ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भाषा और देश
01-Apr-2019 09:00 PM 583     

भारतीय संस्कृति और साहित्य की लोक और शास्त्रीय परम्परा का प्रतिनिधित्व करने वाले आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की याद आती है। उन्होंने अपने ललित निबंधों के अलावा भी भारत की भाषा, साहित्य, संस्कृति, समाज और जीवन से जुड़ी बहुआयामी ध्वनियों को अपने विचारों की लय में अनेक बार गूंथकर हिंदी पाठकों तक पहुँचाया है। हजारी प्रसाद द्विवेदी का भारतीय समाज से यह सम्वाद बहुत सघन और आत्मीय इसलिये हो सका कि उसमें लालित्य की एक गहरी चिंतनधारा प्रवाहित है जो भारत ही नहीं विश्व के अनेक हिंदी प्रेमियों का मन मोहती है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी भारत और उसकी भाषाओं की चिंता उस अवस्था का जिक्र करते हुए करते हैं जब भारत एक ऐसी अवस्था से गुजरा जब उसके न्याय राजनीति और व्यवहार की भाषा फारसी हो गई। निश्चय ही यह मुगलकाल था। वे यह भी कहते हैं कि इसके बावजूद भारत के लोगों की हृदय की भाषाएँ अनेक बोलियां बनी रहीं और पूरे भारत के मस्तिष्क पर संस्कृत की ही छाया रही। संस्कृत में ही भारत का अखंड ज्ञान और उसकी जीवन एकता हजारों साल से बसी रही है।
यह छिपी हुई बात नहीं है कि भारत के दर्शन और विज्ञान की सर्वाधिक प्राचीन भाषा संस्कृत ही रही। भारत में जो धर्म प्रचार आदि के आंदोलन होते रहे उनकी भी भाषा अधिकांशतः संस्कृत बनी रही। यह अवश्य हुआ कि बीच-बीच में साहित्य के रूप में और बुद्ध तथा महावीर के धर्म प्रवर्तन में संस्कृत के अलावा लोक भाषाओं का आश्रय करके उपदेश दिये गये।
भारत में 15वीं शताब्दी से अनेक विदेशी जातियाँ व्यापार की दृष्टि से आती रहीं और उनके विवरणों से यह मिलता है कि संस्कृत ही भारत के ज्ञान की भाषा रही है। भारत में सबसे प्राचीन शिलालेख संस्कृत में ही खोजे गये हैं जो ईसा मसीह के होने के डेढ़ सौ वर्ष बाद ही खुदवाये गये होंगे। यह भी सर्वविदित तथ्य है कि अनेक शताब्दियों तक गुप्त काल में संस्कृत एक केन्द्रीय भाषा बनी रही। यहाँ तक कि बहुत बाद में मुसलमान बादशाह भी इस भाषा में छिपी हुई गहराई के कायल हो सके।
सबसे बड़ा बदलाव तब हुआ जब भारत में अंग्रेजी साम्राज्य ने हमारी परम्परा को तोड़ने के बहुविध उपाय किये। ब्रिटिश हुकूमत के शासनकाल में भारत सबसे अधिक बदल गया। भारत की शिक्षा दीक्षा से लेकर विचार और तर्क की भाषा भी विदेशी होने लगी। हमारे देश के अनेक मनीषी अंग्रेजी भाषा में दीक्षित होने लगे और अंग्रेजी ने भारत में संस्कृत का सर्वाधिकार छीनने की शुरूआत की। यह दुर्भाग्य है कि आज भारतीय विद्याओं की जैसी व्याख्या अंग्रेजी भाषा में मिल जाती है वैसी या उससे कम किसी भारतीय भाषा में भी नहीं मिलती और यही भारत की सबसे बड़ी पराजय है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी बड़े दु:ख के साथ कहते हैं कि - हम राजनैतिक सत्ता के छिन जाने से उतने नतमस्तक नहीं हैं जितने कि अपने विचार की, तर्क की, दर्शन की, अध्यात्म की और सर्वस्व की भाषा छिन जाने से अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में अपनी ही विद्या को अपनी बोली में न कह पाने के उपहासास्पद अपराधी हैं। देश का स्वाभिमानी हृदय इस असहायता को अधिक समय तक बर्दाश्त नहीं कर सकता।
ते हि नो दिवसा गताः - अब हमारे वे दिन नहीं रहे।
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शोधवृत्ति और सन्दर्भ
भारत प्राचीनकाल से आप्त वाक्यों पर भरोसा करता आया है जो भारत की तपस्वी मनीषा की गहरे एकांतिक अनुभूतियों से सृष्टि के कल्याण के लिये अभिव्यक्त हुए, अंग्रेजी के आने के बाद नये शिक्षित वर्ग में अंग्रेजी के लेखकों को सर्वोपरि समझने की प्रवृत्ति बढ़ी है और पिछली आधी सदी से हमारे शोध कार्यों में अंग्रेजी की पुस्तकों से जो उद्धरण दिये जाते हैं उनका आप्त बचनों की तरह की भारत के मन पर दवाब बनाया जाता है। शोध करने वाला यह मान बैठा है कि अपने विदेशी परीक्षक को प्रभावित करने के लिये अब संस्कृत कहां काम आने वाली है तो हिंदी में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफल होने के लिये क्यों न अंग्रेजी का इस्तेमाल कर लिया जाये। संसार में अंग्रेजी भाषा की पुस्तकें सबसे अधिक छपती हैं - हो सकता है रोज 50 तो छपती होंगी, यदि पाठक इस संख्या को कम समझें तो 100 मान लें। यह एक अजीब बिड़ंबना है कि हमारे शोध करने वाले लोग दूर देश में बैठे किसी व्यक्ति को अथार्टी मान लेते हैं और अपने ही देश में हजारों साल से चली आ रही आचार्य परम्परा से बेरुखी दिखाते हैं। इस बेरुखी ने हिंदी में जो ज्ञान परम्परा संस्कृत से छनकर आना थी वह तो बहुत कम आ सकी। कुछ अनुवादों के माध्यम से ज़रूर आई पर जिसे नयी शोधों के माध्यम से आना था उसमें भारी कमी रह गई।
धर्म के क्षेत्र में भी भारत का ज्यादातर सम्वाद दुनिया से अंग्रेजी में ही हुआ, जबकि अंग्रेजों ने भारत आकर संस्कृत सीखी और भारत की आध्यात्मिक दृष्टि से अपने आपको जोड़ने की चेष्टा भी की। यह बात रेखांकित करने की है कि भारत में स्वतंत्रता के बाद आचार्य रजनीश ऐसे व्यक्ति हुए हैं जिन्होंने भारत और पश्चिम की दार्शनिक तथा आध्यात्मिक चिंतन प्रणाली को व्यापक भारतीय समाज को हिंदी में सम्बोधित किया और उसकी गहरी आलोचना भी की।
हम इस बात को लेकर खुश हो लेते हैं कि दुनिया के अनेक देशों में शायद सौ से अधिक देशों में हिंदी पढ़ाई भी जाती है और अनेक लोग उसे बोलते भी हैं लेकिन अभी यह कमी रह गई है कि उन देशों में हिंदी के माध्यम से संस्कृत में बसी हुई गहन ज्ञान परम्परा और आध्यात्मक दृष्टि भी उन देशों के लोगों तक पहुंच सके जिससे कि वो भारत की एक ऐसी वास्तविक पहचान कर सकें, जिसकी रौशनी में आज भी विश्व मानवता का एक सपना साकार किया जा सकता है। बहुत छोटे स्तर पर कुछ लोग यह काम अवश्य करते हैं पर आज दुनिया में जो नॉलेज सिस्टम तकनीक के सहारे आकार ले रहा है उसका रचनात्मक इस्तेमाल करते हुए भारत के हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं के विद्वानों को संस्कृत से जुड़े सभी भारतीय भाषाओं के नाभिनाल सूत्र की व्याख्या करते हुए उसके मर्म को उद्घाटित करने का कर्तव्य निभाना ही होगा।
यह खतरा भारत में आजादी के बाद से बढ़ता ही गया है कि ऐसे लेखक और लेखिकाएँ जिनकी न भारतीय समाज में उनके लेखन की कोई प्रतिष्ठा है और न जिनके साहित्य की आलोचनात्मक दृष्टि से कोई कद्र की गई है, ऐसे लोग अपने राजनैतिक और आर्थिक साधनों के बल पर भारत के विश्वविद्यालयों में अपने रचे हुए साहित्य को पाठ्यक्रमों में स्थापित करने की चेष्टा करते आ रहे हैं। पता नहीं उन विश्वविद्यालयों में वो कौन से मूल्यांकनकर्ता हैं जो बिना जांचे-परखे इस तरह के लेखकों की रचनाओं को अपने विद्यार्थियों के लिये सौंपते हैं।
अकादमिक जगत में यह परखी हुई बात है कि अत्यंत ज्ञानप्रवण निर्णायक मंडल के माध्यम से ही पाठ्यक्रम का निर्माण किया जाना चाहिये। लेकिन अक्सर देखा जाता है कि उसकी सम्भावना दिनों दिन क्षीण होती जा रही है जो हिंदी और हिंदुस्तान के भाषाई भविष्य के लिये शुभ संकेत नहीं है।
बेहतर हो कि भारतवासी ज्ञानवान भारतीय ही देश में पढ़ने वाले विद्यार्थियों का सिलेबस तय करें न कि वे प्रवासी जो कभी कभार यहाँ घूमते-घामते आ जाते हैं।

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