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भाषा, समाज और राज्य
01-Sep-2018 07:48 PM 1797     

यह एक तथ्य है कि भाषा पहले आती है और तरह-तरह के रूपाकारों में बहते हुए स्वरों में और पक्षियों के कलरव में बस जाती है। सदियों तक उसके निराकार शब्द वृक्षों पर लगी पत्तियों की तरह हवा में डोलते रहते हैं क्योंकि उन्हें कोई बोलने वाला नहीं होता। आदमी बाद में आता है और अपनी पहचानने, सुनने, चखने और स्पर्श करने की शक्ति से इन पत्तों की तरह हिलते शब्दों को पहचानने की कोशिश करता है और एक विराट सृष्टि में सदियों तक धीरे-धीरे अभिव्यक्त होता होता अपना एक समाज बनाने लगता है। यही अभिव्यक्त होता समाज राज्य बनाता होगा।
आचार्यगण कहते हैं कि शब्द अर्थ का स्पर्श नहीं करते। पर कुछ आचार्यगण यह भी कहते हैं कि शब्द तो अर्थ का स्पर्श करते हैं। दोनों बातें सही हो सकती हैं क्योंकि स्पर्श किये बिना और स्पर्श करके अर्थ सम्भव होता है। उदाहरण के लिये कोई यह दावा नहीं कर सकता कि उसने ईश्वर का स्पर्श किया है पर यह तो प्रत्यक्ष दिखाई देता है कि मनुष्य ने ईश्वर को कितना सारा अर्थ प्रदान कर दिया।
बीसवीं शताब्दी के अंत में दुनिया में उत्तर आधुनिकता की चर्चा भी शुरू हो गई जिसमें यह संकेत किया गया कि सदियों से चले आते शब्द और अर्थ कुछ मैले हो गये हैं। उन पर तरह-तरह के विचारों के मैल की पर्तें जम गई हैं। इसीलिये उन्हें एक-दूसरे से थोड़ा विच्छिन्न करके फिर से उलटना-पुलटना चाहिये। पर दुनिया में उत्तर आधुनिकता विफल हो गई।
अगर हम पृथ्वी के मानचित्र को देखें तो आदिकाल से एक परम्पराबद्ध जीवन अपने-अपने धर्म और बहुविश्वासों के सहारे जीता चला आया है और प्रत्येक समाज ने अपनी परम्परा और संस्कार के अनुरूप अपनी भाषा भी विकसित की है। पर जब योरोपीय रेनेशां के बाद एक आधुनिक दृष्टि का प्रतिपादन किया जाने लगा, उस दृष्टि ने मनुष्य को प्रकृति से विच्छिन्न किया और उसके बहुविश्वासी पारम्परिक विमर्श को एक प्रकृति विरोधी विमर्श में बदल दिया। कहने का आशय यह कि जो व्यक्ति सृष्टि के स्वभाव के अनूकूल एक पारम्परिक विचार में डूबा था और बहुसंख्यक होकर अपनी सामाजिक रचना कर रहा था और फिर उस समाज से अपने लिये कोई राज्य गढ़ रहा था, आधुनिकता ने वह सपना तोड़ दिया।
आज 21वीं सदी में व्यक्ति की कुछ बची-खुची जड़ें भले ही उसके पारम्परिक विन्यास से अभी भी रस ले पा रही हों पर उन्हें जिस आधुनिक रासायनिक खाद की पर्तों से लगातार दबाया गया है, इस हालत में वे एक ऐसे स्मृतिहीन समाज की जड़ें बन गई हैं जिनके तनों और डालियों पर उदारीकरण के नाम पर फैलता बाजार और राज्य अपने पोस्टर चिपका सकता है।
हम चिंता करें कि जो भाषा मनुष्य ने उपलब्ध की वह अब उसी मनुष्य के लिये नहीं बच रही है। वह ऐसी भाषा थी जिसमें मनुष्य स्वयं अपने आपको और अपने द्वारा बनाये गये समाज को और उस समाज द्वारा बनाये गये राज्य को परिभाषित कर सकता था, आज यह रिश्ता पूरी तरह छिन्न-भिन्न होता जा रहा है। व्यक्ति के द्वारा गढ़ा गया समाज, समाज के द्वारा गढ़ा गया राज्य और राज्य के द्वारा लगातार स्थापित किया जा रहा बाजार व्यक्ति की पहुंच में तो है लेकिन उसकी समझ से परे होता जा रहा है। क्योंकि व्यक्ति से उसकी जन्मजात भाषा छीनने का उपक्रम इस नयी शताब्दी में लगातार जारी है।
भारतीय राज्य की बात करें तो यहां सदियों से अनेक भाषाओं में कोई टकराव नहीं था क्योंकि वे सांस्कृतिक रूप से पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक एक ही आध्यात्मिक तानपुरे पर तनी दिखती हैं। लेकिन आधुनिक विश्व बाजार की सफलता इस बात में है कि इस आध्यात्मिक तानपुरे के तार ढीले कर दिये जायें। हम देख रहे हैं कि विश्व व्यापारी संविधान सम्मत भारत की प्रत्येक भाषा में अपना बाजार फैलाते जा रहे हैं। शब्द गौड़ हो रहे हैं और इमेज (आकृति) प्रकट हो रही है। राजनीति में शब्द कम पड़ रहे हैं और नेता की छवि का फैलाव शब्दों से अधिक है। नेता अब शब्दों में नहीं अंटता, वह तो अपनी सत्ताभावना के अनुरूप शब्दों पर सवारी गाँठ लेता है। समाज का काम ब्रांड का चित्र देखकर चल जाता है, उसे शब्दों की कोई जरूरत नहीं। शब्द लिखे भी हों तो वह उन्हें मात्र आकृति की तरह देखता है। शब्द की तरह नहीं।
कहने का मतलब ये कि हमारा समय भाषा के विलोपन का समय होता जा रहा है। भाषा के विलोपन के खतरे एक विचारहीन समाज को गड्ढे में धकेलते हैं और गड्ढे में गिरा हुआ विचारहीन समाज कभी उससे निकलने के बारे में सोच ही नहीं सकता। इसीलिये तो इन गड्ढों को पूर कर समाज को बाहर ले आने की व्यर्थ राजनीति विकसित होती है। पर समाज न जाने आज यह क्यों नहीं सोच पा रहा है कि वह गड्ढों से बाहर नहीं निकाला जा रहा है, बल्कि गड्ढे इस तरह पूरे जा रहे हैं कि वह उसमें और धँसता चला जाये।
हमें यह अच्छी तरह समझ सकना चाहिये कि समाज में भाषा का विकास किन्हीं राजनैतिक टोटकों से सम्भव नहीं। समाज को ही भाषा को पकड़े रहना पड़ता है। जिस समाज की भाषा उससे पीछे छूटने लगती है उस समाज के आगे हमेशा राज्य का मार्ग ही प्रशस्त होता है। समाज ज्यों का त्यों बना रहता है और राज्य आगे बढ़ता जाता है। राज्य के बीच की राजनैतिक प्रतिस्पर्धा अनेक तरह की राजनीति को आगे बढ़ाती रहती है पर समाज पीछे खड़ा रह जाता है। वह व्यक्ति जो उस समाज का हिस्सा है, यह पता लगाना मुश्किल होता जाता है कि जिस समाज से वह बना था, वह कहां खो गया है।
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भारतीय राजनीति में हिन्दीप्रेमी अटल बिहारी वाजपेयी का अवसान सच्चे अर्थों में भारत में नेहरू युग का अवसान है। वाजपेयी जी के विचारों और उनके राजनैतिक पथ निर्माण को देखकर यही अनुभव होता है कि वे भारत में ऐसे अंतिम राजनैतिक थे जिन्हें लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, आपसी सद्भाव, सौहाद्र्र और एक समृद्ध भारत के निर्माण में ही रुचि थी। वे भारत के एक ऐसे अप्रतिम राजनेता भी थे जिन्होंने अपने जीवन का ज्यादातर समय प्रतिपक्ष की राजनीति में बिताया, पर उनके मन में अपने किसी राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी के प्रति कोई ईष्र्या भाव नहीं रहा। वे मानवीय मूल्य को बरकरार रखते हुए अपने मतभेदों को सहजता से प्रकट करने वाले राजनीतिज्ञ थे जो अब भारत के राजनैतिक पटल पर दुर्लभ कर्म की तरह लगता है। वाजपेयी जी दोषारोपण की नहीं, आम सहमति की राज्य व्यवस्था के पोषक रहे हैं। शायद यही कारण हो कि हर बार उन्हें राजनीति में रहते हुए भी कुछ ऐसे परिभाषित किया गया कि वे राजनीति के पंक से कम से कम इतने ऊँचे उठे हुए व्यक्ति तो हैं जितनी कमल के पत्तों के रोंओं पर जल की एक बूंद उठी रहती है। हम उम्मीद करते हैं कि अगर भारत ही नहीं विश्व के राजनेता इतनी ऊंचाई भी हासिल करके वसुंधरा की सेवा में लग जायें तो फिर शायद किसी को कोई शिकायत ही ना रहे, क्योंकि सारी शिकायत आपसे यही है कि आप पंक में डूबे हैं और उसके बीच से खिलने में और खुलने में असमर्थ क्यों हैं।
यह अंक श्री अटल बिहारी वाजपेयी और हिंदी की स्मृति को विशेष रूप से समर्पित है।

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