ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
लंदन में बरसात के दिन
01-Jul-2016 12:00 AM 2756     

अक्सर कहा जाता है कि लंदन या ब्रिाटेन में वर्षाऋतु नहीं होती केवल बरसात का मौसम होता है। यहाँ जब लोग घर से निकलते हैं तो झोले में घर की चाबी, खाने का डिब्बा, ट्रेन में पढ़ने के लिए एक किताब के अलावा, एक छाता ज़रूर रखते हैं। न जाने किस मोड़ पर इन्द्रदेव से मुलाक़ात हो जाये। बीबीसी उर्दू सर्विस के मेरे अज़ीज़ दोस्त और ब्रिाटेन के जाने माने डॉक्युमेंट्री फिल्मसाज़ यावर अब्बास का कहना है कि लंदन में बारि¶ा का कुछ नहीं कहा जा सकता, जब जी चाहे हो जाती है और जब जी नहीं चाहता तब भी होती है। आप मेरे हिन्दोस्तान को देखिये महीनों की तपि¶ा के बाद जब बारि¶ा की पहली बूँद ज़मीं पर पड़ती है तो भीनी-सी ख़ु¶ाबू के साथ मस्ती छा जाती है।
सच है भारत और ब्रिाटेन में बारि¶ा की अनुभूतियां दिन और रात जैसी हैं। एक ओर बारि¶ा की उमंग, आनंद, उत्तेजना और कौतुहल है, तो दूसरी ओर वर्षा से उपजी निरा¶ाा, अवसाद और उदासीनता। दोनों की तासीर अलग है। अविभाजित भारत के चोटी के उर्दू ¶ाायर जो¶ा मलीहाबादी की ज़ुबान में भारत की वर्षा एक प्रेयसी की तरह है जिसके पोर-पोर में रूमानियत है :
बरखा जो जगाती हुई जादू आई / बूँदों के बजाते हुए घुँघरू आई / हल्का-हल्का धुंआं कलेजे से उठा / सौंधी-सौंधी ज़मीं से ख़ु¶ाबू आई।
दूसरी ओर ब्रिातानी साहित्य में कई जगह वर्षा की उपस्थिति देखी जा सकती है जो कि अधिकां¶ात: नकारात्मक है। ¶ौक्सपियर के म¶ाहूर नाटक "ट्वैल्थ नाइट' में एक विदूषक जीवन की कठिनाइयों के बारे में एक गीत गाता है जिसमें बार-बार वर्षा को जीवन में आने वाली बाधा के रूप में इस्तेमाल किया गया है। वहीं भारतीय कवियों ने वर्षा को जीवन की उमंग के रूप में देखा है। भवानीप्रसाद मिश्र की एक कविता ऐसा ही भाव जगाती है :
पीके फूटे आज प्यार के, पानी बरसा री।
हरियाली छा गई, हमारे सावन सरसा री।
पर अंग्रेज़ी साहित्य के बेहद संवेदन¶ाील कवि पी.बी. ¶ौली के भीतर वर्षा नैरा¶य जगाती है। "फिटफुल आलटर-ने¶ान्स ऑफ़ द रेन' ¶ाीर्षक की उनकी कविता में उनकी मन:स्थिति के दर्¶ान होते हैं :
बार-बार आती बारि¶ा मुझे भीतर से तोड़ती है
इसकी सर्द हवायें मुझे और भेदती हैं
इसकी नमी मेरे भीतर अवसाद जगाती है
बारि¶ा एक काला न¶तर है
जिसने मुझे कई ज़ख़्म दिये हैं।
भारत और ब्रिाटेन के बाल साहित्य को अगर देखें तो वहाँ भी स्थिति वैसी ही है। गाँव के स्कूल में पढ़ी बचपन की एक कविता मुझे आज भी कंठस्थ है :
अम्माँ ज़रा देख तो ऊपर / चले आ रहे हैं बादल / गरज रहे हैं बरस रहे हैं / दीख रहा है जल ही जल / भीग रहे हैं खेत बाग बन / भीग रहे हैं घर आँगन / बाहर निकलूँ मैं भी भीगूँ / चाह रहा है मेरा मन।
पर पूर्वी लंदन में जन्मी मेरी बेटी ने बचपन में जो बाल कविता पढ़ी उसका भाव मेरी भारतीय कविता के बिलकुल विपरीत है :
रेन रेन गो अवै, कम अनैदर डे
लिटिल आर्थर वॉन्ट्स टु प्लैै
(वर्षा वर्षा अभी न आना, छोटा आर्थर खेल रहा है, जाओ किसी और दिन आना।)
ब्रिातानी साहित्य के एक और कवि एडवर्ड टॉमस की कविता "रेन' भी नैरा¶य और उदासी जगाती है। वर्षा की बात करते हुए कवि इसे अपनी व्यथा से जोड़ता है और वर्षा का तादात्म्य प्रथम वि·ा युद्ध के अवसाद ग्रस्त सैनिकों से करता है।
ऋतुओं की दृष्टि से ब्रिाटेन, भारत जैसा भाग्य¶ााली राष्ट्र नहीं है जिसे प्रकृति ने छह मौसम वरदान में दिये हों। पर दूसरी ओर चारों दि¶ााओं से समुद्र से घिरे होने की वजह से, प्रकृति ने ब्रिाटेन को एक अनूठा सौंदर्य भी बख़्¶ाा है। बारहों महीने कभी भी हो जाने वाली वर्षा उसकी मजबूरी भी है और उसकी ख़ूबसूरती में चार चाँद लगाने वाला आभूषण भी। बरसात दरअसल लंदन की एक मूडी प्रेमिका है जो कभी भी रंग में भंग डाल सकती है। ब्रिाटेन की सुरक्षा व्यवस्था और एम.आई.-5 सरीखी ख़ुफ़िया एजेन्सियाँ हर रोज़ कई आतंकवादी षड्यंत्रों को भले विफल कर लेती हों, पर बरसात, ब्रिाटेन का एक लाइलाज सरदर्द है और उसकी पहचान भी।
तारीफ़ की बात यह है कि वर्षा को लेकर साहित्य और जनमानस के नैरा¶य के बावजूद, ब्रिातानी समाज और सरकार ने, उससे कौ¶ाल पूर्वक निपटने के कारगर तरीक़े खोजे हैं। विम्बलडन टेनिस टूर्नामेंट को वर्षा से बचाने के लिए सेन्टर कोर्ट के ऊपर एक ऑटोमेटिक छत की व्यवस्था है जो बारि¶ा आते ही कुछ ही पलों में खुले आका¶ा को ढँक लेती है। भविष्य में समस्त कोर्टों को वर्षा से सुरक्षित कर लेने की व्यवस्था पर कार्य जारी है। ब्रिातानी सरकार ने 2012 के लंदन ओलम्पिक खेलों को वर्षा से बचाने के लिए कई योजनाओं पर विचार किया पर बरसात की स्थिति में उसके मुख्य स्टेडियम में उपस्थित आठ हजार दर्¶ाकों में केवल दो-तिहाई के ऊपर ही छत की व्यवस्था थी।
ब्रिाटेन और दुनियाभर के सिनेकारों ने ऐसी क्लासिक फ़िल्में बनाई हैं जिसमें वर्षा का कलात्मक व प्रभावी इस्तेमाल किया गया है। माईक नैवेल की "फ़ोर वैडिंग्स एंड अ फ़्युनरल' (1994) का यादगार क्लाइमेक्स भारी वर्षा के बीच फ़िल्माया गया है। सुप्रसिद्ध ब्रिातानी सिनेकार एल्फ़्रेड हिचकॉक की रोमांचक क्लासिक "साइको' में मूसलाधार वर्षा हत्या का मनोवैज्ञानिक आतंक सृजित करती है। कालजयी जापानी सिनेकार अकीरा कुरोसावा की "सेवन समुराई' के चरमोत्कर्ष का निर्णायक संघर्ष दृ¶य भी भयावह बारि¶ा के बीच घटता है।
अपनी भौगोलिक स्थिति और आबोहवा की वजह से, वर्षा के प्रति भय, सतर्कता और सावधानी बरतने का ब्रिातानी रवैय्या जायज़ है। "इट्स रोनिंग कैट्स एन्ड डॉग्स' (बल्लियाँ और कुत्ते बरस रहे हैं), "इट नेवर रेन्स, इट पोर्स' (मुसीबतें एक साथ आती हैं) और "सैविंग फ़ॉर अ रैनी डे' (मुसीबत के दिन के लिए बचत) जैसे अंग्रेज़ी मुहावरों की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है। पर भारत की बात और है। वहाँ राजकपूर के लिए वर्षा वि¶ाुद्ध प्रेम का प्रतीक है। इसीलिए ¶ौलेंद्र ने गीत लिखा, "बरसात में हमसे मिले तुम सजन, तुमसे मिले हम, बरसात में।' और जाने-माने उर्दू ¶ाायर और गीतकार निदा फ़ाज़ली के लिए वर्षा एक फ़लसफ़ा है :
बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है।

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