ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
लतीफ़े सिर्फ़ ख़वातीन पर
01-Aug-2019 03:29 AM 734     

चुटकुले सुनना और सुनाना एक बड़ा अच्छा शग़ल है। किसी भी महफ़िल में दो लोग हीरो बन जाते हैं - एक तो गाना गाने वाला अगर वो सुर में गाता हो और वाक़ई अच्छा गाता हो; दूसरा जोकर मतलब जोक सुनाने वाला - बशर्ते कि एक तो वो पुराने लतीफ़े न सुनाये, दूसरे पंच लाइन क़ायदे से सही वक़्त पर पेश करे।
बहरहाल गुलाकार और लतीफ़ेबाज़ हर पार्टी और बज़्म में छा जाते हैं। वैसे कोई हमें बतायेगा कि सरदारों और मलयालियों को छोड़कर तमाम चुटकुले औरतों पर ही क्यों होते हैं? हमें तो एक ही वजह समझ में आती है - और वो है मर्दों की अहसास-ए-कमतरी। जी हाँ! औरतों की ताक़त से डरकर मर्दों ने उन्हें कमज़ोर होने का तमग़ा दे दिया। हिफ़ाज़त के नाम पर उसे चारदीवारी में बंद कर दिया। इसी तरह औरतों पर किये जाने वाले ज़ुल्मों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाये इसलिये उसका मज़ाक़ बनाना शुरू कर दिया, हाथ में बेलन थमा दिया ताकि कोई ये न जाने कि पिटाई तो उसी की हुई थी। औरत को ज़्यादा बोलने वाली यानि बकबक करने वाली का ख़िताब देकर यह सिद्ध कर दिया कि वो वास्तव में बेज़ुबान नहीं हैं। अब देखिये तीन तलाक़ पर भी लतीफ़ा ये है कि औरत एक बार में सुनती ही नहीं इसलिये तीन बार तलाक़, तलाक़, तलाक़ बोलना पड़ता है। तो भाईजान ऑर्ट को भी हक़ दे दो कि वो एक ही बार तलाक़ बोल कर मर्द को छोड़ दे - आखिर वह तो एक बार में सुन ही लेगा। मज़ाक़ दरकिनार, तीन बार तलाक़ बोलने की ज़रूरत ही क्या है। "खुला" की तरह आदमी क्यों नहीं अदालत या पंचायत में जाकर तलाक़ दे देता? पर नहीं! तलाक़ पर लतीफ़ा बना देंगे ताकि असली मुद्दे से ध्यान हट जाये।
अजीब बात है कि आदमी हमेशा हँस-हँस के शादी को बर्बादी बोलते हैं। अगर सचमुच शादी बर्बादी है तो रो-रो कर क्यों नहीं बोलते? ज़ाहिर है कि वो अपनी खुशक़िस्मती को सिर्फ़ मज़ाक में बुरा भला कहते हैं। वो तो बेचारी बीबी ही है जो बर्बाद होकर भी कभी शादी को बर्बादी नहीं कहती - न हँसकर न रोकर। कहते हैं न कि नकारात्मक नहीं बोलना चाहिये। एक वाजिब सवाल ये है कि हमारे माशरे में दोहरे मापदंड क्यों हैं? मर्द शादी से पहले भी कई लड़कियों से इश्क़ फ़रमा लेते हैं और बाक़ायदा सबकुछ कर लेते हैं। और तो और बलात्कार करके भी "बेचारे" बने रहते हैं - "लड़के हैं ग़लती हो जाती है।" क्योंजी ये कोई नहीं कहता कि लड़की है या लड़कियाँ हैं गलती हो जाती है। लड़कियों से इस क़िस्म की गलती महज़ एक भूल नहीं बल्कि गुनाह यानि अपराध होता है वो भी भयंकर क़िस्म का जिसकी कोई माफ़ी नहीं।
ख़ैर! तो बतायें कि शादी की ज़रूरत किसको ज़्यादा होती है? जिस काम (जी हाँ इसे काम वासना भी कहा जा सकता है) के लिये औरत का शादी करना आवश्यक होता है वह तो मर्दों को हमेशा हासिल है - तो फिर शादी क्यों? वो इसलिये साहब कि मुफ्त की नौकरानी, रसोईया, सेक्रेटरी, बच्चों की आया और साथ ही मुहब्बत करने वाली और किस तरह मिलेगी? तो जनाब इस शादमानी को बर्बादी कहना सिर्फ़ और सिर्फ़ अहसानफरामोशी है। एक लतीफ़ा ये भी है कि ख़ूब हँसने हँसाने वाला व्यक्ति शादी होते ही "बेचारा" कितना संजीदा हो गया। सही है। एक बेफ़िक्र, ग़ैरज़िम्मेदार लड़का शादी के बाद अगर घर की ज़िम्मेदारी समझने लगा और ज़िंदगी के प्रति गंभीर हो गया तो इसमें बुराई क्या है? क्या उसे खुश रहने के लिए पहले की तरह बरिबंड होना ज़रूरी है? क्या एक लड़की शादी करते ही एक ज़िम्मेदार औरत नहीं बन जाती? आदमी तो पढ़ाई ख़त्म होते ही नौकरी या व्यवसाय करने लगता है। शादी के बाद भी वही करता है। ऐसा तो नहीं कि वह शादी बाद ही नौकरी करता है। वैसे भी नौकरी नहीं करेगा तो क्या करेगा? वो दिन हवा हुए जब खलील मियाँ फ़ाख़्ते उड़ाते थे। बेचारी लड़की ज़रूर घर गृहस्थी शादी के बाद ही सम्भालती है। तो साहब घाटे में कौन रहा?
कभी-कभी सीधे-सीधे वार न करके तंजिया वार करना भी कुछ मर्दों का शग़ल होता है। वो कहावत है न मख़्मल में लपेट कर जूता मारना। या फिर अंग्रेजी के स्नाइपर की तरह छुप कर गोली चलाना। गोली तो फिर भी भारी भरकम चीज़ है मगर तंज़ यानि तानों की तुलना केवल नावक के तीरों से ही की जा सकती है; जो "देखन में छोटे लगें और घाव करें गंभीर।" एक बानगी देखिये :
एक पति अपनी मधुमेह से पीड़ित पत्नी से हँसकर बेहद तारीफ़ के अंदाज़ में फ़रमाता है "भई तुम्हारे ज़र्फ़ और हिम्मत का जवाब नहीं। कमाल की इच्छाशक्ति है तुम्हारी।" जीवन में पहली बार पति के मुखारविंद से फूल झड़ते देख गदगद हुई पत्नी ने मुस्कुरा कर प्यार से पूछा "कैसे?" पति देवता ने अपने असली यानि आसुरी वेश में आकर कहा "देखो न इतनी ज़्यादा शुगर (चीनी) है तुममें मगर मजाल है जो ज़ुबान तक आ जाये।"
बेचारी पत्नी का चेहरा देखने लायक। चीनी की बात करने वाला शौहर इतनी कड़वी बात कहकर भी बीबी के चेहरे पर उभरे दर्द को पहचान पाया?
कहाँ साहब! पहचान लेता तो यूँ न कहता "हर बेटे के पास सबसे अच्छी माँ होती है, लेकिन सबसे अच्छी बीबी हमेशा पड़ोसी के पास ही क्यों होती है?" वो इसलिए भाईजान क्योंकि आप उसके लायक ही नहीं होते। बेशर्मी की भी हद है। ज़रा पड़ोसी से जाकर पूछो कि उसे आपकी बीबी कितनी अच्छी लगती है। जाओ पूछो - न मुकालात हो जाये तो कहना। और हाँ! कभी अपनी बीबी से पूछना कि उसे सबसे अच्छा शौहर किस पड़ोसन का लगता है। इस बात का जवाब वो बेचारी कभी नहीं दे पायेगी - पिटना थोड़े ही है। और ये जो सूक्ति बना रखी है कि हर मर्द को अपने बच्चे और दूसरे की बीबी अच्छी लगती है, सही हो सकती है मगर अपना पति हर पत्नी को अच्छा लगता हो क़तई ज़रूरी नहीं है - आख़िर उसे भी तो अच्छी चीज़ को पसंद करने का हक़ है।
अक्सर पार्टियों और महफ़िलों में ठहाकों के साथ यह कहा जाता है कि औरतें ज़्यादा दिन ज़िंदा रहती हैं क्योंकि उनकी कोई पत्नी नहीं होती। निहायत ही घटिया मज़ाक़ है। औरतें बेचारी तो सौतन भी झेल लेती हैं तथा शौहर नामक जंतु को भी झेल लेती हैं। इसे कहते हैं जिजीविषा। अपने द्मद्वद्धध्त्ध्ठ्ठथ् दृढ द्यण्ड्ढ ढत्द्यद्यड्ढद्मद्य के बारे में सुना ही होगा। आदमी (सब नहीं) शराब पीते हैं, कबाब खाते हैं, मौक़ा मिले तो अन्य व्यसन भी पाल लेते हैं और अवकाश प्राप्त करते ही निकम्मा, आरामदेह जीवन बिताने लगते हैं - मरेंगे नहीं तो क्या जियेंगे? इतने दिन भी बीबी की सेवा के बलबूते पर जी लेते हैं। ग़लतफ़हमियों में रहना बंद कीजिये साहब। बीबियों को नीचा दिखाना, उन पर तंज़ करना, उनका मज़ाक़ उड़ाना महज़ आपके अहसास-ए-कमतरी और घटियापन का पर्दाफ़ाश करता है।
चलते-चलते एक लतीफ़ा :
मायके से पत्नी ने फ़ोन किया और प्यार से पूछा "जान, मेरी याद में क्या करते हो?"
पति ने ख़ास शौहरनुमा अन्दाज़ में उत्तर दिया "तुम्हारी पसंदीदा आइसक्रीम और अमूल नट्स खा लेता हूँ... और तुम?"
पत्नी ने तर्ज़ में तर्ज़ मिलाते हुए उसी शानदार अंदाज़ में कहा- "जी, मैं भी आपको याद करते हुए रॉयल स्टैग का क्वाटर और तीन सिगरेट पीकर रजनीगंधा खा लेती हूँ।" शौहर मियां बेहोश।

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