच्चों को भाषा के कम से कम दो कौशलों का मूल्यांकन किया गया जिसमें पाया गया कि बच्चे पढ़ने-लिखने में बहुत पीछे हैं। भाषायी पठन समझ और लेखन कौशल से महरूम रह जा रहे हैं। यही बच्चे जब कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों में जाते हैं तो या तो भाषा-अध्ययन छोड़ देते हैं या फिर भाषा एवं साहित्य अध्ययन में रुचि नहीं लेते।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति प्रारूप 2019 बड़ी ही शिद्दत से भाषा शिक्षण, सीखने-सिखाने और बहुभाषा को संरक्षित करने पर जोर देती है। स्कूली स्तर पर बच्चों को किस प्रकार भाषा-शिक्षण करें इसे लेकर अध्याय 2 में 2025 तक पांचवीं कक्षा एवं उससे ऊपर के सभी विद्यार्थी बुनियादी साक्षारता एवं संख्याज्ञान अर्जित कर सकें। इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए बच्चों को उनकी मातृभाषा, घर की भाषा, स्थानीय भाषा में शिक्षा दी जाए आदि पर केंद्रित है। उस अध्याय में नीति स्पष्ट करती है कि किसी भी बच्चे पर अन्य भाषा सीखने के लिए कोई दबाव नहीं बनाया जाएगा। बल्कि बच्चों को उसकी मातृभाषा/घर की भाषा/स्थानीय भाषा में सीखने-सिखाने के अवसर प्रदान किए जाएंगे। इस नीति का मानना है कि बच्चे अपनी मातृभाषा में किसी भी विषय को सहज और रुचि से जल्द सीखते हैं। बच्चों को अपनी भाषा के चुनाव के अवसर भी मिलेंगे। ख़ासकर पांचवीं के बाद और आठवीं कक्षा में अपनी भाषा बदल सकते हैं। भाषा के चुनाव में लोचपन रखा गया है। यदि और विस्तार से समझने की कोशिश करें तो पाएंगे कि बच्चों को भाषा सीखने-सिखाने के लिए भाषायी माहौल प्रदान करने के लिए प्रारूप में इसका भी प्रावधान है कि पहली, दूसरी और तीसरी कक्षाओं में हर दिन गणित और पढ़ने के घंटे एवं चौथी व पांचवी कक्षा के लिए एक अतिरिक्त घंटे लेखन के लिए तय किया जाए। वर्ष में कई बार भाषा मेला एवं गणित मेला जैसे कार्यक्रम का आयोजन हो। साप्ताहिक रूप से भाषा एवं गणित केंद्रित स्कूल असेंबली का आयोजन किया जाए और भाषा एवं गणित सबंधित गतिविधियों के माध्यम से लेखकों और गतिणज्ञों की वर्षगांठ आदि को उत्सवों के रूप में मनाया जाए।
बच्चों में भाषायी कौशल ख़ासकर मौखिक और लिखित संवाद दक्षता को विकसित करने के लिए स्कूलों में साल भर मेले का आयोजन किया जाएगा। इस मेले में भाषा-मेले में साहित्यिकारों, लेखकों आदि को जोड़ जाएगा ताकि बच्चों को साहित्यिकारों से बातचीत करने का अवसर मिल सके। यह भाषायी मेला पुस्तकालयों के आस-पास किया जाना चाहिए। बच्चों की भाषायी दक्षता और गणित में मदद करने के लिए कार्य पुस्तिकाएँ दी जाएंगी ताकि जिन्हें पढ़ने में दिक्कतें आ रही हैं उन्हें इस प्रकार सहायता की जा सके।
यह स्पष्ट तौर पर देखा और महसूस किया जा सकता है कि जब हम नागर समाज के हिस्सा हो जाते हैं वैसे-वैसे धीरे-धीरे बोलियों को पीछे धकेलने लगते हैं। यह प्रक्रिया इतनी धीमी और अबूझ सी होती है कि हमें भी मालूम नहीं चलता कि कब हमने उहां, इहां, एने ओने जैसे शब्दों को यहां वहां, इधर उधर से स्थानांतरित कर देते हैं। काहे को क्यों से तब्दील करते वक्त यह भी जान नहीं पाते कि कब हमने अपनी सहज बोली को मानकीकृत भाषा में पिरो दिया। इस प्रकार न केवल भोजपुरी बल्कि तमाम भारतीय बोलियां मानक भाषाओं में विलय हो जाती हैं। यही वजह है बोलियों की ख़ास अभिव्यक्ति क्षमता हमारे बीच से विलुप्त हो रही हैं। हालांकि अभी भी हमारे जो बुढ़ पुरनिया बचे हैं वो अपनी ही बोली में बोलते बतियाते हैं। उन्हें चाहे शहर में रख दीजिए या फिर अपने गांव में ही क्यों न हों। यह दीगर बात है कि हमारे बूढ़े मां-बाप, चाचा-चाची, मामा-मामी अपनी ही जबान में बात करते हैं। उन्हें लाख समझा लें कि मिलने आने वालों से अपनी बोली-भाषा में बात न करें। लेकिन जब हम उन्हें ऐसा करने को कहते हैं या दबाव बनाते हैं तभी कहीं न कहीं हम एक बोली शब्द की हत्या करते हैं।
शब्दों की हत्या या शब्दों का विसर्जन कहीं न कहीं वृहद भाषायी संपदा को हानि ही पहुंचाते हैं। शब्दों का विसर्जन दूसरे शब्दों में भाषायी परिवार के किसी न किसी सशक्त सदस्य का मौत की घाट उतरने में जुट जाते हैं। यह हत्या व विसर्जन जाने अनजाने रोज़मर्रे की बोलचाल में हम करते हैं। इसका असर हमें तत्काल तो न ही नज़र आता है और न ही इसके क्या ख़मियाज़ा भुगतने पड़ेंगे इसका अनुमान ही लगा पाते हैं। एक पूरी की पूरी नई पीढ़ी बोली, भाषा के प्राचीन छटाओं से कटती चली जाती है। भाषा तो हमारे स्कूलों में नहीं बोली जाती और न ही पढ़ाई जाती है। ये तो गांव की भाषा है। बच्चे जिन भाषा व बोलियों व शब्दों को लेकर इस प्रकार की धारणाएं रखते हैं हमें क्या उम्मीद है कि वे बच्चे हमारी इन भाषाओं को प्रयोग आने वाले सालों में करेंगे? बच्चे भाषाओं को ख़ासकर स्कूली भाषा से जोड़कर देखने और समझने की कोशिश करते हैं। उन्हें लगता है जो भाषा स्कूल में या फिर पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाई जाती है वही भाषा है उसके एत्तर कोई और भाषा या तो हो ही नहीं सकती या फिर वह गांव की भाषा है जिन्हें बोलने से हमारी पहचान प्रभावित होती है। हालांकि हमारे बच्चों की यह चिंता बिलावजह भी नहीं है। क्योंकि उन्हें स्कूलों में बताया जाता है कि किस भाषा में उन्हें बोलना और संप्रेषित करना है। यदि बच्चे निर्देशित भाषा से हटकर किसी स्थानीय भाषा का इस्तेमाल करते हैं तो उन्हें दंड भरने पड़ते हैं। जब बच्चों को किसी ख़ास भाषा के प्रयोग करने पर दंड भरना पड़े तो बच्चे क्योंकर उन भाषाओं का प्रयोग अपने आम जीवन में करना चाहेंगे। होता तो यह भी है कि बच्चे अपने मां-बाप को भी समय-समय पर टोक देते हैं कि अपनी गांव की भाषा हमारे साथ इस्तेमाल मत कीजिए। यह भाषायी निषेध कहीं न कहीं शब्दों की हत्या या फिर भाषायी विसर्जन की ओर इशारा करती हैं।
भाषायी सरोकार को अमलीजामा पहनाने के लिए यह दस्तावेज़ मानता है कि भाषा-शिक्षकों को विशेषकर प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा जिनकी जिम्मेदारी अध्याय 22 में तय की गई है। इस अध्याय में जिक्र है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में भाषा-संकाय की स्थापना की जाएगी जिनकी जिम्मेदारी होगी कि भाषा-शिक्षकों को प्रशिक्षण प्रदान करें। यहां प्रशिक्षित शिक्षक देश के विभिन्न स्कूलों में अपनी सेवाएं देंगे। भाषा शिक्षकों की पेशेवर मांग को भी इस दस्तावेज़ में उल्लेख किया गया है। भारतीय भाषाओं के शिक्षकों की मांग देशभर में बढ़ेगी। इससे शिक्षकों को रोजगार भी मिलेगा। दस्तावेज़ की मानें तो सेवा पूर्व या सेवा के दौरान किए जाने वाले शिक्षक शिक्षा या प्रशिक्षणों में बुनियादी भाषा एवं गणित के शिक्षण के साथ ही ईसीसीई एवं बहु स्तरीय गतिविधि-आधारित शिक्षण पर नए सिरे से बल दिया जाएगा। एनईपी ड्राफ्ट दस्तावेज़ के अनुसार तमाम भारतीय भाषाओं के विकास और संरक्षण को बढ़ावा दिया जाएगा। इसके तहत उच्च शिक्षा संस्थानों में शास्त्रीय भारतीय भाषाओं और साहित्य को आगे बढ़ाने के लिए विशेष योजनाएं बनानी चाहिए। पालि, फारसी व प्राकृत भाषाओं के लिए एक राष्ट्रीय संस्था स्थापित किया जाएगा।
समग्रता में समझने की कोशिश करें तो नीति के स्तर पर भाषा-बहुभाषितकता, भाषा-शिक्षा-शिक्षण आदि पर विशेष बल दिया गया है। हालांकि भाषा-शिक्षण इस नीति का एक पक्ष है। इसके अलावा पेशेवर शिक्षक तैयार करना और उन्हें अपने पेशे में आगे ले जाने, उनकी कार्य-दक्षता, प्रोफेशनल डेवलप्मेंट जिसे सतत् पेशेवर विकास कार्यक्रम से जोड़कर और बेहतर शिक्षक बनाने की योजनाएं हैं। योजना, नीति आदि के स्तर पर यह दस्तावेज़ पहली नजर में पूर्ण नजर आती है किन्तु स्कूलों से लेकर कॉलेज, विश्वविद्यालयों में जिस संख्या में हजारों और लाखों की संख्या में शिक्षकों की कमी है ऐसी स्थिति में अलग से भाषा शिक्षकों की नियुक्ति और संकायों में भाषा-शिक्षक की नियुक्ति लक्ष्य को हासिल करना ख़ासा अहम मसला है। एक ओर जब हम पूर्व के रिक्त पदों को नहीं भर पा रहे हैं ऐसे में नए पदों को कब और कैसे भरने वाले हैं इस पर मंथन करने की आवश्यकता पड़ेगी।

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